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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 61/ मन्त्र 9
    ऋषिः - नोधा गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अ॒स्येदे॒व प्र रि॑रिचे महि॒त्वं दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षात्। स्व॒राळिन्द्रो॒ दम॒ आ वि॒श्वगू॑र्तः स्व॒रिरम॑त्रो ववक्षे॒ रणा॑य ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । इत् । ए॒व । प्र । रि॒रि॒चे॒ । म॒हि॒त्वम् । दि॒वः । पृ॒थि॒व्याः । परि॑ । अ॒न्तरि॑क्षात् । स्व॒ऽराट् । इन्द्रः॑ । दमे॑ । आ । वि॒श्वऽगू॑र्तः । सु॒ऽअ॒रिः । अम॑त्रः । व॒व॒क्षे॒ । रणा॑य ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्। स्वराळिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिरमत्रो ववक्षे रणाय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य। इत्। एव। प्र। रिरिचे। महित्वम्। दिवः। पृथिव्याः। परि। अन्तरिक्षात्। स्वऽराट्। इन्द्रः। दमे। आ। विश्वऽगूर्तः। सुऽअरिः। अमत्रः। ववक्षे। रणाय ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 61; मन्त्र » 9
    अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 28; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ सूर्यसभाद्यध्यक्षौ कथं भूतावित्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    यो विश्वगूर्त्तः स्वरिरमत्रः स्वराडिन्द्रो दमे रणायाववक्षे यस्येदपि दिवः पृथिव्या अन्तरिक्षात् परि महित्वं प्ररिरिचेऽस्ति रिक्तं वर्त्तते तस्यास्यैव सभादिष्वधिकारः कार्य्येषूपयोगश्च कर्त्तव्यः ॥ ९ ॥

    पदार्थः

    (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य सूर्यस्य वा (इत्) अपि (एव) निश्चयार्थे (प्र) प्रकृष्टार्थे (रिरिचे) रिणक्ति अधिकं वर्त्तते (महित्वम्) पूज्यत्वं महागुणविशिष्टत्वं परिमाणेनाधिकत्वं च (दिवः) प्रकाशात् (पृथिव्याः) भूमेः (परि) सर्वतः (अन्तरिक्षात्) सूक्ष्मादाकाशात् (स्वराट्) यः स्वयं राजते सः (इन्द्रः) परमैश्वर्यहेतुमान् हेतुर्वा (दमे) दाम्यन्त्युपशाम्यन्ति जना यस्मिन् गृहे संसारे वा तस्मिन् (आ) आभिमुख्ये (विश्वगूर्त्तः) विश्वं सर्वं भोज्यं वस्तु निगलितं येन सः (स्वरिः) यः शोभनश्चासावरिश्च (अमत्रः) ज्ञानवान् ज्ञानहेतुर्वा (ववक्षे) वक्षति रोषं सङ्घातं करोति (रणाय) सङ्ग्रामाय ॥ ९ ॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्यः पृथिव्यादिभ्यो गुणैः परिमाणेनाऽधिकोऽस्ति तथैवोत्तमगुणं सभाद्यधिपतिं राजानमधिकृत्य सर्वकार्य्यसिद्धिः कार्य्या ॥ ९ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    अब सूर्य सभाध्यक्ष कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    जो (विश्वगूर्त्तः) सब भोज्य वस्तुओं को भक्षण करने (स्वरिः) उत्तम शत्रुओं (अमत्रः) ज्ञानवान् वा ज्ञान का हेतु (स्वराट्) अपने आप प्रकाश सहित (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त सूर्य वा सभाध्यक्ष (दमे) उत्तम घर वा संसार में (रणाय) संग्राम के लिये (आववक्षे) रोष वा अच्छे प्रकार घात करता है वा जिस की (दिवः) प्रकाश (पृथिव्याः) भूमि और (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से (इत्) भी (परि) सब प्रकार (महित्वम्) पूज्य वा महागुणविशिष्ट महिमा (प्र रिरिचे) विशेष हैं, उस (अस्य) इस सूर्य वा सभाध्यक्ष का (एव) ही कार्यों में उपयोग वा सभा आदि में अधिकार देना चाहिये ॥ ९ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सूर्य, पृथिव्यादिकों से गुण वा परिमाण के द्वारा अधिक है, वैसे ही उत्तम गुण युक्त सभा आदि के अधिपति राजा को अधिकार देकर सब कार्यों की सिद्धि करनी चाहिये ॥ ९ ॥

