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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 3/ मन्त्र 11
    ऋषिः - मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः देवता - सरस्वती छन्दः - पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम्। य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती॥

    स्वर सहित पद पाठ

    चो॒द॒यि॒त्री । सू॒नृता॑नाम् । चेत॑न्ती । सु॒ऽम॒ती॒नाम् । य॒ज्ञम् । द॒धे॒ । सर॑स्वती ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्। यज्ञं दधे सरस्वती॥

    स्वर रहित पद पाठ

    चोदयित्री। सूनृतानाम्। चेतन्ती। सुऽमतीनाम्। यज्ञम्। दधे। सरस्वती॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 11
    अष्टक » 1; अध्याय » 1; वर्ग » 6; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते।

    अन्वयः

    या सूनृतानां सुमतीनां विदुषां चेतन्ती चोदयित्री सरस्वत्यस्ति, सैव वेदविद्या संस्कृता वाक् यज्ञं दधे दधाति॥११॥

    पदार्थः

    (चोदयित्री) शुभगुणग्रहणप्रेरिका (सूनृतानाम्) सुतरामूनयत्यनृतं यत्कर्म तत् सून् तदृतं यथार्थं सत्यं येषां ते सूनृतास्तेषाम्। अत्र ‘ऊन परिहाणे’ अस्मात् क्विप् चेति क्विप्। (चेतन्ती) सम्पादयन्ती सती (सुमतीनाम्) शोभना मतिर्बुद्धिर्येषां ते सुमतयस्तेषां विदुषाम् (यज्ञम्) पूर्वोक्तम्। (दधे) दधाति। छन्दसि लुङ्लङ्लिटः। (अष्टा०३.४.६) अनेन वर्त्तमाने लिट्। (सरस्वती) वाणी॥११॥

    भावार्थः

    या किलाप्तानां सत्यलक्षणा पूर्णविद्यायुक्ता छलादिदोषरहिता यथार्थवाणी वर्त्तते, सा मनुष्याणां सत्यज्ञानाय भवितुमर्हति नेतरेषामिति॥११॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    ईश्वर ने वह वाणी किस प्रकार की है, इस बात का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

    पदार्थ

    (सूनृतानाम्) जो मिथ्या वचन के नाश करने, सत्य वचन और सत्य कर्म को सदा सेवन करने (सुमतीनाम्) अत्यन्त उत्तम बुद्धि और विद्यावाले विद्वानों की (चेतन्ती) समझने तथा (चोदयित्री) शुभगुणों को ग्रहण करानेहारी (सरस्वती) वाणी है, वही (यज्ञम्) सब मनुष्यों के शुभ गुणों के प्रकाश करानेवाले यज्ञ आदि कर्म (दधे) धारण करनेवाली होती है॥११॥

    भावार्थ

    जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्यायुक्त और छल आदि दोषरहित विद्वान् मनुष्यों की सत्य उपदेश करानेवाली यथार्थ वाणी है, वही सब मनुष्यों के सत्य ज्ञान होने के लिये योग्य होती है, अविद्वानों की नहीं॥११॥

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    विषय

    सूनृत - सुमति - यज्ञ

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित सरस्वती की आराधना (सूनुतानाम्)  [सु ऊन् ऋत] - उत्तम  , दुःख का परिहाण करनेवाली  , सत्यवाणियों की (चोदयित्री) - प्रेरिका है  , अर्थात् स्वाध्याय करनेवाला व्यक्ति ऐसी ही वाणी बोलता है जो कि शोभन होती है  , दूसरों के दुः खों को दूर करनेवाली होती है तथा यथार्थ होती है । 
    २. यह (सरस्वती) - ज्ञान का निरूपण करनेवाली वेदवाणी (सुमतीनाम्) - उत्तम मतियों  , विचारों को (चेतन्ती) - चेतानेवाली होती है । स्वाध्यायशील व्यक्ति के मस्तिष्क में कभी कुमति व कुविचार नहीं उपजते; उसे ऐसे विचार सूझते ही नहीं । 
    ३. (सरस्वती) - यह ज्ञानाधिदेवता अपने उपासक के अन्दर (यज्ञं दधे) - यज्ञ को धारण करती है । स्वाध्यायशील व्यक्ति कभी अयज्ञिय कर्मों को नहीं करता । 

