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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 108 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 108/ मन्त्र 3
    ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    च॒क्राथे॒ हि स॒ध्र्य१॒॑ङ्नाम॑ भ॒द्रं स॑ध्रीची॒ना वृ॑त्रहणा उ॒त स्थ॑:। तावि॑न्द्राग्नी स॒ध्र्य॑ञ्चा नि॒षद्या॒ वृष्ण॒: सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    च॒क्राथे॑ । हि । स॒ध्र्य॑क् । नाम॑ । भ॒द्रम् । स॒ध्री॒ची॒ना । वृ॒त्र॒ऽह॒णौ॒ । उ॒त । स्थः॒ । तौ । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । स॒ध्र्य॑ञ्चा । नि॒ऽसद्य॑ । वृष्णः॑ । सोम॑स्य । वृ॒ष॒णा॒ । आ । वृ॒षे॒था॒म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    चक्राथे हि सध्र्य१ङ्नाम भद्रं सध्रीचीना वृत्रहणा उत स्थ:। ताविन्द्राग्नी सध्र्यञ्चा निषद्या वृष्ण: सोमस्य वृषणा वृषेथाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    चक्राथे। हि। सध्र्यक्। नाम। भद्रम्। सध्रीचीना। वृत्रऽहणौ। उत। स्थः। तौ। इन्द्राग्नी इति। सध्र्यञ्चा। निऽसद्य। वृष्णः। सोमस्य। वृषणा। आ। वृषेथाम् ॥ १.१०८.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 108; मन्त्र » 3
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 26; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तौ कथंभूतावित्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे मनुष्या यौ सध्रीचीना वृत्रहणौ सध्र्यञ्चा निषद्य वृष्णः सोमस्य वृषणेन्द्राग्नी भद्रं सध्र्यङ् नाम चक्राथे कुरुत उतापि कार्यसिद्धिकारौ स्थो वृषेथां सुखं वर्षतस्तौ ह्या विजानन्तु ॥ ३ ॥

    पदार्थः

    (चक्राथे) कुरुतः (हि) खलु (सध्र्यक्) सहाञ्चतीति (नाम) जलम् (भद्रम्) वृष्ट्यादिद्वारा कल्याणकरम् (सध्रीचीना) सहाञ्चतः सङ्गतौ (वृत्रहणौ) वृत्रस्य मेघस्य हन्तारौ (उत) अपि (स्थः) भवतः (तौ) (इन्द्राग्नी) पूर्वोक्तौ (सध्र्यञ्चा) सहप्रशंसनीयौ (निषद्य) नित्यं स्थित्वा। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (वृष्णः) पुष्टिकारकस्य (सोमस्य) रसवतः पदार्थसमूहस्य (वृषणा) पोषकौ। अत्र सर्वत्र द्विवचनस्थाने सुपां सुलुगित्याकारादेशः। (आ) (वृषेथाम्) वर्षतः। व्यत्ययेन शः प्रत्यय आत्मनेपदं च ॥ ३ ॥

    भावार्थः

    मनुष्यैरत्यन्तमुपयोगिनाविन्द्राग्नी विदित्वा कथं नोपयोजनीयाविति ॥ ३ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वे कैसे हैं, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है ।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! जो (सध्रीचीना) एक साथ मिलने और (वृत्रहणौ) मेघ के हननेहारे (सध्र्यञ्चा) और एक साथ बड़ाई करने योग्य (निषद्य) नित्य स्थिर होकर (वृष्णः) पुष्टि करते हुए (सोमस्य) रसवान् पदार्थसमूह की (वृषणा) पुष्टि करनेहारे (इन्द्राग्नी) पूर्व कहे हुए अर्थात् पवन और सूर्य्यमण्डल (भद्रम्) वृष्टि आदि काम से परम सुख करनेवाले (सध्र्यक्) एक सङ्ग प्रकट होते हुए (नाम) जल को (चक्राथे) करते हैं (उत) और कार्य्यसिद्धि करनेहारे (स्थः) होते (वृषेथाम्) और सुखरूपी वर्षा करते हैं (तौ) उनको (हि) ही (आ) अच्छी प्रकार जानो ॥ ३ ॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को अत्यन्त उपयोग करनेहारे वायु और सूर्य्यमण्डल को जानके कैसे उपयोग में न लाने चाहिये ॥ ३ ॥

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    विषय

    शक्ति व प्रकाश का मेल

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्राग्नी) = इन्द्र व अग्नि - तत्त्वो ! बल व प्रकाश के देवताओ ! आप हि (नाम) = निश्चय से [नाम इति वाक्यालङ्कारे] (सध्र्यक्) = मिलकर ही (भद्रम्) = कल्याण (चक्राथे) = करते हो । केवल शक्ति से भी कल्याण नहीं , केवल प्रकाश से भी नहीं । शक्ति व प्रकाश का मेल ही कल्याणकर है । 

