ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 38 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 38/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कण्वो घौरः देवता - मरूतः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    हे (कधप्रियाः) सत्य कथाओं से प्रीति करानेवाले (वृक्तबर्हिषः) ऋत्विज् विद्वान् लोगो ! (न) जैसे (पिता) उत्पन्न करनेवाला जनक (पुत्रम्) पुत्र को (हस्तयोः) हाथों से धारण करता है, और जैसे पवन लोकों को धारण कर रहे हैं वैसे (कद्ध) कब प्रसिद्ध से (नूनम्) निश्चय करके यज्ञ कर्म को (दधिध्वे) धारण करोगे ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मंत्र में उपमा और वाचक लुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पिता हाथों से अपने पुत्र को ग्रहण कर शिक्षापूर्वक पालना तथा अच्छे कार्यों में नियुक्त करके सुखी होता और जैसे पवन सब लोकों को धारण करते हैं वैसे* विद्या से यज्ञ का ग्रहण कर युक्ति से अच्छे प्रकार सेवन करते हैं वे ही सुखी होते हैं ॥१॥ *सं० भा० के अनुसार यहाँ- जो मनुष्य इतना और होना चाहिये। सं०

    अन्वय -

    तत्रादिमे मंत्रे वायुरिव मनुष्यैर्भवितव्यमित्युपदिश्यते।

    पदार्थ -

    हे कधप्रिया वृक्तबर्हिषो विद्वांसः पिता हस्तयोः पुत्रं न मरुतो लोकानिव कद्ध नूनं यज्ञकर्म दधिध्वे ॥१॥

    भावार्थ -

    अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यथा पिता हस्ताभ्यां स्वपुत्रं गृहीत्वा शिक्षित्वा पालयित्वा सत्कार्येषु नियोज्य सुखी भवति तथैव ये मनुष्या मरुतो लोकानिव विद्यया यज्ञं गृहीत्वा युक्त्या संसेवन्ते त एव सुखिनो भवन्तीति ॥१॥

    Meanings -

    Heroes of yajna, lovers of the stories of life and nature, you have collected the sacred grass for the yajna vedi. When for sure are you going to take the work of the nation in hand like a father taking up the child in arms for its nurture and nourishment?

    भावार्थ -

    भावार्थ - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जसे पिता स्वतः पुत्राला शिक्षण देऊन पालन करतो व चांगल्या कार्यात नियुक्त करतो व सुखी होतो. जसे पवन सर्व गोलांना धारण करतात तसा विद्येने यज्ञाचे ग्रहण करून युक्तीने जे चांगल्या प्रकारे स्वीकार करतात तेच सुखी होतात. ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top