ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 86/ मन्त्र 8
श॒श॒मा॒नस्य॑ वा नरः॒ स्वेद॑स्य सत्यशवसः। वि॒दा काम॑स्य॒ वेन॑तः ॥
स्वर सहित पद पाठश॒श॒मा॒नस्य॑ । वा॒ । न॒रः॒ । स्वेद॑स्य । स॒त्य॒ऽश॒व॒सः॒ । वि॒द । काम॑स्य । वेन॑तः ॥
स्वर रहित मन्त्र
शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः। विदा कामस्य वेनतः ॥
स्वर रहित पद पाठशशमानस्य। वा। नरः। स्वेदस्य। सत्यऽशवसः। विद। कामस्य। वेनतः ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 86; मन्त्र » 8
अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 12; मन्त्र » 3
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अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 12; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
मनुष्यैस्तेषां सङ्गेन किं विज्ञातव्यमित्युपदिश्यते ॥
अन्वयः
हे नरो ! यूयं सभाद्यध्यक्षादीनां सङ्गेन स्वपुरुषार्थेन वा शशमानस्य सत्यशवसो वेनतः स्वेदस्य कामस्य विद विजानीत ॥ ८ ॥
पदार्थः
(शशमानस्य) विज्ञातव्यस्य। अत्र सर्वत्र अधिगर्थ इति शेषत्वविवक्षायां षष्ठी। (वा) अथवा (नरः) सर्वकार्यनेतारो मनुष्यास्तत्सम्बुद्धौ (स्वेदस्य) पुरुषार्थेन जायमानस्य (सत्यशवसः) नित्यदृढबलस्य (विद) वित्थ। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (कामस्य) (वेनतः) सर्वशास्त्रैः श्रुतस्य कमनीयस्य। अत्र वेनृधातोर्बाहुलकादौणादिकोऽति प्रत्ययः ॥ ८ ॥
भावार्थः
नहि कश्चिद्विदुषां सङ्गेन विना सत्यान् कामान् सदसद्विज्ञातुं च शक्नोति, तस्मादेतत् सर्वैरनुष्ठेयम् ॥ ८ ॥
हिन्दी (4)
विषय
उनके सङ्ग से मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥
पदार्थ
हे (नरः) मनुष्यो ! तुम सभाध्यक्षादिकों के संग (वा) पुरुषार्थ से (शशमानस्य) जानने योग्य (सत्यशवसः) जिसमें नित्य पुरुषार्थ करना हो (वेनतः) जो कि सब शास्त्रों से सुना जाता हो तथा कामना के योग्य और (स्वेदस्य) पुरुषार्थ से सिद्ध होता है, उस (कामस्य) काम को (विद) जानो अर्थात् उसको स्मरण से सिद्ध करो ॥ ८ ॥
भावार्थ
कोई पुरुष विद्वानों के संग विना सत्य काम और अच्छे-बुरे को जान नहीं सकता। इससे सबको विद्वानों का संग करना चाहिये ॥ ८ ॥
विषय
सत्यवादी मेधावी
पदार्थ
१. हे (नरः) = [नृ नये] उन्नतिपथ पर ले - चलनेवाले मरुतो ! आप (कामस्य विद) = इच्छा को [लम्भयत] प्राप्त कराते हो, पूर्ण करते हो, किसकी ? जो [क] (शशमानस्य) = [शश प्लुतगतौ] स्फूर्ति से कार्य करनेवाला है, जिसमें नाममात्र भी आलस्य नहीं है । [ख] (वा) = अथवा (स्वेदस्य) = जो श्रम के द्वारा अपने को पसीने से तरबतर कर लेता है, अत्यन्त श्रमशील है । [ग] (सत्यशवसः) = सत्य के बलवाला है - जो सत्य के द्वारा अपने मन को सदा शुद्ध रखता है और [घ] (वेनतः) = जो विचारशील, मेधावी व स्तुति की प्रवृत्तिवाला है [to reflect, to see, to worship] । २. वस्तुतः प्राणसाधना के द्वारा ही हममें वे गुण उत्पन्न होते हैं जोकि 'शशमानस्य, स्वेपस्य, सत्यशवसः तथा वेनतः' शब्दों से सूचित हो रहे हैं । प्राणसाधना हमें 'प्लुतगतिवाला, अत्यन्त श्रमशील, सत्यप्रधान तथा मेधावी' बनाती है ।
