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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 9
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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त्वा꣡म꣢ग्ने꣣ पु꣡ष्क꣢रा꣣द꣡ध्यथ꣢꣯र्वा꣣ नि꣡र꣢मन्थत । मू꣣र्ध्नो꣡ विश्व꣢꣯स्य वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥

स्वर सहित पद पाठ

त्वा꣢म् । अ꣣ग्ने । पु꣡ष्क꣢꣯रात् । अ꣡धि꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯र्वा । निः । अ꣣मन्थत । मूर्ध्नः꣢ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥


स्वर रहित मन्त्र

त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत । मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥९॥


स्वर रहित पद पाठ

त्वाम् । अग्ने । पुष्करात् । अधि । अथर्वा । निः । अमन्थत । मूर्ध्नः । विश्वस्य । वाघतः ॥९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 9
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 1;
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पदार्थ -

इस संसार में अस्थिर चित्तवृत्तिवाले पुरुष को प्रभु का दर्शन नहीं होता। उस प्रभु का मन्थन व ज्ञान तो अथर्वा ही कर पाता है। इसी से मन्त्र में कहते हैं कि (अग्ने)= हे प्रभो! त्(वाम्)=आपको (अथर्वा)= निश्चल चित्तवृत्तिवाला पुरुष (पुष्करात् अधि)= इस हृदयदेश में (निरमन्थत)= अवगाहन कर जान पाता है, अर्थात् आपका दर्शन निरुद्ध चित्तवृत्तिवाले योगी को ही हृदय में हुआ करता है, परन्तु क्या यह योगी केवल हृदय के इस विकास व नैर्मल्य से ही प्रभु-दर्शन कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए मन्त्र में कहा है कि उस प्रभु के ज्ञान का मन्थन (मूर्ध्नः) = मस्तिष्क से होगा। कौन से मस्तिष्क से ? (विश्वस्य) - सारे ब्रह्माण्ड के ज्ञान को (वाघतः) = धारण करनेवाले मेधावी के मस्तिष्क से।
एवं, यह स्पष्ट है कि प्रभु का दर्शन केवल पवित्र हृदय से न होकर मेधावी के ज्ञानपरिपूर्ण मस्तिष्क से होता है। हृदय व मस्तिष्क दोनों का ही विकास आवश्यक है। जैसे दो अरणियों को रगड़कर अग्नि प्रकट होती है, उसी प्रकार उस प्रभुरूप अग्नि को प्रकट
करने के लिए हृदय व मस्तिष्करूपी दोनों अरणियों की आवश्यकता है। ‘वज्’ धातु ज्ञान व गमन की वाचक है। उस प्रभु के ज्ञान और उस प्रभु की ओर जाने की भावना से भरा हुआ व्यक्ति इस मन्त्र का ऋषि ‘भरद्वाज' कहलाता है।

भावार्थ -

प्रभु-दर्शन के लिए उत्तम गुणों का पोषण करनेवाले [पुष्कर] हृदय, व विश्व के ज्ञान से परिपूर्ण मस्तिष्क दोनों की ही आवश्यकता है।

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