ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 61/ मन्त्र 16
ए॒वा ते॑ हारियोजना सुवृ॒क्तीन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ गोत॑मासो अक्रन्। ऐषु॑ वि॒श्वपे॑शसं॒ धियं॑ धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥
स्वर सहित पद पाठए॒व । ते॒ । हा॒रि॒ऽयो॒ज॒न॒ । सु॒ऽवृ॒क्ति । इन्द्र॑ । ब्रह्मा॑णि । गोत॑मासः । अ॒क्र॒न् । आ । ए॒षु॒ । वि॒श्वऽपे॑शसम् । धिय॑म् । धाः॒ । प्रा॒तः । म॒क्षु । धि॒याऽव॑सुः । ज॒ग॒म्या॒त् ॥
स्वर रहित मन्त्र
एवा ते हारियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्। ऐषु विश्वपेशसं धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥
स्वर रहित पद पाठएव। ते। हारिऽयोजन। सुऽवृक्ति। इन्द्र। ब्रह्माणि। गोतमासः। अक्रन्। आ। एषु। विश्वऽपेशसम्। धियम्। धाः। प्रातः। मक्षु। धियाऽवसुः। जगम्यात् ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 61; मन्त्र » 16
अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 29; मन्त्र » 6
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अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 29; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
अन्वयः
हे हारियोजनेन्द्र सभाद्यध्यक्ष ! धियावसुर्भवान् यद्येषु विद्याऽध्येतृषु जनेषु विश्वपेशसं धियं प्रातर्मक्ष्वाधास्तर्हि सर्वा विद्या जगम्यात् प्राप्नुयात्। ये गोतमासः संस्तोतारस्ते तुभ्यमेव सुवृक्ति सुष्ठु वर्जितदोषाण्यभिसंस्कृतानि ब्रह्माणि बृहत्सुखकारकाण्यन्नान्यक्रँस्तान् सुसेवताम् ॥ १६ ॥
पदार्थः
(एव) अवधारणार्थे (ते) तुभ्यम् (हारियोजन) यो हरीन् तुरङ्गानग्न्यादीन् वा युनक्ति स एव तत्सम्बुद्धौ (सुवृक्ति) सुष्ठु वृक्तयो वर्जिता दोषा येभ्यस्तानि (इन्द्र) परमैश्वर्य्यप्रापक (ब्रह्माणि) बृहत्सुखकारकाण्यन्नानि (गोतमासः) गच्छन्ति स्तुवन्ति सर्वा विद्यास्तेऽतिशयिताः। गौरिति स्तोतृनामसु पठितम्। (निघं०३.१६) (अक्रन्) कुर्य्युः (आ) समन्तात् (एषु) स्तोतृषु (विश्वपेशसम्) विश्वानि सर्वाणि पेशांसि रूपाणि यस्यां ताम् (धियम्) धारणावतीं प्रज्ञाम् (धाः) धर (प्रातः) प्रतिदिनम् (मक्षु) शीघ्रम् (धियावसुः) यः प्रज्ञाकर्मभ्यां सह वसति सः (जगम्यात्) भृशं प्राप्नुयात् ॥ १६ ॥
भावार्थः
परोपकारिभिर्विद्वद्भिर्नित्यं प्रयत्नेन सुशिक्षाविद्यादानाभ्यां सर्वे मनुष्याः सुशिक्षिता विद्वांसः सम्पादनीयाः। एते चाध्यापकान् विदुषो मनोवाक्कर्मभिः सत्कृत्य सुसंस्कृतैरन्नादिभिर्नित्यं सेवन्ताम्। नहि कश्चिदपि विद्यादानग्रहणाभ्यामुत्तमो धर्मोऽस्ति तस्मात् सर्वैः परस्परं प्रीत्या विद्योन्नतिः सदा कार्य्या ॥ १६ ॥ अस्मिन् सूक्ते सभाद्यध्यक्षाऽग्निविद्याप्रचारकरणाद्युक्तमत एतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीत्यवगन्तव्यम् ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥
पदार्थ
