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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 847
ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः
देवता - मित्रावरुणौ
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
6
मि꣣त्र꣡ꣳ हु꣢वे पू꣣त꣡द꣢क्षं꣣ व꣡रु꣢णं च रि꣣शा꣡द꣢सम् । धि꣡यं꣢ घृ꣣ता꣢ची꣣ꣳ सा꣡ध꣢न्ता ॥८४७॥
स्वर सहित पद पाठमि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । हु꣣वे । पूत꣡द꣢क्षम् । पू꣣त꣢ । द꣣क्षम् । व꣡रु꣢꣯णम् । च꣣ । रिशा꣡द꣢सम् । धि꣡य꣢꣯म् । घृ꣣ता꣡ची꣢म् । सा꣡ध꣢꣯न्ता ॥८४७॥
स्वर रहित मन्त्र
मित्रꣳ हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् । धियं घृताचीꣳ साधन्ता ॥८४७॥
स्वर रहित पद पाठ
मित्रम् । मि । त्रम् । हुवे । पूतदक्षम् । पूत । दक्षम् । वरुणम् । च । रिशादसम् । धियम् । घृताचीम् । साधन्ता ॥८४७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 847
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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विषय - घृताची धी
पदार्थ -
(पूतदक्षम्) = पवित्र बलवाले (मित्रम्) = प्राणवायु को (हुवे) = पुकारता हूँ, अर्थात् प्राणवायु को प्राप्त करने के लिए प्रभु की आराधना करता हूँ । यह प्राणवायु ही मेरे बल को पवित्र बनाती है। प्राणसाधना से शक्ति प्राप्त होती है और उसका प्रयोग नाश के लिए न होकर रक्षा के लिए होता है । (रिशादसम्) = [रिश हिंसकतत्त्व, अद-खा जाना] हिंसकतत्त्वों के खा जानेवाले (वरुणं च) = अपान को भी मैं पुकारता हूँ । प्राणापान की साधना साथ-साथ ही तो चलती है । इस साहचर्य का ही अन्यत्र ‘मित्रावरुणौ' यह द्विवचन संकेत करता है । 'मित्र' बल का आधान करता है तो 'वरुण' दोषों का निवारण करता है । मित्र की व्युत्पत्ति है—‘प्रमीतेः त्रायते' मृत्यु से बचाता है और वरुण की व्युत्पत्ति है—‘वारयति'=दोषों का निवारण करता है । एवं, प्राणापान मिलकर दोषनिवारण तथा बलाधान का कार्य करते हुए (घृताचीं धियम्) = [घृ-नैर्मल्य व दीप्त, धी- प्रज्ञा व कर्म] निर्मल कर्मों को व दीप्तप्रज्ञा को (साधन्ता) = सिद्ध करते हैं। प्राणापानों की साधना से हमारे कर्म निर्मल होते हैं तथा बुद्धि तीव्र व दीप्त हो उठती है । एवं, प्राणसाधना का महत्त्व स्पष्ट है । इस प्रकार प्राणसाधना करनेवाला व्यक्ति ही राग-द्वेष से ऊपर उठकर 'वैश्वामित्र' होता है और सदा मधुर आकांक्षाओंवाला होने से यह 'मधुच्छन्दा' नामवाला हो जाता है ।
भावार्थ -
हम प्राणापान की साधना से निर्मल कर्मोंवाले व दीप्त प्रज्ञावाले हों ।
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