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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 61/ मन्त्र 13
    ऋषिः - नोधा गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    अ॒स्येदु॒ प्र ब्रू॑हि पू॒र्व्याणि॑ तु॒रस्य॒ कर्मा॑णि॒ नव्य॑ उ॒क्थैः। यु॒धे यदि॑ष्णा॒न आयु॑धान्यृघा॒यमा॑णो निरि॒णाति॒ शत्रू॑न् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । इत् । ऊँ॒ इति॑ । प्र । ब्रू॒हि॒ । पू॒र्व्याणि॑ । तु॒रस्य॑ । कर्मा॑णि । नव्यः॑ । उ॒क्थैः । यु॒धे । यत् । इ॒ष्णा॒नः । आयु॑धानि । ऋ॒घा॒यमा॑णः । नि॒ऽरि॒णाति॑ । शत्रू॑न् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः। युधे यदिष्णान आयुधान्यृघायमाणो निरिणाति शत्रून् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य। इत्। ऊँ इति। प्र। ब्रूहि। पूर्व्याणि। तुरस्य। कर्माणि। नव्यः। उक्थैः। युधे। यत्। इष्णानः। आयुधानि। ऋघायमाणः। निऽरिणाति। शत्रून् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 61; मन्त्र » 13
    अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 29; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स सभाध्यक्षः किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे विद्वन् ! यद्यः सभाद्यध्यक्षो यथर्घायमाण आयुधानीष्णानो नव्यो युधे शत्रून् निरिणाति तस्य तुरस्येदुक्थैः पूर्व्याणि नव्यानि च कर्माणि करोति तथा त्वं प्रब्रूहि ॥ १३ ॥

    पदार्थः

    (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (इत्) अपि (उ) आकाङ्क्षायाम् (प्र) प्रत्यक्षे (ब्रूहि) कथय (पूर्व्याणि) पूर्वैः कृतानि (तुरस्य) त्वरमाणस्य (कर्माणि) कर्त्तुं योग्यानि कर्त्तुरीप्सिततमानि (नव्यः) नवान्येव नव्यानि नूतनानि (उक्थैः) वक्तुं योग्यैः वचनैः (युधे) युध्यन्ति अस्मिन् संग्रामे तस्मै (यत्) यः (इष्णानः) अभीक्ष्णं निष्पादयन् शोधयन् (आयुधानि) शतघ्नीभुशुण्ड्यादीनि शस्त्राणि, आग्नेयादीन्यस्त्राणि वा (ऋघायमाणः) ऋघो हिंसित इवाचरति। अत्र रघधातो बाहुलकाद् औणादिकोऽन् प्रत्ययः। सम्प्रसारणं च तत आचारे क्यङ्। (निरिणाति) नित्यं हिनस्ति (शत्रून्) वैरिणो दुष्टान् ॥ १३ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः सभाद्यध्यक्षादीनां विद्याविनयशत्रुपराजयकरणादीनि कर्माणि प्रशंस्योत्साह्यैते सदा सत्कर्त्तव्याः। एतै राजपुरुषैः शस्त्रास्त्रशिक्षाशिल्पकुशलान् सेनास्थान् वीरान् सङ्गृह्य शत्रून् पराजित्य प्रजाः सततं संरक्ष्याः ॥ १३ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह सभाध्यक्ष क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    हे विद्वन् मनुष्य ! (यत्) जो सभा आदि का पति जैसे (ऋघायमाणः) मरे हुए के समान आचरण करनेवाले (आयुधानि) तोप, बन्दूक, तलवार आदि शस्त्र-अस्त्रों को (इष्णानः) नित्य-नित्य सम्हालते और शोधते हुए (नव्यः) नवीन शस्त्रास्त्र विद्या को पढ़े हुए आप (युधे) संग्राम में (शत्रून्) दुष्ट शत्रुओं को (निरिणाति) मारते हो, उस (तुरस्य) शीघ्रतायुक्त (अस्य) सभापति आदि के (इत्) ही (उक्थैः) कहने योग्य वचनों से (पूर्व्याणि) प्राचीन सत्पुरुषों ने किये (कर्माणि) करने योग्य और करनेवाले को अत्यन्त इष्ट कर्मों को करता है, वैसे (प्र ब्रूहि) अच्छे प्रकार कहो ॥ १३ ॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि सभाध्यक्ष आदि के विद्या, विनय, न्याय और शत्रुओं को जीतना आदि कर्मों की प्रशंसा करके और उत्साह देकर इन का सदा सत्कार करें तथा इन सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों से शस्त्रास्त्र चलाने की शिक्षा और शिल्पविद्या की चतुराई को प्राप्त हुए सेना में रहनेवाले वीर पुरुषों के साथ शत्रुओं को जीत कर प्रजा की निरन्तर रक्षा करें ॥ १३ ॥