हे (हारियोजन) यानों में घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थ युक्त होनेवालों को पढ़ने वा जाननेवाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले (धियावसुः) बुद्धि और कर्म के निवास करनेवाले आप जो (एषु) इन स्तुति तथा विद्या पढ़नेवाले मनुष्यों में (विश्वपेशसम्) सब विद्यारूप गुणयुक्त (धियम्) धारणावाली बुद्धि को (प्रातः) प्रतिदिन (मक्षु) शीघ्र (आधाः) अच्छे प्रकार धारण करते हो तो जिन को ये सब विद्या (जगम्यात्) वार-वार प्राप्त होवें (गोतमासः) अत्यन्त सब विद्याओं की स्तुति करनेवाले (ते) आप के लिये (एव) ही (सुवृक्ति) अच्छे प्रकार दोषों को अलग करनेवाले शुद्धि किये हुए (ब्रह्माणि) बड़े-बड़े सुख करनेवाले अन्नों को देने के लिये (अक्रन्) सम्पादन करते हैं, उनकी अच्छे प्रकार सेवा कीजिये ॥ १६ ॥
भावार्थ
परोपकारी विद्वानों को उचित है कि नित्य प्रयत्नपूर्वक अच्छी शिक्षा और विद्या के दान से सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा से युक्त विद्वान् करें। तथा इतर मनुष्यों को भी चाहिये कि पढ़ानेवाले विद्वानों को अपने निष्कपट मन, वाणी और कर्मों से प्रसन्न करके ठीक-ठीक पकाए हुए अन्न आदि पदार्थों से नित्य सेवा करें। क्योंकि पढ़ने और पढ़ाने से पृथक् दूसरा कोई उत्तम धर्म नहीं है, इसलिये सब मनुष्यों को परस्पर प्रीतिपूर्वक विद्या की वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥ इस सूक्त में सभाध्यक्ष आदि का वर्णन और अग्निविद्या का प्रचार करना आदि कहा है, इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥ इति श्रीयुतपरिव्राजकाचार्य्येण श्रीयुतमहाविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्य्यभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते ऋग्वेदभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः समाप्तिमगात् ॥
विषय
विश्वपेशस् धी [संसार को सुन्दर बनानेवाली प्रज्ञा]
पदार्थ
१. हे (हारियोजन) = हमारे शरीररूप रथ में इन्द्रियाश्वों को जोड़नेवाले और इस प्रकार हमें जीवनयात्रा की पूर्ति के लिए सक्षम बनानेवाले तथा (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (गोतमासः) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले पुरुष (ते एव) = आपके ही (सुवृक्ति) = उत्तमता से दोषों का वर्जन करनेवाले अथवा आपके आवर्जक अर्थात् आपकी कृपादृष्टि को प्राप्त करनेवाले (ब्रह्माणि) = स्तोत्रों को (अक्रन्) = करते हैं । आपका स्तवन हमारे दोषों को दूर करता है और हमें आपकी कृपादृष्टि प्राप्त कराता है । २. हे प्रभो ! (एषु) = आप इन प्रशस्तेन्द्रिय पुरुषों में (विश्वपेशसम्) = संसार को सुन्दर बनानेवाली (धियम्) = प्रज्ञा को (आधाः) = स्थापित कीजिए । हमें उत्तम बुद्धि प्राप्त हो और उस बुद्धि से हम संसार को सुन्दर बनाने का प्रयत्न करें । ३. हे प्रभो ! आपकी कृपा से (प्रातः मक्षु) = प्रातः शीघ्र ही (धियावसुः) = प्रज्ञापूर्वक कर्म के द्वारा उत्तम निवासवाला व्यक्ति (जगम्यात्) = प्राप्त हो, अर्थात् हमें इन पुरुषों का सत्सङ्ग मिले और हम धियावसु बन पाएँ ।
भावार्थ
भावार्थ - हम प्रभु का स्तवन करें । प्रभु हमें वह बुद्धि दे जो हमें संसार को सुन्दर बनाने में समर्थ करे तथा प्रभुकृपा से हमें धियावसु पुरुषों का संग प्राप्त हो ।
विशेष / सूचना
