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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 85 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 85/ मन्त्र 1
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - मरुतः छन्दः - जगती स्वरः - निषादः

    प्र ये शुम्भ॑न्ते॒ जन॑यो॒ न सप्त॑यो॒ याम॑न्रु॒द्रस्य॑ सू॒नवः॑ सु॒दंस॑सः। रोद॑सी॒ हि म॒रुत॑श्चक्रि॒रे वृ॒धे मद॑न्ति वी॒रा वि॒दथे॑षु॒ घृष्व॑यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । ये । शुम्भ॑न्ते । जन॑यः । न । सप्त॑यः । याम॑न् । रु॒द्रस्य॑ । सू॒नवः॑ । सु॒ऽदंस॑सः । रोद॑सी॒ इति॑ । हि । म॒रुतः॑ । च॒क्रि॒रे । वृ॒धे । मद॑न्ति । वी॒राः । वि॒दथे॑षु । घृष्व॑यः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामन्रुद्रस्य सूनवः सुदंससः। रोदसी हि मरुतश्चक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वयः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र। ये। शुम्भन्ते। जनयः। न। सप्तयः। यामन्। रुद्रस्य। सूनवः। सुऽदंससः। रोदसी इति। हि। मरुतः। चक्रिरे। वृधे। मदन्ति। वीराः। विदथेषु। घृष्वयः ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 85; मन्त्र » 1
    अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 9; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्ते सेनाध्यक्षादयः कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    ये रुद्रस्य सूनवः सुदंससो घृष्वयो वीरा हि यामन्मार्गेऽलङ्कारैः शुम्भमाना अलंकृता जनयो नेव सप्तयोऽश्वा इव गच्छन्तो मरुतो रोदसी इव वृधे विदथेषु विजयं चक्रिरे ते प्रशुम्भन्ते मदन्ति तैः सह त्वं प्रजायाः पालनं कुरु ॥ १ ॥

    पदार्थः

    (प्र) प्रकृष्टे (ये) वक्ष्यमाणाः (शुम्भन्ते) शोभन्ते (जनयः) जायाः (न) इव (सप्तयः) अश्वा इव। सप्तिरित्यश्वनामसु पठितम्। (निघं०१.१४) (यामन्) यान्ति यस्मिन् मार्गे तस्मिन्। अत्र सुपां सुलुगिति ङेर्लुक्। सर्वधातुभ्यो मनिन्नित्यौणादिको मनिन् प्रत्ययः। (रुद्रस्य) शत्रूणां रोदयितुर्महावीरस्य (सूनवः) पुत्राः (सुदंससः) शोभनानि दंसांसि कर्माणि येषां ते। दंस इति कर्मनामसु पठितम्। (निघं०२.१) (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (हि) खलु (मरुतः) तथा वायवस्तथा (चक्रिरे) कुर्वन्ति (वृधे) वर्धनाय (मदन्ति) हर्षन्ति। विकरणव्यत्ययेन श्यनः स्थाने शप्। (वीराः) शौर्यादिगुणयुक्ताः पुरुषाः (विदथेषु) संग्रामेषु (घृष्वयः) सम्यग् घर्षणशीलाः। कृविघृष्वि०। (उणा०४.५७) घृषु संघर्ष इत्यस्माद्विन् प्रत्ययः ॥ १ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यथा सुशिक्षिता पतिव्रता स्त्रियः पतीन् वा स्त्रीव्रताः पतयो जायाः सेवित्वा सुखयन्ति। यथा शोभमाना बलवन्तो हयाः पथि शीघ्रं गमयित्वा हर्षयन्ति तथा धार्मिका वीराः सर्वाः प्रजा मोदयन्ति ॥ १ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वे सेनाध्यक्ष आदि कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    (ये) जो (रुद्रस्य) दुष्टों के रुलानेवाले के (सूनवः) पुत्र (सुदंससः) उत्तम कर्म करनेहारे (घृष्वयः) आनन्दयुक्त (वीराः) वीरपुरुष (हि) निश्चय (यामन्) मार्ग में जैसे अलङ्कारों से सुशोभित (जनयः) सुशील स्त्रियों के (न) तुल्य और (सप्तयः) अश्व के समान शीघ्र जाने-आनेहारे (मरुतः) वायु (रोदसी) प्रकाश और पृथ्वी के धारण के समान (वृधे) बढ़ने के अर्थ राज्य का धारण करते (विदथेषु) संग्रामों में विजय को (चक्रिरे) करते हैं, वे (प्र शुम्भन्ते) अच्छे प्रकार शोभायुक्त और (मदन्ति) आनन्द को प्राप्त होते हैं, उनसे तू प्रजा का पालन कर ॥ १ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे अच्छी शिक्षा और विद्या को प्राप्त हुई पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतियों का अथवा स्त्रीव्रत सदा अपनी स्त्रियों ही से प्रसन्न ऋतुगामी पति लोग अपनी स्त्रियों का सेवन करके सुखी और जैसे सुन्दर बलवान् घोड़े मार्ग में शीघ्र पहुँचा के आनन्दित करते हैं, वैसे धार्मिक राजपुरुष सब प्रजा को आनन्दित किया करें ॥ १ ॥

