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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 687
ऋषिः - कलिः प्रागाथः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
4
त꣡रो꣢भिर्वो वि꣣द꣡द्व꣢सु꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣बा꣡ध꣢ ऊ꣣त꣡ये꣢ । बृ꣣ह꣡द्गाय꣢꣯न्तः सु꣣त꣡सो꣢मे अध्व꣣रे꣢ हु꣣वे꣢꣫ भरं꣣ न꣢ का꣣रि꣡ण꣢म् ॥६८७॥
स्वर सहित पद पाठत꣡रो꣢꣯भिः । वः꣣ । विद꣡द्व꣢सुम् । वि꣣द꣢त् । व꣣सुम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣡बा꣢꣯धः । स꣣ । बा꣡धः꣢꣯ । ऊ꣡त꣡ये꣢ । बृ꣡ह꣢त् । गा꣡य꣢꣯न्तः । सु꣣त꣡सो꣢मे । सु꣡त꣢ । सो꣣मे । अध्वरे꣢ । हु꣣वे꣢ । भ꣡र꣢꣯म् । न । का꣣रि꣡ण꣢म् ॥६८७॥
स्वर रहित मन्त्र
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रꣳ सबाध ऊतये । बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम् ॥६८७॥
स्वर रहित पद पाठ
तरोभिः । वः । विदद्वसुम् । विदत् । वसुम् । इन्द्रम् । सबाधः । स । बाधः । ऊतये । बृहत् । गायन्तः । सुतसोमे । सुत । सोमे । अध्वरे । हुवे । भरम् । न । कारिणम् ॥६८७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 687
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 4; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 4; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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विषय - कलि प्रागाथ
पदार्थ -
‘कलि' शब्द कल् संख्याने धातु से बना है, इसका अर्थ है संख्यान- चिन्तन – एक वस्तु का विशेषरूप से देखना । बस, संसार के अन्दर प्रत्येक पदार्थ का केवल उपभोग ही करते न रहकर, जो उन पदार्थों का चिन्तन भी करता है वह 'कलि' है । चिन्तन करनेवाला अवश्य ही उन पदार्थों की विशिष्ट रचना में प्रभु की महिमा को देखेगा और उसका गायन करेगा। गायन करने के कारण ही इसका नाम ‘प्रागाथ' हुआ है । यह कलि प्रागाथ कहता है कि हे (सबाधः) = ऋत्विजो ! (वः) = तुम्हें (तरोभिः) = शक्तियों के साथ (विदद्वसुम्) = उत्तम रत्न प्राप्त करानेवाले (इन्द्रम्) = सर्वैश्वर्यशाली प्रभु को (ऊतये) = रक्षा के लिए (सुतसोमे) = जिसमें सोम का अभिषव किया गया है उस (अध्वरे) = यज्ञ में (बृहत्) = खूब (गायन्त:) = गाते हो [लट् के स्थान में शतृ ] । मैं भी (हुवे) = उस प्रभु को पुकारता हूँ । किस प्रभु को ? (भरं न कारिणम्) = कुटुम्ब का भरण करनेवाले उत्तम क्रियाशील गृहपति को जैसे कुटुम्ब के लोग बुलाते हैं उसी प्रकार सबका भरण करनेवाले सदा क्रियाशील [ स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ] प्रभु को मैं अपने इस सुत- सोम - जीवनयज्ञ [अध्वर] में पुकारता हूँ, जिसमें शक्ति का सम्पादन किया गया है। वस्तुतः प्रभु के आवाहन का ही यह परिणाम है कि कलि प्रागाथ का जीवन (अध्वर) = हिंसारहित बना रहा है और शक्ति सम्पन्न बना है। प्रभु-स्मरण, प्राणिमात्र में प्रभु के निवास का ध्यान आने से यह किसी की हिंसा क्योंकर करेगा? और क्योंकि प्रभु-स्मरण वासनाओं का विनाश कर देता है, अतः मनुष्य संयमी जीवनवाला होकर उत्पन्न शक्ति को शरीर में धारण करने से 'सुतसोम' होता है ।
यह कलि प्रागाथ प्रभु का गायन इसी रूप में करता है कि – १. ये प्रभु शक्तियों के साथ उत्तम पदार्थों को प्राप्त करानेवाले हैं, २. सर्वैश्वर्यशाली हैं, ३. सबकी रक्षा करनेवाले हैं। ४. सबके भरण का भार प्रभु के ही कन्धों पर है।५. स्वाभाविकरूप से आप सदा क्रियाशील हैं। जीवहित के लिए सदा जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय किया करते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपका कुटुम्ब ही तो है, आप इसका भरण करनेवाले हैं।
भावार्थ -
हम भी कलि प्रागाथ की भाँति इस संसार को प्रभु के एक परिवार के रूप में देखें और अपने जीवन को शक्ति सम्पन्न बनाएँ ।
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