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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 61/ मन्त्र 6
    ऋषिः - नोधा गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः

    अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द्वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं१॒॑ रणा॑य। वृ॒त्रस्य॑ चिद्वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । त्वष्टा॑ । त॒क्ष॒त् । वज्र॑म् । स्वपः॑ऽतमम् । स्व॒र्य॑म् । रणा॑य । वृ॒त्रस्य॑ । चि॒त् । वि॒दत् । येन॑ । मर्म॑ । तु॒जन् । ईशा॑नः । तु॒ज॒ता । कि॒ये॒धाः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं१ रणाय। वृत्रस्य चिद्विदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्मै। इत्। ऊँ इति। त्वष्टा। तक्षत्। वज्रम्। स्वपःऽतमम्। स्वर्यम्। रणाय। वृत्रस्य। चित्। विदत्। येन। मर्म। तुजन्। ईशानः। तुजता। कियेधाः ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 61; मन्त्र » 6
    अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 28; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    मनुष्यैर्यस्त्वष्टेशानः कियेधाः स्वयं शत्रून् तुजन् वृत्रस्य मेघस्योपरि वज्रं स्वकिरणान् क्षिपन् विदत् स्वर्यं स्वपस्तमं तक्षत्सूर्यश्चिदिवास्मै रणाय मर्म तुजता येन वज्रेण शत्रून् विजयते स इदु सभाद्यध्यक्षत्वे योग्य इति वेद्यम् ॥ ६ ॥

    पदार्थः

    (अस्मै) उक्ताय (इत्) एव (उ) वितर्के (त्वष्टा) प्रकाशयिता (तक्षत्) तनूकरोति (वज्रम्) किरणसमूहं प्रहृत्य (स्वपस्तमम्) अतिशयेन शोभनान्यपांसि कर्माणि यस्मात्तम् (स्वर्यम्) स्वः सुखे साधुस्तम् (रणाय) युद्धाय। रण इति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) (वृत्रस्य) मेघस्य (चित्) इव (विदत्) प्राप्नुवन् (येन) वज्रेण (मर्म) जीवननिमित्तम् (तुजन्) हिंसन्। अत्र शपो लुक्। (ईशानः) समर्थः (तुजता) छेदकेन वज्रेण (कियेधाः) यः कियतो धरति सः। अत्र पृषोदरा० इति तस्थान इकारः ॥ ६ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। यथा सविता स्वप्रतापेन मेघं छित्वा भूमौ निपात्य जलं विस्तार्य सुखयति तथा सभाद्यध्यक्षो विद्याविनयादिना शस्त्रास्त्रशिक्षया युद्धेषु कुशलां सेनां सम्पाद्य शत्रून् जित्वा सर्वान् प्राणिन आनन्दयेत् ॥ ६ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    मनुष्यों को उचित है कि जो (त्वष्टा) प्रकाश करने (ईशानः) समर्थ (कियेधाः) कितनों को धारण करनेवाला शत्रुओं को (तुजन्) मारता हुआ (वृत्रस्य) मेघ के ऊपर अपने किरणों को छोड़ता (विदत्) प्राप्त होते हुए सूर्य के समान (स्वर्यम्) सुख के हेतु (स्वपस्तमम्) अतिशय करके उत्तम कर्मों के उत्पन्न करनेवाले (वज्रम्) किरणसमूह को (तक्षत्) छेदन करते हुए सूर्य के (चित्) समान (अस्मै) इस (रणाय) सङ्ग्राम के वास्ते जिस (मर्म) जीवननिमित्त स्थान को (तुजता) काटते हुए (येन) जिस वज्र से शत्रुओं को जीतता है, (इदु) उसी को सभा आदि का अध्यक्ष करना चाहिये ॥ ६ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रताप से मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को गिरा के सबको सुखी करता है, वैसे ही सभा आदि का अध्यक्ष विद्या, विनय वा शस्त्र-अस्त्रों के सीखने-सिखाने से युद्धों में कुशल सेना को सिद्ध कर, शत्रुओं को जीत कर, सब प्राणियों को आनन्दित किया करे ॥ ६ ॥