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    विषय

    सद्गुणमण्डित जीवन

    पदार्थ

    १. वे (वीराः) = वीरपुरुष (मदन्ति) = हर्षित करते हैं (ये) = जो (जनयः न) = स्त्रियों [queens] के समान (प्रशुम्भन्ते) = अपने जीवन को गुणों से अलंकृत करते हैं । जैसे एक रानी अपने शरीर को भूषणों से सुशोभित करती है, उसी प्रकार हमें अपने जीवनों को सद्गुणों से मण्डित करने का प्रयत्न करना है । २. वे व्यक्ति आनन्द का अनुभव करते हैं जो (यामन्) = जीवन - यात्रा के मार्ग में (सप्तयः) = अश्वों के समान हैं । अश्व मार्ग का तीव्रता से व्यापन करता है, इसी प्रकार ये व्यक्ति भी अपने जीवन - मार्ग को पूर्णरूपेण आक्रान्त करने का प्रयास करते हैं । ३. ये (रुद्रस्य सूनवः) = उस अन्तः स्थित उपदेष्टा प्रभु के [रुत्+र] सच्चे पुत्र बनते हैं । 'यः प्रीणयेत्सचरित्रैः पितरं स पुत्रः - पुत्र वही तो है जो अपने सुचरित्रों से पिता को प्रीणित करे । इसलिए (सुदंससः) = ये सदा उत्तम कर्मोंवाले होते हैं । ४. इनके जीवन में (मरुतः) = प्राण (हि) = निश्चय से (रोदसी) = द्यावापृथिवी को (वृधे चक्रिरे) = वृद्धि के लिए करते हैं । मस्तिष्क व शरीर ही द्यावापृथिवी हैं । प्राणसाधना से इसका मस्तिष्क ज्योतिर्मय बनता है और शरीर दृढ़ होता है । ५. इस प्रकार ज्योतिर्मय मस्तिष्क व दृढ़ शरीरवाले बनकर ये वीर (विदथेषु) = ज्ञानयज्ञों में (घृष्वयः) = काम - क्रोधादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाले होते हैं । काम - क्रोधादि के पराभव में हमारी वास्तविक विजय है और यह विजय की उल्लास का कारण बनती है ।

    भावार्थ

    भावार्थ = जीवन को सद्गुणों से अलंकृत करके हम प्रभु के प्रिय बनें । वासनाओं को जीतनेवाले वीर बनकर आनन्द का अनुभव करें ।

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    विषय

    पदाभिषिक्त विद्वानों और वीर पुरुषों का वायु के दृष्टान्त से वर्णन । उनके कर्तव्य ।

