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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 57/ मन्त्र 1
    ऋषिः - सव्य आङ्गिरसः देवता - इन्द्र: छन्दः - जगती स्वरः - निषादः

    प्र मंहि॑ष्ठाय बृह॒ते बृ॒हद्र॑ये स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ म॒तिं भ॑रे। अ॒पामि॑व प्रव॒णे यस्य॑ दु॒र्धरं॒ राधो॑ वि॒श्वायु॒ शव॑से॒ अपा॑वृतम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । मंहि॑ष्ठाय । बृ॒ह॒ते । बृ॒हत्ऽर॑ये । स॒त्यऽशु॑ष्माय । त॒वसे॑ । म॒तिम् । भ॒रे॒ । अ॒पाम्ऽइ॑व । प्र॒व॒णे । यस्य॑ । दुः॒ऽधर॑म् । राधः॑ । वि॒श्वऽआ॑यु । शव॑से । अप॑ऽवृतम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे। अपामिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र। मंहिष्ठाय। बृहते। बृहत्ऽरये। सत्यऽशुष्माय। तवसे। मतिम्। भरे। अपाम्ऽइव। प्रवणे। यस्य। दुःऽधरम्। राधः। विश्वऽआयु। शवसे। अपऽवृतम् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 57; मन्त्र » 1
    अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 22; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः सभाध्यक्षो कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    यथाऽहं यस्य सभाद्यध्यक्षस्य शवसे प्रवणेऽपामिवापावृतं विश्वायु दुर्धरं राधोऽस्ति, तस्मै सत्यशुष्माय तवसे बृहद्रये बृहते मंहिष्ठाय मतिं प्रभरे तथा यूयमपि संधारयत ॥ १ ॥

    पदार्थः

    (प्र) प्रकृष्टार्थे (मंहिष्ठाय) योऽतिशयेन मंहिता दाता तस्मै। मंह इति दानकर्मसु पठितम्। (निघं०३.२०) (बृहते) गुणैर्महते (बृहद्रये) बृहन्तो रायो धनानि यस्य तस्मै। अत्र वर्णव्यत्ययेन ऐकारस्य स्थान एकारः। (सत्यशुष्माय) सत्यं शुष्मं बलं यस्य तस्मै (तवसे) बलवते (मतिम्) विज्ञानम् (भरे) धरे (अपामिव) जलानामिव (प्रवणे) निम्ने (यस्य) सभाध्यक्षस्य (दुर्धरम्) शत्रुभिर्दुःखेन धर्तुं योग्यम् (राधः) विद्याराज्यसिद्धं धनम् (विश्वायु) विश्वं सर्वमायुर्यस्मात्तत् (शवसे) सैन्यबलाय (अपावृतम्) दानाय भोगाय वा प्रसिद्धम् ॥ १ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। यथा जलमूर्ध्वाद्देशादागत्य निम्नदेशस्थं जलाशयं प्राप्य स्थिरं स्वच्छं भवति तथा नम्राय धार्मिकाय बलवते पुरुषार्थिने मनुष्यायाक्षयं धनं निश्चलं जायते। यो राज्यश्रियं प्राप्य सर्वहिताय विद्यावृद्धये शरीरात्मबलोन्नतये प्रददाति, तमेव शूरं प्रदातारं सभाशालासेनापतित्वे वयमभिषिञ्चेम ॥ १ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    जैसे मैं यस्य जिस सभा आदि के अध्यक्ष के (शवसे) बल के लिये (प्रवणे) नीचे स्थान में (अपामिव) जलों के समान (अपावृतम्) दान वा भोग के लिये प्रसिद्ध (विश्वायु) पूर्ण आयुयुक्त (दुर्धरम्) दुष्ट जनों को दुःख से धारण करने योग्य (राधः) विद्या वा राज्य से सिद्ध हुआ धन है, उस (सत्यशुष्माय) सत्य बलों का निमित्त (तवसे) बलवान् (बृहद्रये) बड़े उत्तम-उत्तम धन युक्त (बृहते) गुणों से बड़े (मंहिष्ठाय) अत्यन्त दान करनेवाले सभाध्यक्ष के लिये (मतिम्) विज्ञान को (प्रभरे) उत्तम रीति से धारण करता हूँ, वैसे तुम भी धारण कराओ ॥ १ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे जल ऊँचे देश से आकर नीचे देश अर्थात् जलाशय को प्राप्त होके स्वच्छ, स्थिर होता है, वैसे नम्र, बलवान् पुरुषार्थी, धार्मिक, विद्वान् मनुष्य को प्राप्त हुआ विद्यारूप धन निश्चल होता है। जो राज्यलक्ष्मी को प्राप्त हो के सबके हित, न्याय वा विद्या की वृद्धि तथा शरीर, आत्मा के बल की उन्नति के लिये देता है, उसी शूरवीर, विद्यादि देनेवाले सभाशाला सेनापति मनुष्य का हम लोग अभिषेक करें ॥ १ ॥

