Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 758
ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
2

ए꣣ष꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । ह꣡रि꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अर्षति ॥७५८॥

स्वर सहित पद पाठ

ए꣣षः꣢ । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । ज꣡न्म꣢꣯ना । दे꣣वः꣢ । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । सु꣣तः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣र्षति ॥७५८॥


स्वर रहित मन्त्र

एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः । हरि पवित्रे अर्षति ॥७५८॥


स्वर रहित पद पाठ

एषः । प्रत्नेन । जन्मना । देवः । देवेभ्यः । सुतः । हरिः । पवित्रे । अर्षति ॥७५८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 758
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 17; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
Acknowledgment

पदार्थ -

(एषः) = यह–इस मन्त्र का ऋषि (प्रत्नेन जन्मना) = एक पुराने, अर्थात् दीर्घकाल तक चलनेवाले विकास से, अर्थात् पिछले कितने ही जन्मों के प्रयत्नों के परिणामरूप (देवेभ्यः) = माता-पिता, आचार्य तथा अतिथिरूप देवों से (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ (देव:) = देव (हरिः) = इन्द्रियों को विषयों से प्रत्याहृत करनेवाला होकर (पवित्रे अर्षति) = तीव्रता से पवित्र प्रभु की ओर जाता है।

असित वह है जो विषयों से बद्ध नहीं है । यह काम में न फँसा होकर सभी से स्नेह करनेवाला है। देवरात का अर्थ है देवों के प्रति अर्पण करनेवाला, अर्थात् 'ज्ञानी'। यह अब ‘पार्थिव भोगों को
न चाहनेवाला' है। ऐसा यह एक ही जन्म में बन गया हो ऐसी बात नहीं है । कितने ही जन्मों में थोड़ा-थोड़ा करके इसका यह विकास हुआ है । मन्त्र में यह भावना 'प्रत्नेन' इस शब्द के द्वारा व्यक्त की गयी है। मनुष्य देव बनता है यदि उसका निर्माण देवों से किया जाए । उत्तम माता-पिता, आचार्य, अतिथियोंवाला पुरुष ही उत्तम बन पाता है। देव का जन्म देवों से किया जाता है ।

यह व्यक्ति इन्द्रियों को विषयों में जाने से रोकता है, इस प्रत्याहार के कारण 'हरि' कहलाता है। हरि ही उस पवित्र प्रभु की ओर तीव्रता से जाता है । यह 'अ+सित' = विषयों से अबद्ध ही आगे बढ़ पाता है।‘काश्यप'=ज्ञानी होने से यह विषयों में फँसता नहीं । यह पार्थिव भोगों की कामना न करनेवाला ‘अमहीयु' है ।

भावार्थ -

हम भी असित बनकर निरन्तर प्रभु की ओर चलें।

इस भाष्य को एडिट करें
Top