विशेष - सूक्त का आरम्भ इन शब्दों से होता है कि हम स्तुति व हवि के द्वारा प्रभु का परिचरण करें [२] । हम प्रभुप्राप्ति के लिए 'हृदय, मन व बुद्धि' तीनों का समन्वय करें [२] । स्तवन, उत्तम वचन व पापवर्जन हमें प्रभु - प्राप्ति के योग्य बनाएँ [३] । स्तोम व हवि ही तो हमें प्रभु की प्राप्ति के योग्य बनाते हैं [४] । वाणी के साथ स्तोत्रों का एकीकरण हो जाने पर प्रभु हमें शरीर - बन्धन से ऊपर उठाते हैं [५] । प्रभु हमें उत्तम कर्मशीलतारूप वज्र प्राप्त कराते हैं [६] । इस वज्र से हमें ज्ञान की आवरणभूत वासना को विनष्ट करना है [७] । इसी उद्देश्य से हम प्रभुस्तवन द्वारा शक्तिलाभ करते हैं [८] । वे प्रभु ही शक्ति देकर हमें युद्ध में विजयी करते हैं [९] । वास्तव में प्रभु ही हमारी वासना का विनाश करते हैं [१०] । प्रभुकृपा से ही वासना के विनाश से हममें पुनः सरस्वती का प्रवाह बहने लगता है [११] । हम वाणी का विश्लेषण करते हुए अपने ज्ञान को बढ़ाते हैं [१२] । वासनाओं से युद्ध के लिए हमें कर्म व ज्ञानरूप अस्त्र प्राप्त होते हैं [१३] । प्रभु के पराक्रमपूर्ण कर्मों का गायन करके हम भी शक्तिसम्पन्न हों [१४] । दीप्ति में हम सूर्य के साथ स्पर्धा करनेवाले हों [१५] और विश्वपेशस् धी को धारण करें [१६] । 'प्रभु का ही स्तवन करें', इन शब्दों से अगला सूक्त आरम्भ होता है -
विषय
हारियोजन इन्द्र का रहस्य ।
भावार्थ
हे ( हारियोजन) रथ में अश्वों को जोड़ने वाले सारथी या महारथी के समान ! हे ( हारियोजन ) प्रजा के दुःखहारी विद्वानों की नियुक्ति और प्रबल उपायों का प्रयोजन करने वाले राजन् ! वेगवान् सैनिकों के नियोक्ता, आज्ञापक तथा प्रबल तुरंगों और अश्वारोही वीरों के और अग्नेयादि अस्त्रों के संचालक वीर सेनापते ! ( इन्द्र ) विद्वन्, ऐश्वर्यवन् ! ( शत्रुहन्तः ) जिस प्रकार मेध के बलपर कृषक गण अन्नों को उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार ( गोतमासः ) बड़े वाणियों के धारक विद्वान् पुरुष (ते) तेरे ( एव ) ही ( ब्रह्माणि ) बड़े सुखकारी, ज्ञानमय वेदमन्त्रों के समान, उत्तम बलप्रद अन्नों, ऐश्वर्यों और बलों को (अक्रन् ) उत्तम रूप से सम्पादित करते हैं, प्राप्त करते हैं और औरों को प्राप्त कराते हैं । ( धिया-वसुः ) अपने प्रज्ञा और कर्म के बल से राष्ट्र में स्वयं बसने और प्रजा को बसाने और ऐश्वर्य सम्पादन करने हारा तू ( एषु ) इन अधीनस्थ प्रजाजनों में (विश्वपेशसम्) सब प्रकार के सुवर्ण आदि नाना धनों के देने वाले (धियम् ) ज्ञान और कर्म सामर्थ्य का ( प्रातः मक्षू ) जिस प्रकार सूर्य प्रातःकाल अपना प्रकाश और आचार्य प्रातःकाल शिष्यों में अपना ज्ञान प्रदान करता है उसी प्रकार शीघ्र ही ( धाः ) प्रदान कर, धारण करा । जिससे वह प्रजाजन सब सुखों और विद्याओं को ( आ जगम्यात् ) प्राप्त हो । इति एकोनत्रिंशद् वर्गः ॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
नोधा गौतम ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः–१, १४, १६ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ९ निचृत् विष्टुप् । ३, ४, ६, ८, १०, १२ पंक्तिः । ५, १५ विराट पंक्तिः । ११ भुरिक् पंक्ति: । १३ निचृतपंक्तिः । षोडशर्चं सूक्तम् ॥
विषय
