ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 70/ मन्त्र 11
ऋषिः - पराशरः शाक्तः
देवता - अग्निः
छन्दः - द्विपदा विराट्
स्वरः - पञ्चमः
सा॒धुर्न गृ॒ध्नुरस्ते॑व॒ शूरो॒ याते॑व भी॒मस्त्वे॒षः स॒मत्सु॑ ॥
स्वर सहित पद पाठसा॒धुः । न । गृ॒ध्नुः । अस्ता॑ऽइव । शूरः॑ । याता॑ऽइव । भी॒मः । त्वे॒षः । स॒मत्ऽसु॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
साधुर्न गृध्नुरस्तेव शूरो यातेव भीमस्त्वेषः समत्सु ॥
स्वर रहित पद पाठसाधुः। न। गृध्नुः। अस्ताऽइव। शूरः। याताऽइव। भीमः। त्वेषः। समत्ऽसु ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 70; मन्त्र » 11
अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 11
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अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 11
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स सभाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! यूयं यो गृध्नुः साधुर्नास्ताइव शूरो भीमो यातेव समत्सु त्वेषः परमेश्वरः सभाध्यक्षोऽस्ति तं नित्यं सेवध्वम् ॥ ६ ॥
पदार्थः
(साधुः) यः परोपकारी परकार्याणि साध्नोति सः (न) इव (गृध्नुः) परोत्कर्षाभिकाङ्क्षकः (अस्ताइव) तथा शस्त्राणां प्रक्षेप्ता (शूरः) शूरवीरः (यातेव) यथा दण्डप्रापकः (भीमः) बिभेति यस्मात्स भयङ्करः (त्वेषः) त्वेषति प्रदीप्तो भवति सः (समत्सु) संग्रामेषु ॥ ६ ॥
भावार्थः
अत्र श्लेषोपमालङ्कारौ। हे मनुष्याः ! परमेश्वरं धार्मिकं विद्वांसं सभाद्यध्यक्षं च विहाय कश्चिदन्यः स्वेषां राजा शत्रुविजेता दण्डप्रदाता सुखाभिवर्धको नैवाऽस्तीति निश्चित्य सर्वाणि परोपकृतानि सुखान्यभिवर्धयत ॥ ६ ॥ अत्रेश्वरमनुष्यसभाद्यध्यक्षाणां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥
हिन्दी (2)
विषय
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! तुम जो (गृध्नुः) दूसरे के उत्कर्ष की इच्छा करनेवाले (साधुः) परोपकारी मनुष्य के (न) समान (अस्ताइव) शत्रुओं के ऊपर शस्त्र पहुँचानेवाले (शूरः) शूरवीर के समान (भीमः) भयङ्कर (यातेव) तथा दण्ड प्राप्त करनेवाले के समान (समत्सु) संग्रामों में (त्वेषः) प्रकाशमान परमेश्वर वा सभाध्यक्ष है, उसका नित्य सेवन करो ॥ ६ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! तुम लोग परमेश्वर वा धर्मात्मा विद्वान् को छोड़ कर शत्रुओं को जीतने और दण्ड देने तथा सुखों का बढ़ानेवाला अन्य कोई अपना राजा नहीं है, ऐसा निश्चय करके सब लोग परोपकारी होके सुखों को बढ़ाओ ॥ ६ ॥ । इस सूक्त में ईश्वर, मनुष्य और सभा आदि अध्यक्ष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त की पूर्वसूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
विषय
अध्यात्म - सम्पत्ति
पदार्थ
१. गतमन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि ज्ञानी पुरुष कर्मों के द्वारा प्रभु का उपासन करता हुआ अध्यात्म - सम्पत्ति को प्राप्त करता है । प्रस्तुत मन्त्र में उस अध्यात्म - सम्पत्ति का उल्लेख इस प्रकार हुआ है - यह व्यक्ति (साधुः) = [साध्नोति परकार्यम्] सदा परहित को सिद्ध करनेवाला होता है । “परोपकाराय सतां विभूतयः” - इस उक्ति के अनुसार इसके ऐश्वर्य परोपकार के लिए ही होते हैं । (न गृध्नुः) = यह धनों में लालचवाला नहीं होता । धन में लालच होने पर उनका परोपकार में विनियोग सम्भव नहीं रहता । (अस्ता इव) = यह लोकहित के लिए इन धनों को ‘असु क्षेपणे’ क्षिप्त करनेवाला होता है । अपनी आवश्यकताओं को फेंकता जाता है, कम और कम करता जाता है और इस प्रकार लोकहित के कार्यों में धन देनेवाला हो पाता है । (शूरः) = यह दानशूर होता है । धन के उचित विनियोग से दुःखियों के दुःख को शीर्ण करनेवाला होता है । २. (याता इव) = यह सदा आक्रान्ता की भाँति बना रहता है । कष्टों व बुराइयों के साथ सदा इसका युद्ध चलता है । यह उस युद्ध में बुराइयों पर प्रबल आक्रमण करता है और (भीमः) = शत्रुओं के लिए भयंकर होता है । इन (समत्सुः) = संग्रामों में यह (त्वेष) = खूब (दीप्त) = चमकवाला होता है । इन युद्धों में यह पूर्ण उत्साहवाला होता है । लोककष्टों से संग्राम करता हुआ यह अधिक - से - अधिक चमकता है । यह ‘सर्वभूतहितेरतार्थ’ ही तो अध्यात्म - सम्पत्ति की पराकाष्ठा है । यह औरों के लिए जीता है, इसकी अपनी कोई आवश्यकता नहीं होती ।
भावार्थ
भावार्थ - साधुत्व, अलोलुपता, त्याग, शूरवीरता, बुराइयों पर आक्रमण, शत्रु के लिए भयंकरता, संग्राम - दीप्ति - ये सब मिलकर अध्यात्म - सम्पत्ति कहलाती हैं ।
विशेष / सूचना