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    विषय

    वह 'अमत्र' प्रभु

    पदार्थ

    १. (अस्य इत् एव) = इस परमात्मा की ही (महित्वम्) = महिमा (दिवः) = द्युलोक से (पृथिव्याः) = पृथिवीलोक से (प्ररिरिचे) = अतिरिक्त है, बढ़ी हुई है, (अन्तरिक्षात् परि) = अन्तरिक्ष से भी इसकी महिमा ऊपर है । वह प्रभु इन तीनों लोकों से व्याप्त नहीं किया जा सकता । २. (दमे) = दमन करने के विषय में वह (इन्द्रः) = शक्तिशाली कार्यों को करनेवाला प्रभु (स्वराट) = स्वयं देदीप्यमान है । अपना शासन स्वयं करता हुआ वह औरों का शासन करता है । ३. (विश्वगतः) = अपने सब कार्यों के करने में सदा उद्यत है [गुदी उद्यमने] (स्वरिः) = शत्रुओं पर उत्तमता से आक्रमण करनेवाला है । (अमत्रः) = गति के द्वारा सबका त्राण करनेवाला है [अम+त्र], अथवा अमात्र [अ+मात्र] इयत्ता से रहित है, सीमा में नहीं आता । ४. ये प्रभु रणाय युद्ध के लिए अथवा रमणीयता के सम्पादन के लिए (आववक्षे) = सब प्रकार से शक्तिशाली होते हैं । इस प्रभु की शक्ति से ही वस्तुतः शक्तिसम्पन्न बनकर हम युद्धों में विजयी होते हैं और जीवनों को रमणीय बनाते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु की महिमा इन लोकों से अतीत है । वे प्रभु ही हमें शक्ति देते हैं और हमें युद्धों में विजयी कराते हैं ।

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    विषय

    स्वराट् इन्द्र का स्वरूप ।

    भावार्थ

    ( अस्य इत् एव ) इस ऐसे सम्राट् का ही, ( महित्वं ) आदर और महान् सामर्थ्य (दिवः) आकाश, (पृथिव्याः) पृथिवी और (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से भी (प्ररिरिचे) कहीं अधिक बढ़ जाता है । जो ( स्वराट् ) स्वयं अपने तेज से सूर्य के समान तेजस्वी, (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान्, ( विश्वगूर्त्तः ) समस्त ऐश्वर्यों को अपने वश कर लेने हारा, या सबकी स्तुतियों पात्र होकर, ( स्वरिः ) उत्तम २ शत्रुओं को पराजय करने हारा अथवा उत्तम स्वामी, (अमत्रः) अपरिमित बलशाली, अथवा (अमत्रः) युद्धादि में प्रयाण करने में कुशल होकर ( रणाय ) संग्राम के लिये ( दमे ) दमन करने के सामर्थ्य में ( ववक्षे ) मुख्य पद या राष्ट्र भार को धारण करता है । परमेश्वर के पक्ष में—उसका महान् सामर्थ्य तीनों लोकों से बड़ा है । वह स्वतः प्रकाश, सबका उपदेष्टश, दमन में परमैश्वर्यवान्, उत्तम स्वामी, अपरिमित शक्तिमान् होकर ( रणाय ) रमण अर्थात् जीवों के सुख के लिये विश्व को अपने में धारण कर रहा है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    नोधा गौतम ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः–१, १४, १६ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ९ निचृत् विष्टुप् । ३, ४, ६, ८, १०, १२ पंक्तिः । ५, १५ विराट पंक्तिः । ११ भुरिक् पंक्ति: । १३ निचृतपंक्तिः । षोडशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    अब सूर्य सभाध्यक्ष कैसे हैं, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    यः विश्वगूर्त्तः स्वरिः अमत्रः स्वराट् इन्द्रः दमे रणाय आववक्षे यस्य इत् अपि दिवः पृथिव्या अन्तरिक्षात् परि महित्वं प्र रिरिचे अस्तिरिक्तं वर्त्तते तस्य अस्य एव सभादिषु अधिकारः कार्य्येषु उपयोगः च कर्त्तव्यः ॥९॥