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है ॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
हे हारियोजन इन्द्र सभाद्यध्यक्ष ! धियावसुः भवान् यत् येषु विद्या अध्येतृषु जनेषु विश्वपेशसं धियं प्रातः मक्षु आ {एषु} धाः तर्हि सर्वा विद्या जगम्यात् प्राप्नुयात्। ये गोतमासः संस्तोतारः ते तुभ्यम् एव सुवृक्ति सुष्ठु वर्जितदोषाणि अभिसंस्कृतानि ब्रह्माणि बृहत् सुखकारकाणि अन्नान् अक्रन् तान् सुसेवताम् ॥१६॥
पदार्थ
हे (हारियोजन) यो हरीन् तुरङ्गानग्न्यादीन् वा युनक्ति स एव तत्सम्बुद्धौ= रथ में अश्व, अग्नि आदि को जोड़नेवाले और (इन्द्र) परमैश्वर्य्यप्रापक=परम ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, (सभाद्यध्यक्ष)=सभा आदि के अध्यक्ष ! (धियावसुः) यः प्रज्ञाकर्मभ्यां सह वसति सः=प्रज्ञा और कर्म के साथ रहनेवाले, (भवान्)=आप, (यत्)=जो, (येषु)=जिसमें, (विद्या)= विद्या के, (अध्येतृषु)=अध्ययन करनेवाले, (जनेषु)=लोगों में, (विश्वपेशसम्) विश्वानि सर्वाणि पेशांसि रूपाणि यस्यां ताम्=समस्त आभूषणों और रूपों वाले, (धियम्) धारणावतीं प्रज्ञाम्=धारण करनेवाली प्रज्ञा को, (प्रातः) प्रतिदिनम्=प्रतिदिन, (मक्षु) शीघ्रम्=शीघ्र, (आ) समन्तात्=हर ओर से, {एषु} स्तोतृषु= स्तुति करनेवालों में, (धाः) धर=रखो, (तर्हि)=तो, (सर्वा)=समस्त, (विद्या)= विद्या, (जगम्यात्) भृशं प्राप्नुयात्=बहुत अधिक मात्रा में, (प्राप्नुयात्)=प्राप्त करे, (ये)=जो, (गोतमासः) गच्छन्ति स्तुवन्ति सर्वा विद्यास्तेऽतिशयिताः=अतिशयता से सब विद्याओं की स्तुति करनेवाले, (संस्तोतारः)=स्तुति कर्त्ता, (ते) तुभ्यम्=तुम्हारे लिये, (एव) अवधारणार्थे=ही, (सुवृक्ति) सुष्ठु वृक्तयो वर्जिता दोषा येभ्यस्तानि=दोषों से रहित उत्तम, (अभिसंस्कृतानि)= पवित्र, (ब्रह्माणि) बृहत्सुखकारकाण्यन्नानि=बहुत सुख प्रदान करनेवाले अन्न, (अक्रन्) कुर्य्युः=करो, (तान्)=उनकी, (सुसेवताम्)=उत्तम सेवा करो ॥१६॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
परोपकारी विद्वानों के द्वारा नित्य प्रयत्नपूर्वक अच्छी शिक्षा और विद्या के दान से सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा से युक्त विद्वान् बनाना चाहिए। इन अद्यापकों और विद्वानों को मन और वाणी से सत्कार करके स्वादिष्ट बनाये गये भोजन से नित्य सेवा करनी चाहिए। विद्या दान और ग्रहण करने से कोई भी धर्म उत्तम उत्तम नहीं है, इसलिये सब मनुष्यों से परस्पर प्रीति करके सदा विद्या की उन्नति करनी चाहिए ॥१६॥
विशेष
महर्षिकृत सूक्त के भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस सूक्त में सभाध्यक्ष आदि का वर्णन और अग्निविद्या का प्रचार करना आदि कहा गया है, इसलिये इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥१६॥
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
