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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 631
ऋषिः - सार्पराज्ञी
देवता - सूर्यः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
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अ꣣न्त꣡श्च꣢रति रोच꣣ना꣢꣫स्य प्रा꣣णा꣡द꣢पान꣣ती꣢ । व्य꣢꣯ख्यन्महि꣣षो꣡ दिव꣢꣯म् ॥६३१॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣न्त꣡रिति꣢ । च꣣रति । रोचना꣢ । अ꣣स्य꣢ । प्रा꣣णा꣢त् । प्र꣣ । आना꣢त् । अ꣣पानती꣢ । अ꣣प । अनती꣢ । वि । अ꣣ख्यत् । महिषः꣢ । दि꣡व꣢꣯म् ॥६३१॥
स्वर रहित मन्त्र
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती । व्यख्यन्महिषो दिवम् ॥६३१॥
स्वर रहित पद पाठ
अन्तरिति । चरति । रोचना । अस्य । प्राणात् । प्र । आनात् । अपानती । अप । अनती । वि । अख्यत् । महिषः । दिवम् ॥६३१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 631
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 5; मन्त्र » 5
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 5; मन्त्र » 5
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5;
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विषय - ज्ञान का प्रकाश
पदार्थ -
(अस्य) = इस [गत मन्त्र के पृश्नि] के (अन्तः) = अन्तःकरण में (रोचना) = उस प्रभु की दीप्ति चरति= विचरती है। गत मन्त्र में ‘गतिशीलता, जिज्ञासा, पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञानप्राप्ति में लगाना, वेदमाता को प्राप्त करना' इन उपायों द्वारा प्रभुदर्शन का उल्लेख हुआ है। जिस समय इस ‘सार्पराज्ञी' के हृदय में उस प्रभु का प्रकाश होता है तब यह (रोचना) = प्रभु की दीप्ति (प्राणात्) = प्राणशक्ति के द्वारा - शरीर में बल - संचार के द्वारा - (अपानती) = सब दोषों को दूर करनेवाली होती है। शरीर के मल दूर होकर नीरोगता प्राप्त होती है। इस नीरोगता के अनुभव से इसकी प्रभु-भक्ति की भावना और प्रबल होती है और (महिष:) = [ मह् पूजायाम्] प्रभु की पूजा करनेवाला (दिवम्) = उस प्रकाशमय प्रभु को (व्यख्यत्) = लोकों के अन्दर प्रकाशित करता है, अर्थात् यह उस प्रभु का प्रवचन करता है।
भावार्थ -
प्रभुभक्त श्रोताओं के सामने प्रभु-महिमा का व्याख्यान करता है।
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