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    विषय

    आयुधों की प्राप्ति

    पदार्थ

    १. (अस्य) = इस (तुरस्य) = [त्वर्] शीघ्रता से कार्यों को करनेवाले अथवा [तुर्वी] शत्रु - संहारक (नव्यः) = स्तुति के योग्य प्रभु के (पूर्व्याणि) = जीव की पूर्णता के साधक (कर्माणि) = कार्यों को (इत् उ) = ही (उक्थैः) = स्तोत्रों के द्वारा (प्रब्रूहि) = प्रतिपादन कर । २. (यत्) = चूंकि प्रभु ही (युधे) = युद्ध के लिए, वासनात्मक वृत्र के साथ संग्राम के लिए (आयुधानि) = क्रियाशीलता व ज्ञान आदि आयुधों को (इष्णानः) = प्राप्त कराते हुए (ऋघायमाणः) = शत्रुओं की हिंसा के हेतु से (शत्रून् निरिणाति) = शत्रुओं के अभिमुख जाते हैं । शत्रुओं पर आक्रमण प्रभु ही करते हैं । हमारे लिए इनपर आक्रमण करते हुए वे प्रभु हमें विजयी बनाते हैं । प्रभु के ये शत्रु - संहारात्मक कर्म पूर्व्य हैं, हमारा पूरण करनेवाले हैं । इन कर्मों के स्तवन से हमें प्रेरणा मिलती है और हममें शक्ति का सञ्चार होता है । इन अध्यात्म - शत्रुओं के साथ युद्ध के लिए हम उत्साहित होते हैं और इन शत्रुओं को परास्त करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु हमें कामादि शत्रुओं के साथ युद्ध के लिए ज्ञान व कर्मरूप अस्त्रों को प्राप्त कराते हैं । हमें इस युद्ध के लिए उत्साहयुक्त करते हैं ।

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    विषय

    युद्ध विद्या के नित्य अभ्यास का उपदेश

    भावार्थ

    हे विद्वान् पुरुष ! (यः) जो वीर पुरुष (ऋघायमाणः) शत्रुओं का नाश करनेवाले योद्धा के समान अभ्यास करनेवाला ( नव्यः ) नया ही (आयुधानि इष्णानः) शस्त्रों और अस्त्रों का अभ्यास करता हुआ (युधे) संग्राम के विजय के लिए (शत्रून् निरिणाति) शत्रुओं के नाश का नित्य अभ्यास करे । हे विद्वन् ! तू ( अस्य इत् उ ) उस (तुरस्य) अति शीघ्रकारी क्रियाकुशल पुरुष को (पूर्वाणि) पूर्व पुरुषों के आविष्कार किये हुए, अथवा वर्तमान के शिष्यों की अपेक्षा पूर्व के शिक्षित और विद्याकुशल गुरुओं द्वारा रचे हुए ( कर्माणि ) युद्धोपयोगी कार्यों के ( उक्थैः ) प्रवचनों द्वारा (प्र ब्रूहि) अच्छी प्रकार उपदेश कर, सिखा । अर्थात् नवप्रविष्ट युद्ध-शिक्षाभ्यासियों को विद्वान् पुरुष पूर्व के आचार्यों द्वारा रचे कर्तव्यों और कर्मों की शिक्षा दें और वे तदनुसार शस्त्रास्त्रों का युद्ध में शत्रुओं पर आक्रमण करने में प्रबल होने के लिए ही पुनः पुनः अभ्यास करें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    नोधा गौतम ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः–१, १४, १६ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ९ निचृत् विष्टुप् । ३, ४, ६, ८, १०, १२ पंक्तिः । ५, १५ विराट पंक्तिः । ११ भुरिक् पंक्ति: । १३ निचृतपंक्तिः । षोडशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    फिर वह सभाध्यक्ष आदि क्या करें, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    हे विद्वन् ! यत् यः सभाद्यध्यक्षः यथा {उ} ऋघायमाणः आयुधानि इष्णानः नव्यः युधे शत्रून् निरिणाति तस्य तुरस्य इत् उक्थैः पूर्व्याणि नव्यानि च कर्माणि करोति तथा त्वं प्र ब्रूहि ॥१३॥