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    विषय

    विश्वायु राधः

    पदार्थ

    १. मैं (मंहिष्ठाय) = [दातृतमाय] अधिक - से - अधिक देनेवाले, (बृहते) = गुणों के दृष्टिकोण से बढ़े हुए, (बृहद्ये) = अत्यन्त प्रवृद्ध ऐश्वर्यवाले, (सत्यशुष्माय) = सत्य के बलवाले (तवसे) = स्थान के दृष्टिकोण से भी बढ़े हुए, अर्थात् सर्वव्यापक - प्रभु के लिए (प्रमतिम्) = प्रकृष्ट स्तुति को (भरे) = धारण करता हूँ । प्रभु के स्तवन से मुझे उन्नति के लिए सब आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति होगी । प्रभु के गुणों का स्मरण मेरे सामने एक लक्ष्यदृष्टि को पैदा करेगा । उस लक्ष्मीपति की उपासना से मुझे लक्ष्मी की भी कमी न रहेगी । उस 'सत्यशुष्म' की उपासना से मैं भी सत्य के बलवाला होऊँगा तथा उस प्रवृद्ध प्रभु का उपासन मुझे भी व्यापक पृथिवीरूप परिवारवाला बनाएगा । २. मैं उस प्रभु का उपासन करता हूँ (यस्य) = जिसका बल उसी प्रकार (दुर्धरम्) = शत्रुओं से असह्य होता है (इव) = जिस प्रकार (प्रवणे) = निम्न प्रदेश की ओर (अपाम्) = जलों का वेग रोकने के उपाय नहीं होता । निम्न स्थल की ओर जल तीन वेग से बहते हैं, उनका रोकना सम्भव नहीं होता, उसी प्रकार उस प्रभु की शक्ति दुर्धर है । प्रभु के कार्यों में कोई रुकावट नहीं डाल सकता । ३. उस प्रभु का (विश्वायु राधः) = पूर्ण जीवन देनवाला धन (शवसे) = शक्ति की वृद्धि के लिए (अपावृतम्) = सबके लिए खुला हुआ है । प्रभु के धन को प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त कर सकता है । उस धन का अधिकार समानरूप से सबके लिए है । जो भी व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण बनाने की कामना करता है तथा शक्ति की वृद्धि के लिए यत्न करता है, वह प्रभु के उस धन को अवश्य प्राप्त करता है । वास्तव में जब इस धन को हम प्रभु का न समझकर अपना समझने लगते हैं, तभी हम उस धन को भोग - विलास में व्यय करते हैं और भोग - विलास में आसक्त करनेवाला यह धन हमें "विश्वायु" के स्थान पर क्षीणायु कर देता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु दातृतम हैं, प्रभु की शक्ति दुर्धर है । उसका धन हमें विश्वायु - पूर्ण जीवनवाला बनाता है ।

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    विषय

    परमेश्वर, राजा, सभा और सेना के अध्यक्षों के कर्तव्यों और सामथ्यर्थों का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( प्रवणे अपाम् इव ) नीचे प्रदेश में वेग से आते हुए जलों के वेग को जिस प्रकार रोका नहीं जा सकता, उसी प्रकार (प्रवणे) अपने आगे विनय से रहने वाले भृत्य आदि जनों को प्राप्त होने वाला (यस्य) जिस वीर सभा और सेना आदि के अधिपति राजा का ( विश्वायु ) समस्त आयु भर (शवसे) बल की वृद्धि के लिये (अपावृतम् ) खुला हुआ, बेरोक बहाता हुआ ( राधः ) धनैश्वर्य का प्रवाह भी ( दुर्धरम् ) ऐसा प्रबल हो, जिसको प्रतिपक्षी शत्रु रोक न सके। ऐसे (मंहिष्ठाय) बड़े भारी दानशील, (बृहते) गुणों में महान्, (बृहद्रये) बड़े भारी वेग वाले, (सत्यशुष्माय) सत्य के बल वाले, अथवा सज्जनों के उपकार के लिये बल का प्रयोग करने, वाले, ( तवसे ) बलवान् पुरुष के लिये मैं ( मतिम् ) ज्ञान, स्तुति और अधिकार ( भरे ) प्रदान करूं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सव्य आङ्गिरस ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः- १, २, ४ जगती । ३ विराट् । ६ निचृज्जगती । ५ भुरिक् त्रिष्टुप् । षडृचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    फिर सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    यथा अहं यस्य सभाद्यध्यक्षस्य शवसे प्रवणे अपाम् इव अपावृतं विश्वायु दुर्धरं राधः अस्ति, तस्मै सत्यशुष्माय तवसे बृहद्रये बृहते मंहिष्ठाय मतिं प्र भरे तथा यूयम् अपि संधारयत ॥१॥