विशेष - हम अग्नि व सुशोक प्रभु का उपासन करें [१] । वे प्रभु चराचर में व्यापक हैं [२] । क्षपावान् व रयिप्रदाता हैं [३] । प्रभु का सच्चा उपासक कों में सत्यता लाता है [४] । ज्ञानपूर्वक कर्मों को करता हुआ उन्हें प्रभु के प्रति अर्पण करता हैं [५] । परहित में लगा रहकर यह अध्यात्म - सम्पत्ति का सञ्चय करता है [६] । हम प्रभुरूप पति की कामना करनेवाले हों - इन शब्दों से अगला सूक्त आरम्भ होता है -
इंग्लिश (3)
Meaning
Immensely loving, generous and venerable as a saint, heroic like a brave archer, terrible like the dispenser of punishment, and blazing and brilliant in the battles of life: such is Agni, light, life and might of the world.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How is Agni (President of the Assembly is taught in the 6th Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
(1) O men, you should ever serve and adore God who like a benevolent person always desires the progress of His subjects, who like the caster of arms is the remover of the miseries of His devotees, who like the fierce King attacking the unjust wicked persons is the victor of all ignorance and being Resplendent is to be realised on the occasions of the soul's communion with Himself. (2) The President of the Assembly or the commander of the Army who is accomplisher of good deeds, is the well-wisher of all the brave and caster of arms over his enemies in the battles, should always be served by all.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(साधुः) यः परोपकारी परकार्याणि साघ्नोति सः = A benevolent person. (गृघ्नुः) परोत्कर्षाभिकाङ्क्षकः = Desirous of others' advancement or progre (याता) दण्डप्रापक: = Giver of just punishment. (समत्सु ) संग्रामेषु = In the battles समत्सु इति संग्रामनाम (निघo)
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
There is Shleshalankara or double entendre used in the Mantra. You should know that there is no king except God or a righteous learned president of the Assembly who is destroyer of enemies, punisher of the evil-doers and augmenter of happiness. Knowing this, you should always multiply noble deeds done for the good of others.
Translator's Notes
This hymn is connected with the previous hymn as there is mention of God and President of the Assembly etc. as in that previous hymn. Here ends the commentary on the seventh hymn and fourth Verga of the First Mandala of the Rigveda.
Subject of the mantra
Then, what kind of that Chairman of the Assembly should be?This issue has been discussed in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O! (manuṣyāḥ) =humans, (yūyam) =all of you, (yaḥ) =those, (gṛdhnuḥ)=wish for others to rise, (sādhuḥ)=Benevolent and one who accomplishes the work of others, (na) =like, (astāiva)=in the same way is launcher of weapons, (śūraḥ)=is warrior, (bhīmaḥ) =by which terrible, [śakti] =fears, that, (yāteva)=like a punisher, (samatsu) =in battle, (tveṣaḥ)=who shines, (parameśvaraḥ) =God or, (sabhādhyakṣaḥ)= President of the Assembly, (asti) =is, (tam) =to him, (nityam) =daily,(sevadhvam) =worship.
English Translation (K.K.V.)
O humans! All of you, who wish for others to rise, are philanthropists and warriors who launch weapons just like the one who completes the work of others. The terrible power that one fears is the God who shines in battle like the one who receives punishment or the President of the Assembly. Worship him daily.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
There are paronomasia and simile as figurative in this mantra. O humans! Apart from God, the righteous and learned one, the President of the Assembly etc., no one else is a king by his own will, the one who conquers the enemies, the one who punishes, the one who increases happiness from every side. Certainly, He is a benefactor of all and increases happiness from every side.
TRANSLATOR’S NOTES-
Since this hymn describes the qualities of God, man and the President of the Assembly etc., the interpretation of this hymn should be consistent with the interpretation of the previous hymn.
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