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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 897
ऋषिः - मेध्यातिथिः काण्वः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
प꣡रि꣢ णः शर्म꣣य꣢न्त्या꣣ धा꣡र꣢या सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । स꣡रा꣢ र꣣से꣡व꣢ वि꣣ष्ट꣡प꣢म् ॥८९७॥
स्वर सहित पद पाठप꣡रि꣢꣯ । नः꣣ । शर्मय꣡न्त्या꣢ । धा꣡र꣢꣯या । सो꣣म । विश्व꣡तः꣢ । स꣡र꣢꣯ । र꣣सा꣢ । इ꣣व । विष्ट꣡प꣢म् ॥८९७॥
स्वर रहित मन्त्र
परि णः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः । सरा रसेव विष्टपम् ॥८९७॥
स्वर रहित पद पाठ
परि । नः । शर्मयन्त्या । धारया । सोम । विश्वतः । सर । रसा । इव । विष्टपम् ॥८९७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 897
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
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विषय - सुखदायिनी ज्ञानधारा
पदार्थ -
हे (सोम) = उमा-[ब्रह्मविद्या] सहित - ज्ञान के पुञ्ज प्रभो ! (नः) = हमारे (विश्वतः) = चारों ओर (शर्मयन्त्या) = कल्याण प्रदान करनेवाली (धारया) = [धारा वाङ्नाम – नि० १.११] वेदवाणी से (परिसर) = आप प्रवाहित हों। हमारे चारों ओर प्रभु की ज्ञानधारा हो और हम उस ज्ञानधारा से ही सदा आवृत हों, (इव) = जिस प्रकार (रसा) = पृथिवी (विष्टपम्) = सूर्य के (परिसरा) = चारों ओर घूमती है। [विष्टप् आदित्य आविष्टो भाषा – नि० २.१४] । जिस प्रकार पृथिवी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, उसी प्रकार हमारे चारों ओर वेदज्ञान की धारा परिक्रमा करनेवाली हो । सूर्य चारों ओर घूमनेवाली पृथिवी का केन्द्र है। इसी प्रकार मैं भी ज्ञान का केन्द्र बनूँ | मेरे जीवन की परिधि ज्ञान-ही-ज्ञान से बनी हो । ज्ञान मेरी रक्षा करनेवाला हो ।
भावार्थ -
मेरे जीवन में ज्ञान उसी प्रकार परिक्रमा करनेवाला हो, जैसे पृथिवी सूर्य की परिक्रमा करती है ।
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