हे (हारियोजन) रथ में अश्व, अग्नि आदि को जोड़नेवाले और (इन्द्र) परम ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले (सभाद्यध्यक्ष) सभा आदि के अध्यक्ष ! (धियावसुः) प्रज्ञा और कर्म के साथ रहनेवाले (यत्) जो (भवान्) आप, (येषु) जिसमें (विद्या) विद्या के (अध्येतृषु) अध्ययन करनेवाले (जनेषु) लोगों में (विश्वपेशसम्) समस्त आभूषणों और रूपों को (धियम्) धारण करनेवाली प्रज्ञा को (प्रातः) प्रतिदिन (मक्षु) शीघ्रता से, (आ) हर ओर से {एषु} स्तुति करनेवालों में (धाः) रखते हो, (तर्हि) तो (सर्वा) समस्त (विद्या) विद्या (जगम्यात्) बहुत अधिक मात्रा में (प्राप्नुयात्) प्राप्त करते हो। (ये) जो (गोतमासः) अतिशयता से सब विद्याओं की स्तुति करनेवाले (संस्तोतारः) स्तुति कर्त्ता, (ते) तुम्हारे लिये (एव) ही (सुवृक्ति) दोषों से रहित उत्तम, (अभिसंस्कृतानि) पवित्र और (ब्रह्माणि) बहुत सुख प्रदान करनेवाले अन्न (अक्रन्) करो, अर्थात् प्रदान करो और(तान्) उनकी (सुसेवताम्) अच्छी तरह से सेवा करो ॥१६॥
संस्कृत भाग
पदार्थः(महर्षिकृतः)- (एव) अवधारणार्थे (ते) तुभ्यम् (हारियोजन) यो हरीन् तुरङ्गानग्न्यादीन् वा युनक्ति स एव तत्सम्बुद्धौ (सुवृक्ति) सुष्ठु वृक्तयो वर्जिता दोषा येभ्यस्तानि (इन्द्र) परमैश्वर्य्यप्रापक (ब्रह्माणि) बृहत्सुखकारकाण्यन्नानि (गोतमासः) गच्छन्ति स्तुवन्ति सर्वा विद्यास्तेऽतिशयिताः। गौरिति स्तोतृनामसु पठितम्। (निघं०३.१६) (अक्रन्) कुर्य्युः (आ) समन्तात् (एषु) स्तोतृषु (विश्वपेशसम्) विश्वानि सर्वाणि पेशांसि रूपाणि यस्यां ताम् (धियम्) धारणावतीं प्रज्ञाम् (धाः) धर (प्रातः) प्रतिदिनम् (मक्षु) शीघ्रम् (धियावसुः) यः प्रज्ञाकर्मभ्यां सह वसति सः (जगम्यात्) भृशं प्राप्नुयात् ॥१६॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- हे हारियोजनेन्द्र सभाद्यध्यक्ष ! धियावसुर्भवान् यद्येषु विद्याऽध्येतृषु जनेषु विश्वपेशसं धियं प्रातर्मक्ष्वाधास्तर्हि सर्वा विद्या जगम्यात् प्राप्नुयात्। ये गोतमासः संस्तोतारस्ते तुभ्यमेव सुवृक्ति सुष्ठु वर्जितदोषाण्यभिसंस्कृतानि ब्रह्माणि बृहत्सुखकारकाण्यन्नान्यक्रँस्तान् सुसेवताम् ॥१६॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- परोपकारिभिर्विद्वद्भिर्नित्यं प्रयत्नेन सुशिक्षाविद्यादानाभ्यां सर्वे मनुष्याः सुशिक्षिता विद्वांसः सम्पादनीयाः। एते चाध्यापकान् विदुषो मनोवाक्कर्मभिः सत्कृत्य सुसंस्कृतैरन्नादिभिर्नित्यं सेवन्ताम्। नहि कश्चिदपि विद्यादानग्रहणाभ्यामुत्तमो धर्मोऽस्ति तस्मात् सर्वैः परस्परं प्रीत्या विद्योन्नतिः सदा कार्य्या ॥१६॥ सूक्तस्य भावार्थः(महर्षिकृतः)- अस्मिन् सूक्ते सभाद्यध्यक्षाऽग्निविद्याप्रचारकरणाद्युक्तमत एतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीत्यवगन्तव्यम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
परोपकारी विद्वानांनी नित्य प्रयत्नपूर्वक सुशिक्षण व विद्यादान इत्यादींनी सर्व माणसांना सुशिक्षित विद्वान करावे व इतर माणसांनी अध्यापन करणाऱ्या विद्वानांना आपल्या निष्कपट मन, वाणी व कर्मांनी प्रसन्न करून उत्तम अन्न इत्यादी पदार्थांनी नित्य सेवा करावी. कारण अध्ययनापेक्षा वेगळा दुसरा कोणताही धर्म नाही. त्यासाठी सर्व माणसांनी परस्पर प्रीतिपूर्वक विद्येची वृद्धी केली पाहिजे. ॥ १६ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Indra, O Lord of sunbeams, these are the songs divine, purest and serene, offered by the highest souls of faith and vision. Bless these souls with universal brilliance of vision and intelligence, lord omniscient. Lord Omnificent, reveal your presence in our mind instantly with the light of the dawn.