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    विषय

    स्वपस्तम स्वर्य वज्र

    पदार्थ

    १. (त्वष्टा) = वह देवशिल्पी - सब दिव्य गुणों का निर्माण करनेवाला प्रभु (अस्मै इत् उ) = इस जीव के लिए निश्चय से ही (स्वपस्तमम्) = अत्यन्त शोधन कर्मोंवाले (स्वर्यम्) = [सु अर्य] वासनारूप शत्रुओं पर उत्तम आक्रमण करनेवाले, स्तुत्य व [स्वर् य] स्वर्गप्रद - सुखमय स्थिति को देनेवाले (वज्रम्) = काम - क्रोधादि के वर्जक आयुध को (तक्षत्) = बनाता है । २. इस आयुध को क्यों बनाता हैं ? (रणाय) = अन्तः करण में चलनेवाले देवासुर - संग्राम के लिए । दैवीवृत्ति व आसुरीवृत्तियों में चल रहे संग्राम में विजय के लिए अथवा रमणीयता के लिए - आसुरवृत्ति के पराजय के द्वारा जीवन को सुन्दर बनाने के लिए । ३. इस वज्र को बनाता है (तुजता येन) = शत्रुओं की हिंसा करते हुए जिस वज्र से (तुजन्) = शत्रु का संहार करता हुआ (ईशानः) = ऐश्वर्यवान् तथा (कियेधाः) = [क्रियमाणधः - निरु०] आक्रमण करते हुए शत्रुबल को धारण करने - [रोकने] - वाला वह जीव (वृत्रस्य) = ज्ञान के आवरणभूत कामात्मतारूप शत्रु के (मर्मचित्) = मर्मस्थल को ही (विदत्) = प्राप्त करता है, अर्थात् मर्मस्थल पर चोट करनेवाला होता है । इस वृत्र को समाप्त करके ही इन्द्र अपने राज्य को स्वर्ग का राज्य बना पाता है । इस प्रकार यह वज्र सचमुच "स्वर्य" हो जाता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु ने हमें कर्मशीलतारूप वज्र दिया है । हम इससे वासना को विनष्ट करके जीवन को स्वर्ग बनाएँ ।

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    विषय

    विद्वान् शिल्पी का कर्तव्य

    भावार्थ

    (अस्मा इत् उ) इस ऐश्वर्यवान् राष्ट्र की रक्षा और राष्ट्रपति के विजय के लिए ही (त्वष्टा) शिल्पीगण ( सु-अपस्तमम् ) सूर्य जिस प्रकार अपने तेजस्वी किरण समूह को प्रकट करता है उसी प्रकार उत्तम, अति अधिक क्रिया सामर्थ्य से युक्त, अति वेगवान्, तीव्र (स्वर्यं) अति तापजनक अग्निमय (वज्रं) शत्रुवर्जन करने वाले ऐसे शस्त्रास्त्र समूह को ( तक्षत् ) गढ़ गढ़ कर बनावे, (येन) जिस (तुजता) हिंसाकारी, घात करते हुए, प्रयुक्त अस्त्र से ( तुजन् ) शत्रुओं का नाश करता हुआ (कियेधाः) कितने ही शत्रुदलों को थामने और कितने ही असंख्य बलों और शस्त्रास्त्रों को धारण करने वाला, बलवान् (ईशानः) सेनापति (वृत्रस्य) अपने बढ़ते हुए या वर्तमान शत्रु के ( मर्म चित् ) मर्मों तक को (विदत्) पहुँच जाय और छिन्न-भिन्न करके विजय करले। परमेश्वर के पक्ष में—वह (त्वष्टा) तेजोमय प्रभु इस जीव के हित के लिए (स्वर्यं) उपदेशमय, पापनिवारक ज्ञान वज्र का उपदेश करता है । जिससे वह बलवान् इन्द्रियों का स्वामी होकर बढ़ते अज्ञान के मर्मों का भी नाश करे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    नोधा गौतम ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः–१, १४, १६ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ९ निचृत् विष्टुप् । ३, ४, ६, ८, १०, १२ पंक्तिः । ५, १५ विराट पंक्तिः । ११ भुरिक् पंक्ति: । १३ निचृतपंक्तिः । षोडशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    फिर वह सभा का अध्यक्ष कैसा है, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    मनुष्यैः यः त्वष्टा ईशानः कियेधाः स्वयं शत्रून् तुजन् वृत्रस्य मेघस्य उपरि वज्रं स्वकिरणान् क्षिपन् विदत् स्वर्यं स्वपस्तमम् तक्षत् सूर्यः चित् इव अस्मै रणाय मर्म तुजता येन वज्रेण शत्रून् विजयते स इत् उ सभाद्यध्यक्षत्वे योग्य इति वेद्यम् ॥६॥

