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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 697
ऋषिः - अन्धीगुः श्यावाश्विः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
4
पु꣣रो꣡जि꣢ती वो꣣ अ꣡न्ध꣢सः सु꣣ता꣡य꣢ मादयि꣣त्न꣡वे꣢ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢ꣳ श्नथिष्टन꣣ स꣡खा꣢यो दीर्घजि꣣꣬ह्व्य꣢꣯म् ॥६९७॥
स्वर सहित पद पाठपु꣣रो꣡जि꣢ती । पु꣣रः꣢ । जि꣣ती । वः । अ꣡न्ध꣢꣯सः । सु꣣ता꣡य꣢ । मा꣣दयित्न꣡वे꣢ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । श्न꣣थिष्टन । श्नथिष्ट । न । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । दी꣣र्घजि꣡ह्व्य꣣म् । दी꣣र्घ । जि꣡ह्व्य꣢꣯म् ॥६९७॥
स्वर रहित मन्त्र
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे । अप श्वानꣳ श्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम् ॥६९७॥
स्वर रहित पद पाठ
पुरोजिती । पुरः । जिती । वः । अन्धसः । सुताय । मादयित्नवे । अप । श्वानम् । श्नथिष्टन । श्नथिष्ट । न । सखायः । स । खायः । दीर्घजिह्व्यम् । दीर्घ । जिह्व्यम् ॥६९७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 697
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 5; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 5; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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विषय - अन्धीगुः श्यावाश्वः
पदार्थ -
‘अन्धस्' शब्द सोम-वीर्य का वाचक है । 'गो' शब्द इन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों का कथन करता है।‘अन्धीगुः’ वह व्यक्ति है जिसने सोम को ज्ञानेन्द्रियों का भोजन बना दिया है। सोम को शरीर में ही खपाने के कारण उसकी कर्मेन्द्रियाँ [अश्व] भी अतिशेयन क्रियाशील हैं [श्यैङ्गतौ], अतः इसका नाम श्यावाश्व पड़ गया है । यह अन्धीगु श्यावाश्व अपने मित्रों से कहता है – (सखायः) = मित्रो ! (वः) = तुम्हारे (अन्धसः) = आध्यायनीय इस सोम के (पुरोजिती) = पूर्ण विजय के लिए - ऐसी विजय के लिए जो तुम्हारा पालन व पूरण करेगी (श्वानम्) = स कुत्ते को, जो (दीर्घजिह्वयम्) = दीर्घ जिह्वावाला है, (अपश्नथिष्टन्) = दूर विनष्ट कर दो । कुत्ता सूखी हड्डी पर भी लड़ता है, अतः यह उस वृत्ति का प्रतीक है जो सदा खान-पान के लिए ही झगड़ती रहती है। साथ ही कुत्ता अपवित्रतम वस्तुओं को भी खा अतः यह तामसी भोजन की वृत्ति का भी संकेत कर रहा है । 'दीर्घ जिह्वयम्' विशेषण दिनभर चरते रहने की वृत्ति को भी लक्षित कर रहा है । एवं, सार यह है कि सोम की पूर्णविजय व रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि हमारी सारी शक्ति भोजन के जुटाने में ही न लगी रहे, हम तामस् भोजन से दूर रहें और दिनभर खाते ही न रहें । 2
यदि हम सोम की पवित्र व परिमित भोजन से रक्षा करेंगे तो यह १. हमारे (सुताय) = निर्माण के लिए होगा [सु-पैदा करना ] । हममें दैत्यों की वृत्ति न पनपेगी। २. (मादयित्नवे)- हमारे जीवन में एक अद्भुत मद – हर्ष, उल्लास के संचार के लिए होगा ।
भावार्थ -
हम पवित्र व परिमित भोजन से वीर्य की शरीर में सुरक्षा करनेवाले बनें, जिससे वह सुरक्षित वीर्य हममें निर्माण की वृत्ति व उल्लास को जन्म देनेवाला हो ।