Subject of the mantra
Then how should that Chairman of the Assembly be, this subject has been discussed in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O! (hāriyojana) = those who connect horses, fire etc. in the chariot and, (indra)=bestower of opulence, (sabhādyadhyakṣa) =Chairman of the Assembly etc., (dhiyāvasuḥ)=living with wisdom and action, (yat) =that, (bhavān) =you, (yeṣu) =in which, (vidyā) =of knowledge, (adhyetṛṣu)=those who study, (janeṣu) =in peoples, (viśvapeśasam)=to all ornaments and forms, (dhiyam)=the wisdom that holds, (prātaḥ)=daily, (makṣu) =speedily, (ā) =from all sides, {eṣu}=among those who praise, (dhāḥ) =place,, (tarhi) =then, (sarvā) =all, (vidyā) =knowledge, (jagamyāt)= in large quantities, (prāpnuyāt) =attain, (ye) =that, (gotamāsaḥ)=one who praises all knowledge excessively, (saṃstotāraḥ)=one who praises, (te) =for you, (eva) =only, (suvṛkti)=perfect without flaws, (abhisaṃskṛtāni)=holy and, (brahmāṇi) =food which provides many delights, (akran) =do, i.e. provide and (tān) =their, (susevatām) =serve well.
English Translation (K.K.V.)
O Chairman of the Assembly who joins the horses, fire etc. in the chariot and bestows ultimate opulence! You, the one who lives with wisdom and action, and among those who study knowledge, you keep the wisdom that wears all the ornaments and forms among those who praise you from every side, with haste every day, then you attain all the knowledge in great abundance. The one who praises all the knowledge with great enthusiasm, provide food free from defects, good, pure and which gives a lot of happiness, that is, provide it and serve them well.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
All human beings should be made scholars through good education and donation of knowledge through philanthropic scholars' daily efforts. These scholars should serve them daily with delicious food prepared with hospitality in mind and speech. No righteousness is better than donating and receiving knowledge, hence one should always progress knowledge by loving each other. Translation of gist of the hymn by Maharshi Dayanand- In this hymn, the President of the Assembly etc. has been mentioned and the propagation of knowledge of Agni etc., has also been discussed, hence the interpretation of this hymn should be understood to be consistent with the interpretation of the previous hymn.
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