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अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 8/ मन्त्र 1
सूक्त - जमदग्नि
देवता - कामात्मा
छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः
सूक्तम् - कामात्मा सूक्त
यथा॑ वृ॒क्षं लिबु॑जा सम॒न्तं प॑रिषस्व॒जे। ए॒वा परि॑ ष्वजस्व॒ मां यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठयथा॑ । वृ॒क्षम् । लिबु॑जा । स॒म॒न्तम् । प॒रि॒ऽस॒स्व॒जे। ए॒व । परि॑ । स्व॒ज॒स्व॒ । माम् । यथा॑ । माम् । का॒मिनी॑ । अस॑: । यथा॑ । मत् । न । अप॑ऽगा: । अस॑: ॥८.१॥
स्वर रहित मन्त्र
यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे। एवा परि ष्वजस्व मां यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः ॥
स्वर रहित पद पाठयथा । वृक्षम् । लिबुजा । समन्तम् । परिऽसस्वजे। एव । परि । स्वजस्व । माम् । यथा । माम् । कामिनी । अस: । यथा । मत् । न । अपऽगा: । अस: ॥८.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
विषय - पति-पत्नी की परस्पर प्रेम प्रतिज्ञा।
भावार्थ -
गृहस्थ धर्म का उपदेश करते हैं। (यथा) जिस प्रकार (लिबुजा) लता (वृक्षम्) वृक्ष को (समन्तम्) सब ओर से (परि सस्वजे) चिपट जाती है, उसी का आश्रय लेती हैं (एवा) इसी प्रकार हे स्त्रि ! (मां) मुझ पति को तू मेरी धर्मपत्नी (परिष्वजस्व) प्रेम से सब प्रकार से आलिंगन कर और मेरा आश्रय ले। और ऐसा व्यवहार कर कि तू (यथा) जिस प्रकार भी हो (मां कामिनी असः) मुझे ही अनन्य चित्त से चाहने वाली बनी रह, (यथा) जिससे (मत्) मुझे छोड़कर (अपगा) दूर जाने वाली (न असः) न हो। इस प्रकार पति अपनी पत्नी को उपदेश करे और उसे अपने आश्रय पर पालन करे।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - जमदग्निर्ऋषिः। कामात्मा देवता। १-३ पथ्या पंक्तिः। तृचं सूक्तम्॥
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