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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 86 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 86/ मन्त्र 5
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - मरुतः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒स्य श्रो॑ष॒न्त्वा भुवो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि। सूरं॑ चित्स॒स्रुषी॒रिषः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्य । श्रो॒ष॒न्तु॒ । आ । भुवः॑ । विश्वाः॑ । यः । च॒र्ष॒णीः । अ॒भि । सूर॑म् । चि॒त् । स॒स्रुषीः॑ । इषः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्य श्रोषन्त्वा भुवो विश्वा यश्चर्षणीरभि। सूरं चित्सस्रुषीरिषः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य। श्रोषन्तु। आ। भुवः। विश्वाः। यः। चर्षणीः। अभि। सूरम्। चित्। सस्रुषीः। इषः ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 86; मन्त्र » 5
    अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 11; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्ते किं कुर्युरित्युपदिश्यते

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! भवन्तोऽस्य सुशिक्षितस्येषश्चिदिव विश्वाः सस्रुषीराभुवश्चर्षणीः प्रजाः किरणाः सूरमिवाभिश्रोषन्तु ॥ ५ ॥

    पदार्थः

    (अस्य) सुशिक्षितस्य मनुष्यस्य (श्रोषन्तु) शृण्वन्तु। अत्र विकरणव्यत्ययेन लोटि सिप्। (आ) सर्वतः (भुवः) भूमयः (विश्वाः) सर्वाः (यः) (चर्षणीः) मनुष्यान् (अभि) आभिमुख्ये (सूरम्) प्रेरयितारमध्यापकम् (चित्) इव (सस्रुषीः) प्राप्तव्याः (इषः) इष्टसाधकाः किरणाः ॥ ५ ॥

    भावार्थः

    यो मनुष्यः सुशिक्षितः सुपरीक्षितः शुभलक्षणः सर्वविद्यो दृढिष्ठो बलिष्ठोऽध्यापकः सुसहायः पुरुषार्थी धार्मिको विद्वानस्ति, स एव पूर्णान् धर्मार्थकाममोक्षान् प्राप्तः सन् प्रजाया दुःखानि निवार्य परां विद्यां श्रुत्वा प्राप्नोति नातो विरुद्धः ॥ ५ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वे क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो आप लोग (अस्य) इस सुशिक्षित विद्वान् के (इषः) इष्टसाधक किरणों के (चित्) समान (विश्वाः) सब (सस्रुषीः) प्राप्त होने के योग्य (आभुवः) सब ओर से सुखयुक्त (चर्षणीः) मनुष्यरूप प्रजा को जैसे किरणें (सूरम्) सूर्य को प्राप्त होती हैं, वैसे (अभि श्रोषन्तु) सब ओर से सुनो ॥ ५ ॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य अच्छी शिक्षा से युक्त, अच्छे प्रकार परीक्षित, शुभलक्षणयुक्त, सम्पूर्ण विद्याओं का वेत्ता, दृढ़ाङ्ग, अतिबली, पढ़ानेहारा, श्रेष्ठ सहाय से सहित, पुरुषार्थी धार्मिक विद्वान् है, वही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होके प्रजा के दुःख का निवारण कर पराविद्या को सुनके प्राप्त होता है, इससे विरुद्ध मनुष्य नहीं ॥ ५ ॥

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    विषय

    प्रभुप्रेरणा का श्रवण

    पदार्थ

    १. (आभुवः) = शरीर में सर्वत्र व्याप्त होनेवाले प्राण (अस्य) = इस आराधक की प्रार्थना को (श्रोषन्तु) = सुनें (या) = जो (विश्वा चर्षणीः अभि) = सब मनुष्यों की ओर जानेवाला होता है, सभी के हित का ध्यान करता है । प्राणसाधक पुरुष स्वार्थ की वृत्ति से ऊपर उठकर परार्थ में चलता है । २. इस (सूरम्) = ज्ञानी पुरुष को (इषः चित्) = प्रेरणाएँ भी (सस्रुषीः) = प्राप्त होती है । वस्तुतः प्राणसाधना से बुद्धि तीव्र होकर ज्ञान बढ़ता है और हृदय की निर्मलता के कारण अन्तः स्थित प्रभु की प्रेरणाएँ सुन पड़ती है । इन परिणामों को देखकर कहते हैं कि 'प्राणों ने इस व्यक्ति की प्रार्थना को सुना' ।