    पदार्थ

    (मनुष्यैः)= मनुष्यों के द्वारा, (यः)=जो, (त्वष्टा) प्रकाशयिता=प्रकाशित करनेवाला, (ईशानः) समर्थः= समर्थ, (कियेधाः) यः कियतो धरति सः=कितनों को ही धारण करनेवाला, (स्वयम्)= स्वयम्, (शत्रून्)=शत्रुओं की, (तुजन्) हिंसन्= हिंसा करते हुए, (वृत्रस्य) मेघस्य=बादल के, (उपरि)=ऊपर, (वज्रम्) किरणसमूहं प्रहृत्य=किरणों के समूह से प्रहार करके, (स्वकिरणान्)=अपनी किरणों को, (क्षिपन्)=फेंकते हुए, (विदत्) प्राप्नुवन्=प्राप्त करते हुए, (स्वर्यम्) स्वः सुखे साधुस्तम्=उत्तम सुख में, (स्वपस्तमम्) अतिशयेन शोभनान्यपांसि कर्माणि यस्मात्तम्= जिसके अतिशय शोभनीय कर्म हैं, उसको (तक्षत्) तनूकरोति=क्षीण करता है, (सूर्यः)= सूर्य के, (चित्) इव=समान, (अस्मै) उक्ताय=कहे गये, (रणाय) युद्धाय= युद्ध के लिये, (मर्म) जीवननिमित्तम् =जीवन के निमित्त, (तुजता) छेदकेन वज्रेण= छेदक वज्र के द्वारा, (शत्रून्)=शत्रु पर, (विजयते) =विजय प्राप्त करता है, (सः)=वह, (इत्) एव=ही, (उ) वितर्के=अथवा, (सभाद्यध्यक्षत्वे)= सभाद्यध्यक्ष होने के, (योग्य)= योग्य है, (इति)=ऐसा, (वेद्यम्)=जानना चाहिए ॥६॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रताप से मेघ को छिन्न-भिन्न करके भूमि में गिराकर जल को विस्तारित करके सबको सुखी करता है, वैसे ही सभा आदि का अध्यक्ष विद्या, विनय आदि शस्त्र-अस्त्रों की शिक्षा से कुशल सेना बना कर शत्रुओं को जीत कर सब प्राणियों को आनन्दित किया करे ॥६॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (मनुष्यैः) मनुष्यों के द्वारा (यः) जो (त्वष्टा) प्रकाशित करनेवाला, (ईशानः) समर्थ (कियेधाः) कितनों को ही धारण करनेवाला, (स्वयम्) स्वयम् (शत्रून्) शत्रु [बादलों की] (तुजन्) हिंसा करते हुए (वृत्रस्य) बादल के (उपरि) ऊपर (वज्रम्) किरणों के समूह से प्रहार करके अर्थात् छेदन-भेदन करके, (स्वकिरणान्) अपनी किरणों को (क्षिपन्) फेंकते हुए [लक्ष्य को] (विदत्) प्राप्त करते हुए, (स्वर्यम्) उत्तम सुख में (स्वपस्तमम्) जो अतिशय शोभनीय कर्मों से उनको (तक्षत्) क्षीण करता है। (सूर्यः) सूर्य के (चित्) समान, (अस्मै) कहे गये (रणाय) युद्ध के लिये (मर्म) जीवन के निमित्त, (तुजता) छेदक वज्र के द्वारा (शत्रून्) शत्रु पर (विजयते) विजय प्राप्त करता है। (उ) अथवा (सः) वह (इत्) ही (सभाद्यध्यक्षत्वे) सभाद्यध्यक्ष होने के (योग्य) योग्य है, (इति) ऐसा (वेद्यम्) जानना चाहिए ॥६॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (अस्मै) उक्ताय (इत्) एव (उ) वितर्के (त्वष्टा) प्रकाशयिता (तक्षत्) तनूकरोति (वज्रम्) किरणसमूहं प्रहृत्य (स्वपस्तमम्) अतिशयेन शोभनान्यपांसि कर्माणि यस्मात्तम् (स्वर्यम्) स्वः सुखे साधुस्तम् (रणाय) युद्धाय। रण इति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) (वृत्रस्य) मेघस्य (चित्) इव (विदत्) प्राप्नुवन् (येन) वज्रेण (मर्म) जीवननिमित्तम् (तुजन्) हिंसन्। अत्र शपो लुक्। (ईशानः) समर्थः (तुजता) छेदकेन वज्रेण (कियेधाः) यः कियतो धरति सः। अत्र पृषोदरा० इति तस्थान इकारः॥६॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- मनुष्यैर्यस्त्वष्टेशानः कियेधाः स्वयं शत्रून् तुजन् वृत्रस्य मेघस्योपरि वज्रं स्वकिरणान् क्षिपन् विदत् स्वर्यं स्वपस्तमं तक्षत्सूर्यश्चिदिवास्मै रणाय मर्म तुजता येन वज्रेण शत्रून् विजयते स इदु सभाद्यध्यक्षत्वे योग्य इति वेद्यम् ॥६॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रोपमालङ्कारः। यथा सविता स्वप्रतापेन मेघं छित्वा भूमौ निपात्य जलं विस्तार्य सुखयति तथा सभाद्यध्यक्षो विद्याविनयादिना शस्त्रास्त्रशिक्षया युद्धेषु कुशलां सेनां सम्पाद्य शत्रून् जित्वा सर्वान् प्राणिन आनन्दयेत् ॥६॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसा सूर्य स्वतःच्या प्रभावाने मेघाला विदीर्ण करून जल भूमीवर पाडतो व सर्वांना सुखी करतो तसेच सभाध्यक्षाने विद्या व विनय याद्वारे शस्त्र-अस्त्राचे शिक्षण देऊन युद्धात कुशल सेना सिद्ध ठेवावी व शत्रूंना जिंकून सर्व प्राण्यांना आनंदित करावे. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Let Tvashta, the Maker, design and form for this Indra, ruling Lord of power and defence, the thunderbolt of lightning force blazing for the battle so that he (Indra), striking with this fatal weapon, taking many enemies on, may reach the mortal centrespot of Vritra, the cloud of darkness and ignorance (and release the showers of rain and prosperity and the light of knowledge).

