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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 936
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
5
स꣢ सू꣣नु꣢र्मा꣣त꣢रा꣣ शु꣡चि꣢र्जा꣣तो꣢ जा꣣ते꣡ अ꣢रोचयत् । म꣣हा꣢न्म꣣ही꣡ ऋ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢ ॥९३६॥
स्वर सहित पद पाठसः꣢ । सू꣣नुः꣢ । मा꣣त꣡रा꣢ । शु꣡चिः꣢꣯ । जा꣣तः꣢ । जा꣣ते꣡इति꣢ । अ꣡रोचयत् । महा꣣न् । म꣢ही꣢इति꣣ । ऋ꣣तावृ꣡धा꣢ । ऋ꣣त । वृ꣡धा꣢꣯ ॥९३६॥
स्वर रहित मन्त्र
स सूनुर्मातरा शुचिर्जातो जाते अरोचयत् । महान्मही ऋतावृधा ॥९३६॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । सूनुः । मातरा । शुचिः । जातः । जातेइति । अरोचयत् । महान् । महीइति । ऋतावृधा । ऋत । वृधा ॥९३६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 936
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - सोम का शरीर व मस्तिष्क पर प्रभाव
पदार्थ -
(सः) = वह सोम १. (सूनुः) = उत्तम प्रेरणा देनेवाला है— सोमरक्षा के द्वारा मनुष्य को सदा उत्थान की प्रेरणा प्राप्त होती है, २. (शुचिः) = यह अत्यन्त पवित्र वस्तु है और जीवन की पवित्रता का कारण है, ३. (जात:) = [जातम् अस्य अस्तीति] यह शक्तियों के प्रादुर्भाव व विकास का कारण है, ४. यह (महान्) = अत्यन्त (महनीय) = महत्त्वपूर्ण वस्तु है, ५. यह सोम (मातरा) = [माता च पिता च] = द्यावापृथिवी को–शरीर व मस्तिष्क को (अरोचयत्) = प्रकाशयुक्त करता है । जो शरीर और मस्तिष्क [क] जाते=उत्तम प्रादुर्भाववाले हैं, [ख] (मही) = महनीय व प्रशंसनीय हैं, [ग] (ऋतावृधा) = ऋतु के द्वारा - सब कार्यों को व्रत के रूप में ठीक समय व ठीक स्थान पर करने के द्वारा ये वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ -
सोम शरीर को नीरोग बनाता है और मस्तिष्क को ज्ञान ज्योति से भरकर उज्ज्वल कर देता है।
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