    पदार्थ

    हे (विद्वन्)= विद्वान् ! (यत्) यः=जो, (सभाद्यध्यक्षः)=सभा आदि का अध्यक्ष, (यथा)=जिस प्रकार से, {उ} आकाङ्क्षायाम्=आकाङ्क्षा में, (ऋघायमाणः) ऋघो हिंसित इवाचरति= घायल के समान आचरण करता है, (आयुधानि) शतघ्नीभुशुण्ड्यादीनि शस्त्राणि, आग्नेयादीन्यस्त्राणि वा= तोप, बन्दूक, तलवार आदि शस्त्र-अस्त्रों को, (इष्णानः) अभीक्ष्णं निष्पादयन् शोधयन्=बनाकर उन्हें परिमार्जित करते हुए, (नव्यः) नवान्येव नव्यानि नूतनानि=नये-नये, (युधे) युध्यन्ति अस्मिन् संग्रामे तस्मै=युद्ध में, (शत्रून्) वैरिणो दुष्टान्=दुष्ट शत्रुओं को, (निरिणाति) नित्यं हिनस्ति=नित्य मारता है। (तस्य)=उस, (तुरस्य) त्वरमाणस्य= शीघ्रकारी के, (इत्) अपि=भी, (उक्थैः) वक्तुं योग्यैः वचनैः=बोलने योग्य वचनों से, (पूर्व्याणि) पूर्वैः कृतानि=पहले किये गये, (च)=और, (नव्यानि)=नये-नये, (कर्माणि) कर्त्तुं योग्यानि कर्त्तुरीप्सिततमानि=किये जाने योग्य और अभीष्ट कर्मों को, (करोति)=करता है, (तथा) =वैसे ही, (त्वम्)=तुम, (प्र) प्रत्यक्षे= प्रत्यक्ष रूप में, (ब्रूहि) कथय=कहो ॥१३॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों के द्वारा सभा आदि के अध्यक्षों के विद्या, विनय, शत्रुओं को पराजित करने आदि कर्मों को प्रशंसित और उत्साहित करके, इनका का सदा सत्कार करना चाहिए। इन सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों के द्वारा शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा और शिल्प कला में कुशल सेना में स्थित वीरों को एकत्रित करके शत्रुओं को पराजित करके, प्रजा की निरन्तर रक्षा करनी चाहिए ॥१३॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    हे (विद्वन्) विद्वान् ! (यत्) जो (सभाद्यध्यक्षः) सभा आदि का अध्यक्ष, (यथा) जिस प्रकार से {उ} आकाङ्क्षा में, (ऋघायमाणः) घायल के समान आचरण करता है। (आयुधानि) तोप, बन्दूक, तलवार आदि अस्त्र-शस्त्रों को (इष्णानः) बनाकर उन्हें परिमार्जित करते हुए, (नव्यः) नवीन (युधे) युद्ध में (शत्रून्) दुष्ट शत्रुओं को (निरिणाति) नित्य मारता है। (तस्य) उस (तुरस्य) शीघ्रकारी [शत्रु के लिये] (इत्) भी (उक्थैः) बोलने योग्य वचनों से, (पूर्व्याणि) पहले किये गये (च) और (नव्यानि) नवीन (कर्माणि) किये जाने योग्य और अभीष्ट कर्मों को (करोति) करता है। (तथा) वैसे ही (त्वम्) तुम (प्र) प्रत्यक्ष रूप में (ब्रूहि) कहो ॥१३॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य (इत्) अपि (उ) आकाङ्क्षायाम् (प्र) प्रत्यक्षे (ब्रूहि) कथय (पूर्व्याणि) पूर्वैः कृतानि (तुरस्य) त्वरमाणस्य (कर्माणि) कर्त्तुं योग्यानि कर्त्तुरीप्सिततमानि (नव्यः) नवान्येव नव्यानि नूतनानि (उक्थैः) वक्तुं योग्यैः वचनैः (युधे) युध्यन्ति अस्मिन् संग्रामे तस्मै (यत्) यः (इष्णानः) अभीक्ष्णं निष्पादयन् शोधयन् (आयुधानि) शतघ्नीभुशुण्ड्यादीनि शस्त्राणि, आग्नेयादीन्यस्त्राणि वा (ऋघायमाणः) ऋघो हिंसित इवाचरति। अत्र रघधातो बाहुलकाद् औणादिकोऽन् प्रत्ययः। सम्प्रसारणं च तत आचारे क्यङ्। (निरिणाति) नित्यं हिनस्ति (शत्रून्) वैरिणो दुष्टान् ॥१३॥ विषयः- पुनः स सभाध्यक्षः किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- हे विद्वन् ! यद्यः सभाद्यध्यक्षो यथर्घायमाण आयुधानीष्णानो नव्यो युधे शत्रून् निरिणाति तस्य तुरस्येदुक्थैः पूर्व्याणि नव्यानि च कर्माणि करोति तथा त्वं प्रब्रूहि ॥१३॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः सभाद्यध्यक्षादीनां विद्याविनयशत्रुपराजयकरणादीनि कर्माणि प्रशंस्योत्साह्यैते सदा सत्कर्त्तव्याः। एतै राजपुरुषैः शस्त्रास्त्रशिक्षाशिल्पकुशलान् सेनास्थान् वीरान् सङ्गृह्य शत्रून् पराजित्य प्रजाः सततं संरक्ष्याः ॥१३॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी सभाध्यक्ष इत्यादीच्या विद्या, विनय, न्याय व शत्रूंना जिंकणे इत्यादी कर्मांची प्रशंसा करून उत्साहित करावे व त्याचा सदैव सत्कार करावा. या सभाध्यक्ष इत्यादी राजपुरुषांनी शस्त्रास्त्र चालविण्याचे शिक्षण व शिल्पविद्येच्या चतुराईने प्राप्त झालेल्या सेनेतील वीर पुरुषांबरोबर राहून शत्रूंना जिंकून प्रजेचे सदैव रक्षण करावे. ॥ १३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Sing and celebrate the old and new exploits of this fast and powerful Indra in songs of praise, Indra who, passionate and tempestuous, updating and wielding the weapons for battle, strikes and destroys the enemies.