    भावार्थ

    भावार्थ - सरस्वती का आराधक मुख से सूनृत वाणी ही बोलता है  , मस्तिष्क में कुविचारों को नहीं आने देता  , हाथों को यज्ञात्मक उत्तम कर्मों में लगाये रखता है । एवं  , यह सरस्वती आराधक की 'वाणी  , मस्तिष्क व हाथ' सभी को पवित्र बनाती है । इससे आराधक के विचार  , उच्चार व आचार सभी पवित्र बनते हैं । 
     

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    विषय

    ईश्वर ने वह वाणी किस प्रकार की है, इस बात का उपदेश इस मन्त्र में किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    या सूनृतानां सुमतीनां विदुषां चेतन्ती चोदयित्री सरस्वती अस्ति, सा एव वेदविद्या संस्कृता वाक् यज्ञं दधे दधाति॥११॥

    पदार्थ

    (या)=जो (सूनृतानाम्) सुतरामूनयत्यनृतं यत्कर्म तत् सून् तदृतं यथार्थं सत्यं येषां ते सूनृतास्तेषाम् = जो मिथ्या वचन के नाश करने, सत्य वचन और सत्य कर्म को सदा सेवन करने, (सुमतीनाम्) शोभना मतिर्बुद्धिर्येषां ते= अत्यन्त उत्तम बुद्धि और विद्यावाले विद्वानों की, (चेतन्ती) सम्पादयन्ती सती= समझने तथा, (चोदयित्री) शुभगुणग्रहणप्रेरिका= शुभगुण ग्रहण  से प्रेरित करने वाली,  (सरस्वती) वाणी= वाणी,  (अस्ति)=है, (स)= वह, (एव)= ही, (वेदविद्या)= वेदविद्या, (संस्कृता)= अत्यन्त परिमार्जित, (वाक्)= वाणी, (यज्ञम्) पूर्वोक्तम्=पूर्व में कहे गए गुणों को, (दधे) दधाति =धारण करने वाली  होती  है।

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    जो निश्चित रूप से आप्तों के सत्य लक्षण हैं, जो पूर्ण विद्यायुक्त और छल आदि दोषों से रहित यथार्थ वाणी है, वह मनुष्यों के सत्य ज्ञान के लिए योग्य होती है, अन्यों के लिए नहीं॥११॥

    विशेष

    अनुवादक की टिप्पणी- महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार आप्त की परिभाषा-जो छलादि दोषरहित, धर्मात्मा, विद्वान् सत्योपदेष्टा, सब पर कृपादृष्टि से वर्त्तमान होकर अविद्यान्धकार का नाश करके अज्ञानी लोगों के आत्माओं में विद्यारूप सूर्य का प्रकाश सदा करे, उसको 'आप्त' कहते हैं।

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (या) जो (सूनृतानाम्) मिथ्या वचन को नाश करनेवाली, सत्य वचन और सत्य कर्म को सदा सेवन करनेवाली, (सुमतीनाम्) अत्यन्त उत्तम बुद्धि और विद्यावाले विद्वानों की (चेतन्ती) समझने तथा (चोदयित्री) शुभगुणों के ग्रहण करने से प्रेरित करनेवाली (सरस्वती) वाणी (अस्ति) है। (स) वह (एव)  ही (वेदविद्या) वेदविद्या है और (संस्कृता) अत्यन्त परिमार्जित (वाक्) वाणी है, (यज्ञम्) जो पूर्व में कहे गए गुणों को (दधे) धारण करने वाली  होती  है।

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (चोदयित्री) शुभगुणग्रहणप्रेरिका (सूनृतानाम्) सुतरामूनयत्यनृतं यत्कर्म तत् सून् तदृतं यथार्थं सत्यं येषां ते सूनृतास्तेषाम्। अत्र 'ऊन परिहाणे' अस्मात् क्विप् चेति क्विप्। (चेतन्ती) सम्पादयन्ती सती (सुमतीनाम्) शोभना मतिर्बुद्धिर्येषां ते सुमतयस्तेषां विदुषाम् (यज्ञम्) पूर्वोक्तम्। (दधे) दधाति। छन्दसि लुङ्लङ्लिटः। (अष्टा०३.४.६) अनेन वर्त्तमाने लिट्। (सरस्वती) वाणी॥११॥
    विषयः- पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते।

    अन्वयः- या सूनृतानां सुमतीनां विदुषां चेतन्ती चोदयित्री सरस्वत्यस्ति, सैव वेदविद्या संस्कृता वाक् यज्ञं दधे दधाति॥११॥
     