    पदार्थ

    (यथा)=जैसे, (अहम्)=मैं, (यस्य)=जिस, (सभाद्यध्यक्षस्य)= सभा आदि के अध्यक्ष के, (शवसे) सैन्यबलाय=सैन्य बल के लिये, (प्रवणे) निम्ने=गहरे, (अपामिव) जलानामिव=जलों के समान, (अपावृतम्) दानाय भोगाय वा प्रसिद्धम्= दान, भोग या प्रसिद्धि के लिये, (विश्वायु) विश्वं सर्वमायुर्यस्मात्तत् = विश्व के सब आयुवालों के, (दुर्धरम्) शत्रुभिर्दुःखेन धर्तुं योग्यम्=शत्रुओं के द्वारा दुःख से धारण करने योग्य, (राधः) विद्याराज्यसिद्धं धनम्= विद्या और राज्य से सिद्ध किया हुआ धन, (अस्ति)=है। (तस्मै)=उसके लिये, (सत्यशुष्माय) सत्यं शुष्मं बलं यस्य तस्मै=सत्य बलवाले, (तवसे) बलवते=बलवान्, (बृहद्रये) बृहन्तो रायो धनानि यस्य तस्मै= बड़े धनवाले के लिये, (बृहते) गुणैर्महते =बहुत गुणी, (मंहिष्ठाय)= अत्यधिक प्रचुर मात्रा के लिये, (मतिम्) विज्ञानम्= विशेष ज्ञान, (प्र) प्रकृष्टार्थे=प्रकृष्ट रूप से, (भरे) धरे=भूमि में, (तथा)=वैसे ही, (यूयम्)=तुम सब, (अपि)= भी, (संधारयत)= अनुसरण करो ॥१॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे जल ऊँचे देश से आकर नीचे देश के जलाशय को प्राप्त करके स्थिर और स्वच्छ होता है, वैसे ही नम्र, धार्मिक, बलवान् पुरुषार्थी मनुष्य के लिये अक्षय धन निश्चल होता है। जो राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करके सबके हित के लिये, विद्या की वृद्धि के लिये शरीर और आत्मा के बल की उन्नति के लिये देता है, उसी शूरवीर देनेवाले सभाशाला के सेनापति रहने में हम लोग स्वयं को पवित्र करें ॥१॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (यथा) जैसे (अहम्) मैं, (यस्य) जिस (सभाद्यध्यक्षस्य) सभा आदि के अध्यक्ष के (शवसे) सैन्य बल के लिये (प्रवणे) गहरे (अपामिव) जलों के समान (अपावृतम्) दान, भोग या प्रसिद्धि के लिये, (विश्वायु) विश्व के सब आयुवालों का, (दुर्धरम्) शत्रुओं के द्वारा दुःख से धारण करने योग्य, (राधः) विद्या और राज्य से सिद्ध किया हुआ धन (अस्ति) है। (तस्मै) उसके लिये (सत्यशुष्माय) सत्य बलवाले (तवसे) बलवान् [अध्यक्ष], (बृहद्रये) बड़े धनवाले के लिये, (बृहते) बहुत गुणी और (मंहिष्ठाय) अत्यधिक प्रचुर मात्रा के लिये (मतिम्) विशेष ज्ञान को, (प्र) प्रकृष्ट रूप से (भरे) पृथिवी में, (तथा) वैसे ही (यूयम्) तुम सब (अपि) भी (संधारयत) अनुसरण करो ॥१॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (प्र) प्रकृष्टार्थे (मंहिष्ठाय) योऽतिशयेन मंहिता दाता तस्मै। मंह इति दानकर्मसु पठितम्। (निघं०३.२०) (बृहते) गुणैर्महते (बृहद्रये) बृहन्तो रायो धनानि यस्य तस्मै। अत्र वर्णव्यत्ययेन ऐकारस्य स्थान एकारः। (सत्यशुष्माय) सत्यं शुष्मं बलं यस्य तस्मै (तवसे) बलवते (मतिम्) विज्ञानम् (भरे) धरे (अपामिव) जलानामिव (प्रवणे) निम्ने (यस्य) सभाध्यक्षस्य (दुर्धरम्) शत्रुभिर्दुःखेन धर्तुं योग्यम् (राधः) विद्याराज्यसिद्धं धनम् (विश्वायु) विश्वं सर्वमायुर्यस्मात्तत् (शवसे) सैन्यबलाय (अपावृतम्) दानाय भोगाय वा प्रसिद्धम् ॥ १ ॥ विषयः-पुनः सभाध्यक्षो कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- यथाऽहं यस्य सभाद्यध्यक्षस्य शवसे प्रवणेऽपामिवापावृतं विश्वायु दुर्धरं राधोऽस्ति, तस्मै सत्यशुष्माय तवसे बृहद्रये बृहते मंहिष्ठाय मतिं प्रभरे तथा यूयमपि संधारयत ॥१॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रोपमालङ्कारः। यथा जलमूर्ध्वाद्देशादागत्य निम्नदेशस्थं जलाशयं प्राप्य स्थिरं स्वच्छं भवति तथा नम्राय धार्मिकाय बलवते पुरुषार्थिने मनुष्यायाक्षयं धनं निश्चलं जायते। यो राज्यश्रियं प्राप्य सर्वहिताय विद्यावृद्धये शरीरात्मबलोन्नतये प्रददाति, तमेव शूरं प्रदातारं सभाशालासेनापतित्वे वयमभिषिञ्चेम ॥१॥