    भावार्थ

    भावार्थ = प्राणसाधक लोकहित के कर्म करता है, ज्ञानी बनता है, प्रभु की प्रेरणा को सुन पाता है ।

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    विषय

    उनके कर्तव्य ।

    भावार्थ

    ( यः ) जो ( चर्षणीः अभि ) सब विद्वान् मनुष्यों के प्रति कृपालु है और ( सूरेचित् ) सूर्य के चारों ओर जिस प्रकार किरणें सूर्य के अधीन रहती हैं उस प्रकार ( विश्वाः ) समस्त ( भुवः ) बलशालिनी भूमिवासिनी ( सस्रुषीः ) वेग से प्रयाण करने वाली ( इषः ) प्रजाएं और सेनाएं ( अस्य ) इसके आज्ञा-वचनों और उपदेशों को ( श्रोषन्तु ) श्रवण करें । इत्येकादशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः–१, ४, ८, ९ गायत्री । २, ३, ७ पिपीलिका मध्या निचृद्गायत्री । ५, ६, १० निचृद्गायत्री ॥ दशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर वे मनुष्य क्या करें, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे मनुष्याः ! भवन्तः अस्य सुशिक्षितस्य इषः चित् इव विश्वाः सस्रुषीः आ भुवः चर्षणीः प्रजाः किरणाः सूरम् इव अभि श्रोषन्तु ॥५॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (मनुष्याः)= मनुष्यों! (भवन्तः)=आप, (अस्य) सुशिक्षितस्य मनुष्यस्य=इस सुशिक्षित मनुष्य की, (इषः) इष्टसाधकाः किरणाः=कामनाओं को पूर्ण करनेवाली किरणों के, (चित्) इव=समान, (विश्वाः) सर्वाः=समस्त, (सस्रुषीः) प्राप्तव्याः=प्राप्त किये जाने योग्य, (आ) सर्वतः=हर ओर से, (भुवः) भूमयः=भूमि के, (चर्षणीः) मनुष्यान् =मनुष्यों को, अर्थात् (प्रजाः)= प्रजा, (किरणाः)= किरणें, (सूरम्) प्रेरयितारमध्यापकम्=प्रेरित करनेवाले अध्यापक को, (इव)= ऐसे ही, (अभि) आभिमुख्ये=सामने से, (श्रोषन्तु) शृण्वन्तु=सुनो॥५॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- जो मनुष्य सुशिक्षित, अच्छे प्रकार परीक्षित, शुभलक्षणवाला, दृढिष्ठ, बलवान्, अध्यापक, अच्छे सहायकोंवाला, पुरुषार्थी और धार्मिक विद्वान् है। वही पूर्ण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करते हुए प्रजा के दुःखों को दूर करके ईश्वर को प्राप्त करने की विद्या को सुन करके, उसे प्राप्त कर लेता है, इन गुणों से विपरीत मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता है ॥५॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (मनुष्याः) मनुष्यों! (भवन्तः) आप (अस्य) इस सुशिक्षित मनुष्य की (इषः) कामनाओं को पूर्ण करनेवाली किरणों के, (चित्) समान, (विश्वाः) समस्त (सस्रुषीः) प्राप्त किये जाने योग्य और (आ) हर ओर से [जैसे] (किरणाः) किरणें (भुवः) भूमि पर पड़ती हैं, ऐसे ही (चर्षणीः) मनुष्य, अर्थात् (प्रजाः) प्रजा (सूरम्) प्रेरित करनेवाले अध्यापक को (इव) ऐसे ही (अभि) सामने से (श्रोषन्तु) सुनो॥५॥