    भावार्थ

    ( यामन् ) जाने के अवसर में ( जनयः न ) जिस प्रकार स्त्रियें ( शुम्भन्ते ) अपने को सजाती हैं और ( यामन् ) जानेयोग्य मार्ग में जिस प्रकार ( सप्तयः ) वेग से जाने वाले अश्व ( शुम्भन्ते ) शोभा प्राप्त करते हैं, उसी या आज्ञा के प्रवर्तक प्रकार ( रुद्रस्य सूनवः ) शत्रुओं को रुलाने वाले, राजा और उपदेष्टा आचार्य के ( सूनवः ) पुत्र के समान पदाभिषिक्त शासक वीर सैनिक और शिष्य गण ( सुदंससः ) उत्तम कर्म और आचरण वाले ( मरुतः ) विद्वान् वायु के समान तीव्र गति से जाने वाले ( घृष्वयः ) पर-पक्ष वालों से संघर्ष या स्पर्द्धा करने चाले ( वीराः ) वीर्यवान्, वीरगण, ( रोदसी ) सूर्य और पृथिवी के समान राजवर्ग और प्रजावर्ग या स्वपक्ष और परपक्ष दोनों की ( वृधे ) वृद्धि के लिये, ( चक्रिरे ) कार्य करते हैं और ( विदथेषु ) संग्रामों और ज्ञान लाभ के अवसरों पर ( मदन्ति ) हर्षित होते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः- १, २,६, ११ जगती । ३, ७, ८ निचृज्जगती । ४, ६, १० विराड्जगती । ५ विराट् त्रिष्टुप् । १२ त्रिष्टुप्॥ द्वादशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    विषय

    या सूक्तात वायूप्रमाणे सभाध्यक्ष राजा व प्रजेच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्तार्थाची संगती पूर्वसूक्तार्थाबरोबर समजली पाहिजे. ॥

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जशा सुशिक्षित पतिव्रता स्त्रिया आपल्या पतीचाच अंगीकार करतात किंवा स्त्रीव्रत पती सदैव आपल्या स्त्रियांचा स्वीकार करतात व सुखी होतात. जसे सुंदर बलवान घोडे रस्त्याने धावून तात्काळ (एखाद्या स्थानी) पोचवितात व आनंदित करतात तसे धार्मिक राजपुरुषांनी सर्व प्रजेला आनंदित करावे. ॥ १ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Maruts, the winds, currents of energy, tempestuous warriors of noble action, children of Rudra, lord of justice and dispensation, move on their highways and shine like graceful beauties and coursers of lightning speed. They fill the heaven and earth with their vibrations and actions for the sake of progress and expansion. Heroes of mighty power, they fight and rejoice in yajnic acts of creation and growth of life.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should be the commanders of the army etc. is taught in the first mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    The Maruts (brave soldiers) are the sons of mighty conquerors of enemies whom they cause to weep. They are doers of good works, strong and impetuos. On their way, they look beautiful like wives decorated with ornaments. They are like powerful horses going to the battlefield. They promote the welfare of earth and heaven and are victorious in battles. Their horses shine and delight. With them O commander of the army you should protect the subjects well.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (जनय:) जाया: = Wives (रुद्रस्य) शत्रूणां रोवयितुर्महावीरस्य = Of the powerful conqueror of his enemies,causing them to weep.. (मरुतः वीरा:) यथा वायवः तथा शौर्यादिगुणयुक्ताः पुरुषाः = Brave persons impetuous or powerful like winds. (घृष्वयः) सम्यग् घर्षणशिलाः कृविधृष्वि उणाः ४.७४ घृषु संघर्षे इत्य्स्माद विन्प्रत्ययः = Impetuous-good fighters.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Their is Upamalankara (similes) used in the Mantra. As highly educated chaste wives serve their husbands and faithful husbands serve their wives well and thus make them happy, and as beautiful and powerful horses rapidly going on the road gladden all, in the same manner, righteous heroes delight all the subjects.

    Translator's Notes

    It is quite clear from the adjectives and other expressions used for the Maruts that they stand for brave persons or heroes. Yet Prof. Wilson, Maxmuller and other Western Scholars translate Marutah as "Storm Gods" which is entirely wrong. Their own translation of many expressions and adjectives clearly shows (as we shall point out here and there) that they are biave men and not storm Gods. Unfortunately prof. Maxmuller was not able to grasp the spirit and meaning of many phrases. In his note he admits. The phrase is obscure (Vedic Hymns Vol. 1 P. 128). Not able to understand that there are two separate similes used in the Mantra, he takes them as one meaning mares or yokefellows etc. which is only his imagination. The adjectives and expressions like सुदंसस:=Doers of good works, बीरा:= Heroes and घृष्वयः, विदथेषु मदन्ति meaning according to him als etc. Powerful who delight in sacrifices clearly indicate that they are brave persons.

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