    पदार्थ

    (यः)=जो, (विश्वगूर्त्तः) विश्वं सर्वं भोज्यं वस्तु निगलितं येन सः=विश्व की समस्त खाने योग्य वस्तुओं को जिसने उत्पन्न किया है, (स्वरिः) यः शोभनश्चासावरिश्च=उत्तम शत्रुओं वाला, (अमत्रः) ज्ञानवान् ज्ञानहेतुर्वा=ज्ञान के लिये, (स्वराट्) यः स्वयं राजते सः=स्वयं प्रकाशित, (इन्द्रः) परमैश्वर्यहेतुमान् हेतुर्वा= परम ऐश्वर्य वाला, (दमे) दाम्यन्त्युपशाम्यन्ति जना यस्मिन् गृहे संसारे वा तस्मिन्=संसार के घरों में लोगों को शान्त करनेवाला, (रणाय) सङ्ग्रामाय= संग्रामों के लिये, (आ) आभिमुख्ये=सामने से, (ववक्षे) वक्षति रोषं सङ्घातं करोति=क्रोधित होता है, (यस्य)=जिसके, (इत्) अपि=भी, (दिवः) प्रकाशात्=प्रकाश से, (पृथिव्याः) भूमेः=भूमि में, (अन्तरिक्षात्) सूक्ष्मादाकाशात्= सूक्ष्म आकाश से, (परि) सर्वतः=हर ओर से, (महित्वम्) पूज्यत्वं महागुणविशिष्टत्वं परिमाणेनाधिकत्वं च=पूज्य महान विशेष गुण वाला और परिमाण में अधिक होने से, (प्र) प्रकृष्टार्थे=प्रकृष्ट रूप से, (रिरिचे) रिणक्ति अधिकं वर्त्तते= अधिक होता है, (अस्ति+रिक्तम्)=खाली, (वर्त्तते)=होता है, (तस्य)=उस, (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य सूर्यस्य वा=सभाध्यक्ष या सूर्य के, (एव) निश्चयार्थे=निश्चित रूप से, (सभादिषु)=सभा आदि में, (अधिकारः)= अधिकार, (कार्य्येषु)=कार्यों में, (उपयोगः)= उपयोग का, (च)=भी, (कर्त्तव्यः)= कर्त्तव्य है ॥९॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे सूर्य और पृथिवी आदि के गुण और परिमाण अधिक है, वैसे ही मनुष्यों के द्वारा उत्तम गुण युक्त सभा आदि के अधिपति राजा को अधिकार देकर सब कार्यों की सिद्धि करनी चाहिये ॥९॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (यः) जो (विश्वगूर्त्तः) विश्व की समस्त खाने योग्य वस्तुओं को उत्पन्न करनेवाला है, (स्वरिः) उत्तम शत्रुओं वाला है और (अमत्रः) ज्ञान के लिये (स्वराट्) स्वयं प्रकाशित होता है। (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य वाला है, (दमे) संसार के घरों में लोगों को शान्त करनेवाला है, (रणाय) संग्रामों के लिये (आ) सामने से (ववक्षे) क्रोधित होता है। (अन्तरिक्षात्) सूक्ष्म आकाश से (यस्य) जिसका (दिवः) प्रकाश (इत्) भी (पृथिव्याः) भूमि में (परि) हर ओर से, (महित्वम्) महान विशेष गुण और परिमाण में (प्र) प्रकृष्ट रूप से (रिरिचे) अधिक (वर्त्तते) होता है। (तस्य) उस (अस्य) सभाध्यक्ष या सूर्य का (एव) निश्चित रूप से (सभादिषु) सभा आदि में (अधिकारः) अधिकार और (कार्य्येषु) कार्यों में (उपयोगः) उपयोग का (च) भी (कर्त्तव्यः) किया जाना चाहिए ॥९॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (अस्य) सभाद्यध्यक्षस्य सूर्यस्य वा (इत्) अपि (एव) निश्चयार्थे (प्र) प्रकृष्टार्थे (रिरिचे) रिणक्ति अधिकं वर्त्तते (महित्वम्) पूज्यत्वं महागुणविशिष्टत्वं परिमाणेनाधिकत्वं च (दिवः) प्रकाशात् (पृथिव्याः) भूमेः (परि) सर्वतः (अन्तरिक्षात्) सूक्ष्मादाकाशात् (स्वराट्) यः स्वयं राजते सः (इन्द्रः) परमैश्वर्यहेतुमान् हेतुर्वा (दमे) दाम्यन्त्युपशाम्यन्ति जना यस्मिन् गृहे संसारे वा तस्मिन् (आ) आभिमुख्ये (विश्वगूर्त्तः) विश्वं सर्वं भोज्यं वस्तु निगलितं येन सः (स्वरिः) यः शोभनश्चासावरिश्च (अमत्रः) ज्ञानवान् ज्ञानहेतुर्वा (ववक्षे) वक्षति रोषं सङ्घातं करोति (रणाय) सङ्ग्रामाय ॥९॥ विषयः- अथ सूर्यसभाद्यध्यक्षौ कथं भूतावित्युपदिश्यते ॥ अन्वयः- यो विश्वगूर्त्तः स्वरिरमत्रः स्वराडिन्द्रो दमे रणायाववक्षे यस्येदपि दिवः पृथिव्या अन्तरिक्षात् परि महित्वं प्ररिरिचेऽस्ति रिक्तं वर्त्तते तस्यास्यैव सभादिष्वधिकारः कार्य्येषूपयोगश्च कर्त्तव्यः ॥९॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र श्लेषालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्यः पृथिव्यादिभ्यो गुणैः परिमाणेनाऽधिकोऽस्ति तथैवोत्तमगुणं सभाद्यधिपतिं राजानमधिकृत्य सर्वकार्य्यसिद्धिः कार्य्या ॥९॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. जसा सूर्य पृथ्वी इत्यादीपेक्षा गुण व परिमाण यांनी अधिक असतो तसेच उत्तम गुणयुक्त सभा इत्यादीच्या अधिपती राजाला अधिकार देऊन माणसांनी सर्व कार्याची सिद्धी केली पाहिजे. ॥ ९ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Surely the greatness and grandeur of this Indra exceeds the heaven, skies and earth. The self-refulgent hero, universal warrior, brilliant and brave, infinitely strong and bold, resounds in the universe for battle against evil and negation.