    संस्कृत भाग

    अ॒स्य । श्रो॒ष॒न्तु॒ । आ । भुवः॑ । विश्वाः॑ । यः । च॒र्ष॒णीः । अ॒भि । सूर॑म् । चि॒त् । स॒स्रुषीः॑ । इषः॑ ॥ विषयः- पुनस्ते किं कुर्युरित्युपदिश्यते। भावार्थः(महर्षिकृतः)- यो मनुष्यः सुशिक्षितः सुपरीक्षितः शुभलक्षणः सर्वविद्यो दृढिष्ठो बलिष्ठोऽध्यापकः सुसहायः पुरुषार्थी धार्मिको विद्वानस्ति, स एव पूर्णान् धर्मार्थकाममोक्षान् प्राप्तः सन् प्रजाया दुःखानि निवार्य परां विद्यां श्रुत्वा प्राप्नोति नातो विरुद्धः ॥५॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो माणूस सुशिक्षित, सुपरीक्षित, शुभलक्षणयुक्त, संपूर्ण विद्या जाणणारा, दृढ अंगाचा, अतिबलवान, अध्यापक, श्रेष्ठ सहायक, पुरुषार्थी, धार्मिक विद्वान असतो तोच धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त करून प्रजेच्या दुःखाचे निवारण करून पराविद्येचे श्रवण करून ती प्राप्त करतो यापेक्षा वेगळा माणूस ते प्राप्त करू शकत नाही. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Let all people of the world listen to this brave young man and let their homage reach him as the homage and gratitude of the world reaches the sun for the gift of light and life.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What should good men do is taught further in the fifth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men ,listen to the words of this well-trained and highly educated person who is victorious over all men. You approach or go to that noble impeller or teacher for advice, as the rays go to the sun.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (सूरम्) प्रेरयितारम् अध्यापक म् = An impelier and teacher. यः सरति प्राप्नोति स सूरः श्री दयानन्दषि: ऋ० १.५०. ६ भाष्ये = The sun (इष:) इष्टसाधका : किरणा: = of the sun (सस्त्रु षी:) प्राप्तव्याः = The rays Approachable.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    “Only that man who is highly educated, well-trained, well tested, endowed with noble virtues, strong and mighty, industrious, righteous, helper of all, a good teacher can attain Dharma (righteousness) Artha (Wealth) Kama (fulfilment of noble desires) and Moksha ( emancipation). It is he who can remove the miseries of the people after listening to the tale of their suffering and having attained supreme wisdom and none else.

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    Subject of the mantra

    Then, what should those humans do? This topic has been discussed in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (manuṣyāḥ) man=humans, (bhavantaḥ)=you, (asya) =of this well-educated man, (iṣaḥ) =of wish fulfilling rays, (cit) =like, (viśvāḥ) =all, (sasruṣīḥ)=attainable and, (ā) =from all sides, [jaise]=like, (kiraṇāḥ) =rays, (bhuvaḥ) =fall on the ground, just like that, (carṣaṇīḥ) =man, i.e., (prajāḥ) =people, (sūram) =to the inspiring teacher, (iva) =similarly, (abhi) =from front, (śroṣantu) =listen.

    English Translation (K.K.V.)

    O humans! Like the rays that fulfill the wishes of this well-educated man, everything is attainable and just as the rays fall on the earth from all sides, listen this man, i.e. the teacher who inspires the people from the front like this.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    The person who is well educated, well tested, has good traits, is determined, strong, has teachers, good helpers, a hard worker and is a righteous scholar. He attains complete Dharma (righteousness), Artha (wealth), Kama (fulfillment of desires) and Moksha (salvation) by removing the sufferings of the people and by listening to the knowledge of attaining God, a person who is contrary to these qualities cannot do so.

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