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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 717
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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श꣢꣫ꣳसेदु꣣क्थ꣢ꣳ सु꣣दा꣡न꣢व उ꣣त꣢ द्यु꣣क्षं꣢꣫ यथा꣣ न꣡रः꣢ । च꣣कृमा꣢ स꣣त्य꣡रा꣢धसे ॥७१७॥

स्वर सहित पद पाठ

श꣡ꣳस꣢꣯ । इत् । उ꣣क्थ꣢म् । सु꣣दा꣡न꣢वे । सु꣣ । दा꣡न꣢वे । उ꣡त꣢ । द्यु꣣क्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । य꣡था꣢꣯ । न꣡रः꣢꣯ । च꣣कृम꣢ । स꣣त्य꣡रा꣢धसे । स꣣त्य꣢ । रा꣣धसे ॥७१७॥


स्वर रहित मन्त्र

शꣳसेदुक्थꣳ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः । चकृमा सत्यराधसे ॥७१७॥


स्वर रहित पद पाठ

शꣳस । इत् । उक्थम् । सुदानवे । सु । दानवे । उत । द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । यथा । नरः । चकृम । सत्यराधसे । सत्य । राधसे ॥७१७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 717
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

वसिष्ठ कहते हैं कि उस (उक्थम्-उद्गीथम्) = ऊँचे-ऊँचे गाने के योग्य (उत) = और (द्युक्षम्) = सदा ज्ञान [द्यु] में अवस्थित [क्षि= निवास] चिद्रूप प्रभु का (शंस इत्) = निश्चय से शंसन करो। सदा सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते उसका शंसन–गायन करो, उसे कभी भूलो नहीं । (यथा) = जिससे तुम (नरः) = [नृ नये] अपने को आगे ले चलनेवाले बन सको तथा (सुदा- नवः) - उत्तम प्रकार से अपने बन्धनों को काट सको [दाप्= लवने] । इस प्रभु-स्तवन से तुम आगे और आगे बढ़ोगे तथा क्रमश: अपने उत्तम, मध्यम व अधम बन्धनों को काट डालोगे । प्रभु-स्तवन मनुष्य को सांसारिक बन्धनों में नहीं फँसने देता । संसार में रहता हुआ भी स्तुतिकर्त्ता मनुष्य उसमें उलझता नहीं। उस द्युक्ष की स्तुति से स्तोता का भी ज्ञान में निवास होता है - यही सदा सत्त्व में अवस्थित होना है। वसिष्ठ अपने मित्रों से कहते हैं कि (चकृम) = हम उस प्रभु की स्तुति करते हैं (सत्यराधसे) = सत्य की सिद्धि के लिए। वह प्रभु ही सत्य है । यह सत्य ही हमारा परम उद्देश्य है- प्रभु-स्तवन ही हमें यहाँ पहुँचाएगा।

भावार्थ -

प्रभु-स्तवन से हम आगे बढ़ते हुए, सब बन्धनों को छिन्न करते हुए, सत्य की आराधना करनेवाले बनें ।

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