    २. (उत) = और (सधीचीना) = साथ - साथ चलनेवाले इन्द्र व अग्नि , शक्ति व प्रकाश (वृत्रहणौ स्थः) = सब वासनाओं को नष्ट करनेवाले हैं । ''वृत्र'' सब आसुरवृत्तियों का अग्रणी है । बल और प्रकाश का सम्पादन करने पर ये वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं । 

    ३. (तौ)= वे (इन्द्राग्नी) = शक्ति व प्रकाश (सध्र्यञ्चा) = साथ - साथ चलनेवाले होकर (निषद्य) = हमारे जीवनों में आसीन होकर (वृषणा) = सुखों का वर्षण करनेवाले हों और (वृष्णः सोमस्य) = शक्ति देनेवाले सोम - वीर्य का (आवृषेथाम्) = शरीर में सर्वत्र सेचन करनेवाले हों । शक्ति व प्रकाश की साधना की ओर चलते हुए हम सोम का रक्षण करें । वस्तुतः सोम का रक्षण ही हमें शक्ति व प्रकाश की साधना में सफल करता है । ''सोम के रक्षण से शक्ति व प्रकाश का साधन तथा शक्ति व प्रकाश की साधना से सोम का रक्षण'' यह इनका परस्पर भावन है । 
     

    भावार्थ

    भावार्थ - शक्ति व प्रकाश का मेल ही भद्र है , यही वासनाओं का विनाश करता है , यही हमें सोमपान [वीर्यरक्षण] के योग्य बनाता है । 

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    विषय

    इन्द्र और अग्नि, के समान राजा अमात्य, प्रकाशप्रद भ्राचार्य और अध्यात्म में जीव परमेश्वर का वर्णन

    भावार्थ

    ( इन्द्राग्नी वृष्णः सोमस्य वृषणा आवृषेथाम् ) सूर्य और वायु दोनों जिस प्रकार मिलकर वर्षा करने वाले मेघ के जल के वर्षाने वाले होकर वर्षा कर देते हैं अपना नाम, जन्म, स्वरूप आदि सब प्रजाओं के सुख के लिये समर्पित कर देते हैं उसी प्रकार ( तो इन्द्राग्नी ) राष्ट्र में वे दोनों इन्द्र और अग्नि, ऐश्वर्यवान् और उत्तम अग्रणी या नायक विद्वान् पुरुष दोनों ( सध्रीचीना ) एक साथ मिल कर अपने ( नाम ) नाम या शत्रुओं को झुका डालने वाले बल को ( सध्यङ् ) एक साथ ही मिल कर ( भद्रं ) प्रजा के सुखदायी रूप में ( चक्राथे ) कर देते हैं । ( उत हिं ) और वे दोनों (वृत्रहणा) मेघ को सूर्य और वायु के समान, बढ़ते हुए शत्रु को नाश करने में समर्थ होते हैं। वे दोनों ( सध्र्यञ्चा ) एक साथ मिले हुए ही ( वृषणा ) बलवान् एवं प्रजाओं पर सुख और शत्रुओं पर शस्त्रास्त्रों को बरसाने में समर्थ होकर ( निषद्य ) अपने उच्च आसनों पर विराज कर, जमकर या परस्पर का ज्ञानोपदेश ग्रहण करते हुए ( वृष्णः सोमस्य ) बलवान्, सब सुखों के देने वाले सोम अर्थात् समृद्ध राष्ट्र ऐश्वर्य की ( वृषेथाम् ) वृद्धि कर देते हैं, प्रजाओं को खूब सुखी, समृद्ध कर देते हैं । ( २ ) गुरु शिष्य भी परस्पर मिलकर एक दूसरे का नाम यशस्वी करते हैं, विघ्नों का नाश करते हैं, ( निषद्य ) एक दूसरे के संग में बैठ कर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ( वृष्णः सोमस्य ) सुखवर्षक वलवान् शिष्यगण या वीर्य पालन और ब्रह्मचर्य वृद्धि करते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स आङ्गिरस ऋषिः ॥ इन्द्राग्नी देवते ॥ छन्दः- १, ८, १२ निचृत् त्रिष्टुप् । २, ३, ६, ११ विराट् त्रिष्टुप् । ७, ९, १०, १३ त्रिष्टुप् । ४ भुरिक् पंक्तिः । ५ पंक्तिः । त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी अत्यंत उपयोगी असणारे वायू व सूर्यमंडळ जाणून उपयोगात का आणू नयेत? ॥ ३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra and Agni, together you are, together you exist, together you do good and together you break the cloud for rain. Therefore, acting together as ever, bring generous showers of the abundant soma joy of the Lord’s creation.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How are they (Indra and Agni) is taught further in the third Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men, you should know Indra and Agni (air and fire) which are united and are slayers of the cloud, admirable givers of happiness through the rain etc. nourishers, are sustainers of nourishing objects full of sap, the showerers of happiness; you should know them will.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (सध्यं चा) सह प्रशंसनीयौ = Most admirable together. (नाम) जलम् = Water. (निघ० १.१२ ) Tr.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Why should not people know Indra and Agni (air and fire ) and then utilize them properly ?

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