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    मराठी (1)

    विषय

    या सूक्तात अग्नी व सभाध्यक्ष इत्यादींच्या गुणांच्या वर्णनाने या सूक्तार्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे. ॥

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे जल उंच स्थानावरून खाली येते व जलाशयाला मिळते आणि स्वच्छ व स्थिर होते. तसे नम्र बलवान, पुरुषार्थी, धार्मिक विद्वान माणसाला प्राप्त झालेले विद्यारूपी धन निश्चल असते. जो राजलक्ष्मी प्राप्त करून सर्वांच्या हितासाठी न्याय, विद्येची वृद्धी करतो व शरीर आणि आत्मा यांचे बल वाढवितो त्याच शूरवीर विद्या देणाऱ्या सभेच्या सेनापतीचा आम्ही अभिषेक करावा. ॥ १ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    To the most generous lord of the world, Indra, great, awfully wealthy, truly fragrant blissful, and mighty strong, I offer my homage of faith and celebration whose universal gift of wealth, knowledge and efficiency of karma, released and open to all for strength and enlightenment, flows freely like streams of water rushing down to the sea.

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    Subject of the mantra

    Then how should the Chairman of the Assembly be, this subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yathā) =Like, (aham) =I, (yasya) =whose, (sabhādyadhyakṣasya) =of the Chairman etc., (śavase)=for military force, (pravaṇe) =deep, (apāmiva) =like waters, (apāvṛtam)=for charity, enjoyment or fame, (viśvāyu)=people of all ages in the world, (durdharam)=by the enemies bearable with sorrow, (rādhaḥ)= wealth acquired through learning and state, (asti) =is, (tasmai) =for that, (satyaśuṣmāya)=having true power, (tavase)=strong, [adhyakṣa]=Chairman, (bṛhadraye)=for the rich, (bṛhate)=very talented and, (maṃhiṣṭhāya)=for great abundance, (matim)=special knowledge, (pra)=eminently, (bhare) =in the earth,, (tathā) =similarly, (yūyam) =all of you, (api) =also, (saṃdhārayata) =follow.

    English Translation (K.K.V.)

    Like me, the chairman of whose Assembly, like deep waters for charity, enjoyment or fame, is the wealth of people of all ages in the world, capable of being held by enemies without suffering, made perfect by knowledge and kingdom. For that, for the strong chairman with true power, for the one with great wealth, for the very virtuous and extremely abundant special knowledge, in the natural form in the earth, similarly all of you also follow.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Just as water comes from a high place and becomes stable and clean after reaching the reservoir of a low place, in the same way, inexhaustible wealth becomes stable for a humble, righteous and strong effort-making man. Let us purify ourselves to be the Chairman of the Assembly of the same warrior who gives us Rajya Lakshmi for the benefit of all, for the increase of knowledge and for the advancement of strength of body and soul.

    TRANSLATOR’S NOTES-

    1-Rajalakshmi- The prosperity of the king has been called Rajalakshmi in vedic scriptures.

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