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    Subject of the mantra

    Now this topic has been preached in this mantra about how Sun is the President of the Assembly.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yaḥ) =That, (viśvagūrttaḥ)=the one who produces all the edible things in the world, (svariḥ)=is the one with the best enemies and, (amatraḥ) =for knowledge, (svarāṭ) =is self-effulgent, (indraḥ)=is the one of ultimate opulence, (dame)=He is the one who calms people in the homes of the world, (raṇāya) =for the wars, (ā) =from front, (vavakṣe)= gets angry, (antarikṣāt)=by subtle sky, (yasya)=whose, (divaḥ) =light, (it) =also, (pṛthivyāḥ) =in earth, (pari) =from all sides, (mahitvam)=in great special qualities and magnitude, (pra) =eminently, (ririce) =more, (varttate) =is, (asti+riktam)= is empty, (tasya) =that, (asya) =of the Chairman of the Assembly or Sun, (eva) =definitely, (sabhādiṣu) =in the Assembly etc., (adhikāraḥ) =authority, (kāryyeṣu) =in works, (upayogaḥ) =of use, (ca) =also, (karttavyaḥ)=should be done.

    English Translation (K.K.V.)

    The one, who produces all the edible things in the world, has the best enemies and is self-effulgent for knowledge. He is the one of ultimate opulence, the one who pacifies people in the homes of the world, the one who gets angry from the front for wars. The light of which is greater than the subtle sky, from every side of the earth, is of great special quality and magnitude. That Chairman of the Assembly or Sun should definitely be used for his authority and functions in the Assembly et cetera.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is paronomasia as figurative in this mantra. Just as the qualities and magnitude of Sun and Earth etc. are greater, in the same way, all the tasks should be accomplished by human beings by giving authority to the ruler of the Assembly etc. who has good qualities.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How are the sun and the President of the Assembly is taught in the ninth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    He alone is fit to have control of all the Assembly and authority for proper use of all powers, who takes only eatable nourishing substances and is the lord of wealth, who is engaged with no unworthy foe, self-radiating in his dwelling like the bright sun in the world whose magnitude verily exceeds that of the heaven and earth and firmament, who is skilled in every conflict and battle and who is indowed with knowledge.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (रिरिचे) रिक्ति-अधिकं वर्तते = Surpasses or exceeds all. (दमे ) दाम्यन्ति उपशाम्यन्ति जना यस्मिन् गृहे संसारे वा = In the house or the world. (अमत्रः) ज्ञानवान् = Endowed with knowledge.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Men should accomplish all works having chosen a kind man as President of the Assembly who is most virtuous like the sun that surpasses the earth and other worlds in his glory, attributes and measurement.

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