    भावार्थः(महर्षिकृतः)- या किलाप्तानां सत्यलक्षणा पूर्णविद्यायुक्ता छलादिदोषरहिता यथार्थवाणी वर्त्तते, सा मनुष्याणां सत्यज्ञानाय भवितुमर्हति नेतरेषामिति॥११॥

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    विषय

    वेद वाणी का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( सरस्वती ) उत्तम ज्ञानों से युक्त वेदवाणी (सू-नृतानां ) उत्तम सत्य ज्ञानों को ( चोदयित्री ) उपदेश करनेवाली और ( सुमतीनां ) उत्तम बुद्धि वाले विद्वान् पुरुषों को ( चेतन्ती ) ज्ञान प्रदान करती हुई उनके ( यज्ञं ) यज्ञ, श्रेष्ठ कर्म और देव-उपासना को ( दधे ) धारण करती, उसका उपदेश करती है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-१२ मधुच्छन्दा ऋषिः ॥ देवता—१-३ अश्विनौ । ४-६ इन्द्रः । ७-९ विश्वे देवाः । १०–१२ सरस्वती ।। गायत्र्य: ।। द्वादशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी आप्त अर्थात पूर्ण विद्यायुक्त व छल कपट इत्यादी दोषांनी रहित, माणसांना सत्य उपदेश करविणारी यथार्थ वाणी आहे, तीच सर्व माणसांना सत्य ज्ञान प्राप्त होण्यायोग्य असते, अविद्वानांची नाही. ॥ ११ ॥

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    इंग्लिश (4)

    Meaning

    Sarasvati, mother stream of eternal knowledge and divine speech, inspires the seekers of universal truth and cosmic law and enlightens the admirers of noble wisdom and understanding. The divine flow of light and knowledge carries on the universal yajna of nature and humanity.

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    Translation

    O divine speech, you inspire those who delight in truth. You instruct them who are diligent. Please assist us in our efforts to perform the organised sacred acts.

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    Subject of the mantra

    God has preached the type of speech in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yā)=Which, (sūnṛtānām)=destroyer of false words, who always uses true words and true deeds, (sumatīnām)=of scholars with excellent intellect and knowledge, (cetantī)=to understand and, (codayitrī)=motivator by good virtues, (sarasvatī)=speech, (asti)=is, (sa)=that,(eva)=only, (vedavidyā)=is speech of Vedas and, (saṃskṛtā)=highly refined, (vāk)=is that speech, (yajñam)=the virtues mentioned earlier (dadhe)=is possessor of.

    English Translation (K.K.V.)

    One who destroys false words, who always uses truthful words and having true deeds, has a very good intellect and it is the inspiring speech of learned scholars to understand and receive auspicious virtues. It is the knowledge of Vedas and the highly refined speech, which possesses the virtues mentioned in the past.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Which are certainly true signs of the āpta, the one who is full of knowledge and has accurate speech, free from deceit etc., that is fit for the true knowledge of human beings, not for others.

    TRANSLATOR’S NOTES-

    Definition of āpta according to Maharishi Dayanand Saraswati – One who is devoid of deceit, virtuous, learned preacher of truth, being present with the blessings of all, destroys the darkness of nescience and always gives light of the Sun in the form of knowledge in the souls of ignorant people, is called ' āpta'.

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    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Sarasvati-speech which is inspirer of acquiring noble virtues and is the instructress of the right minded, refined by the knowledge of the Vedas upholds the Yajna.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is only the science and true speech of the learned persons who are pure in thought, word and deed, which is full of all knowledge and devoid of all deceit that can give true knowledge to the people and not that of others.

    Translator's Notes

    According to Rishi Dayananda, the word Sarasvati also means a learned lady vide विद्य सुशिक्षितावागिवपत्नी (यजु० १०,३४ भाष्ये ) विदुषीस्त्री ( यजु० १९.१८.३४ भाष्ये ) वाणीव ज्ञानवती स्त्री ( यजु० १९.८८ मा० ) सुशिक्षिता विदुषी स्त्री (यजु० २०.७३ भाष्ये) विद्यावती (यजु० २०.८० भाष्ये) In this Mantra चोदयन्ती सूनृतानाम् सूनृता is also applicable to her, meaning that a learned lady always uses and instructs others to use true and sweet words, tenders good advice to all and performs the Yajnas well, having the spirit of service and sacrifice. Thus it teaches the duties of a learned lady besides the above interpretation regarding noble speech. The word सूनृता used in this Mantra means true and sweet speech. True and pleasant, kind and sincere, gentle, true and agreeable speech, these are the meanings given in Apte's and other Sanskrit Dictionaries.

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