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    Subject of the mantra

    Then what should the Chairmen etc. of the Assemblies do, this matter has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (vidvan) =scholar, (yat) =that, (sabhādyadhyakṣaḥ)=Chairman of the Assembly etc., (yathā) =in which way, {u} =in aspiration, (ṛghāyamāṇaḥ)=behaves like an injured person, (āyudhāni)=weapons like cannon, gun, sword etc., (iṣṇānaḥ)= by making and refining them, (navyaḥ) =new, (yudhe) =in war, (śatrūn)=to evil enemies, (niriṇāti) =kills daily, (tasya) =that, (turasya)=hasty, [śatru ke liye]=for the enemy, (it) =also, (ukthaiḥ) =with words worth speaking, (pūrvyāṇi)= done before, (ca) =and, (navyāni) =new, (karmāṇi)= the deeds to be done and desired, (karoti) =does, (tathā) =similarly, (tvam) =you, (pra) =directly, (brūhi) =say.

    English Translation (K.K.V.)

    O scholar! The way the Chairman of the Assembly etc. behaves like a wounded person in aspiration. Making and refining weapons like cannon, gun, sword etc., he daily kills evil enemies in new wars. With words capable of being spoken even to that hasty enemy, he performs the actions already done, those to be done again, and the desired actions. Similarly, you say it directly.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is silent vocal simile as a figurative in this mantra. People should always respect the Chairmen of the Assemblies etc. by praising and encouraging them for their knowledge, humility, defeating enemies et cetera. Through these royal men like the Chairman of the Assembly, the education of weapons and scriptures and the skillful art of craft, the warriors in the army should be gathered and the people should be continuously protected by defeating the enemies.

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