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    Subject of the mantra

    Then how is he the President of the Assembly, this subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (manuṣyaiḥ) =by humans, (yaḥ) =that, (tvaṣṭā) =one who promulgates, (īśānaḥ) =capable, (kiyedhāḥ)=who holds so many, (svayam) =by himself, (śatrūn) =enemies,[bādaloṃ kī]=of clouds, (tujan) =while committing violence, (vṛtrasya) =of cloud, (upari) =above, (vajram) =by striking with a group of rays, i.e. by piercing, (svakiraṇān) =own rays, (kṣipan) while throwing, [lakṣya ko]= to the target, (vidat) =achieving, (svaryam) =in perfect happiness, (svapastamam)= who, through extremely graceful deeds, (takṣat)=weakens, (sūryaḥ) =of the Sun, (cit) =like, (asmai) =said, (raṇāya) =for the war, (marma) =for the sake of life, (tujatā)= by piercing thunderbolt, (śatrūn) =on enemy, (vijayate)=achieves victory, (u) =or, (saḥ) =He, (it) =only, (sabhādyadhyakṣatve) President of the Assembly, (yogya)=is worthy of being, (iti) =such, (vedyam)=should be known.

    English Translation (K.K.V.)

    The one who promulgates through human beings, who is able to sustain so many, who himself, while doing violence to the enemy clouds, attacks them with a group of rays i.e. by piercing and throws his rays, achieving the goal, in supreme happiness, who brings him to the most beautiful deeds and weakens (clouds). Like the Sun, for the sake of life for the said war, he conquers the enemy with the piercing thunderbolt, or it should be known that only He is worthy of being the Speaker of the Assembly.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is simile as a figurative in this mantra. Just as the Sun with its majesty pierces the clouds and makes everyone happy by spreading the water on the ground, similarly, the President of the Assembly should make a skilled army by teaching knowledge, humility etc. weapons and conquer the enemies and make all living beings happy.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is that Indra is taught further in the sixth mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    That man alone deserves to be the President of the Assembly or commander of the army who being giver of light (of knowledge) master of himself, sustainer of many, uses the sharpened, well-acting, sure-aimed thunderbolt or other strong weapons killing instantaneously the foe, as the sun dissipates all clouds with his rays. Such a conqueror of his enemies should be given that high post.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (तुजन्) हिंसन् = Killing. [कियेधा:] कियतो धरति सः पृषोदरादित्वात् त स्थान इकार: = The sustainer of many. [तुजता] छेदकेन वज्नेण = With destructive weapon like thunderbolt. तुज-हिंसायाम् = Tr.)

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As the sun dissipates the cloud with his splendor, makes it fall down on earth and causing rain gives happiness to all, in the same manner, the President of the Assembly, should gladden all people by his knowledge, humility and other virtues, by getting trained his army well in battles and by conquering his foes.

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