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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 975
ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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य꣡वं꣢यवं नो꣣ अ꣡न्ध꣢सा पु꣣ष्टं꣡पु꣢ष्टं꣣ प꣡रि꣢ स्रव । वि꣡श्वा꣢ च सोम꣣ सौ꣡भ꣢गा ॥९७५॥

स्वर सहित पद पाठ

य꣡वंय꣢꣯वम् । य꣡व꣢꣯म् । य꣣वम् । नः । अ꣡न्ध꣢꣯सा । पु꣣ष्टं꣡पु꣢ष्टम् । पु꣣ष्ट꣢म् । पु꣣ष्टम् । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व । वि꣡श्वा꣢꣯ । च꣣ । सोम । सौ꣡भ꣢꣯गा । सौ । भ꣣गा ॥९७५॥


स्वर रहित मन्त्र

यवंयवं नो अन्धसा पुष्टंपुष्टं परि स्रव । विश्वा च सोम सौभगा ॥९७५॥


स्वर रहित पद पाठ

यवंयवम् । यवम् । यवम् । नः । अन्धसा । पुष्टंपुष्टम् । पुष्टम् । पुष्टम् । परि । स्रव । विश्वा । च । सोम । सौभगा । सौ । भगा ॥९७५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 975
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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पदार्थ -

अवत्सार= सारभूत सोम की रक्षा करनेवाला काश्यप- ज्ञानी प्रभु से प्रार्थना करता है कि (अन्धसा) = अन्न के दृष्टिकोण से अथवा अन्न से उत्पन्न होनेवाले सोम के दृष्टिकोण से (न:) = हमें (यवंयवं) = यव तथा यव-जो-जैसे अन्नों को, जो हमें प्राणशक्ति से मिश्रित करनेवाले [यु मिश्रणे] तथा दोषों को दूर करनेवाले हैं [यु अमिश्रणे] तथा (पुष्टंपुष्टम्) = प्रत्येक पुष्टिकारक अन्न को (परिस्रव) = प्राप्त कराइए । (च) = तथा हे (सोम) = सब ऐश्वर्यों को जन्म देनेवाले प्रभो ! आप विश्वा (सौभगा) = सब सौभाग्यों को (परिस्रव) = हमें प्राप्त कराइए । सौभग शब्द का अर्थ आनन्द good luck, happiness तथा समृद्धि prosperity है । अवत्सार प्रभु से प्रार्थना करता है कि उसे जहाँ पौष्टिक, स्वास्थ्यप्रद अन्न की कमी न रहे, वहाँ सब सुख व समृद्धि भी प्राप्त हो, इन्हें प्राप्त करके वह आध्यात्मिक उन्नति में अपना समय लगा सके ।

भावार्थ -

हमें पौष्टिक, स्वास्थ्यप्रद अन्न प्राप्त हो, सुख व समृद्धि सुलभ हो ।

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