॥ओ३म्॥

यद॒ङ्ग दा॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत्तत्स॒त्यम॑ङ्गिरः॥ ऋग्वेद० 1/1/6॥

हे ब्रह्माण्ड के अङ्ग पृथिवी आदि पदार्थों को प्राणरूप और शरीर के अङ्गों को अन्तर्यामीरूप से रसरूप होकर रक्षा करनेवाले हे सब के मित्र परमेश्वर! जिस हेतु से आप निर्लोभता से उत्तम-उत्तम पदार्थों के दान करनेवाले मनुष्य के लिये कल्याण, जो कि शिष्ट विद्वानों के योग्य है, उसको करते हैं, सो यह आप ही का सत्यव्रत=शील है।

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