भावार्थ
भावार्थ = प्राणसाधना से हम आलस्य से ऊपर उठकर श्रमशील, सत्यवादी व मेधावी बनें ।
विषय
अध्यात्म में प्राणों का वर्णन ।
भावार्थ
हे ( नरः ) नायक पुरुषो ! हे ( सत्यशवसः ) सत्य ज्ञान और नित्य बल से युक्त पुरुषो ! (स्वेदस्य) पसीना बहाने वाले, परिश्रमी, ( शशमानस्य ) सत्य ज्ञान का उपदेश करने वाले, ( वेनतः ) नाना उत्तम कामना करने वाले पुरुष के ( कामस्य ) उत्तम संकल्प को ( विद ) जानो। अथवा—( सत्यशवसः) सत्य के बल पर आश्रित, ( स्वेदस्य ) परिश्रम से प्राप्त करने योग्य ( शशमानस्य ) उत्तम पुरुषों द्वारा उपदेश योग्य, ( वेनतः ) विद्वानों और शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित कामना करने योग्य (कामस्य) धर्मानुकूल काम नामक अभिलाषा योग्य, पुत्रैषणा रूप पुरुषार्थ का भी ( वेद ) अच्छी प्रकार ज्ञान करो ।
टिप्पणी
प्रजनश्चास्मि कंदर्पः ॥ धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ ॥ गीता० ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः–१, ४, ८, ९ गायत्री । २, ३, ७ पिपीलिका मध्या निचृद्गायत्री । ५, ६, १० निचृद्गायत्री ॥ दशर्चं सूक्तम् ॥
विषय
विषय (भाषा)- उनके सङ्ग से मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, यह विषय इस मन्त्र में कहा है ॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे नरः ! यूयं सभाद्यध्यक्ष आदीनां सङ्गेन स्वपुरुषार्थेन वा शशमानस्य सत्यशवसः वेनतः स्वेदस्य कामस्य विद विजानीत ॥८॥
पदार्थ
पदार्थः- हे (नरः) सर्वकार्यनेतारो मनुष्यास्तत्सम्बुद्धौ=समस्त कार्यों में नेतृत्व करनेवाले मनुष्यों ! (यूयम्)=तुम सब, (सभाद्यध्यक्ष)=सभा आदि के अध्यक्ष, (आदीनाम्)=आदि की, (सङ्गेन)= सङ्गति से और, (स्वपुरुषार्थेन)=अपने पुरुषार्थ से, (वा) अथवा= अथवा, (शशमानस्य) विज्ञातव्यस्य=जानने योग्य से, (सत्यशवसः) नित्यदृढबलस्य=नित्य दृढ बलवाले के, (वेनतः) सर्वशास्त्रैः श्रुतस्य कमनीयस्य=समस्त सुन्दर शास्त्रों को सुने हुए, (स्वेदस्य) पुरुषार्थेन जायमानस्य= पुरुषार्थ से उत्पन्न हुए की, (कामस्य)=इच्छा को, (विद) वित्थ=जानकर, (विजानीत) =निर्णय लीजिये ॥८॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- किन्हीं विद्वानों की संगति के विना सत्य कामनाओं को, सत्य और असत्य रूप में नहीं जाना जा सकता है, इसलिये इसका सबको अनुष्ठान करना चाहिये, अर्थात् विद्वानों की संगति करनी चाहिए॥८॥
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (नरः) समस्त कार्यों में नेतृत्व करनेवाले मनुष्यों ! (यूयम्) तुम सब (सभाद्यध्यक्ष) सभा आदि के अध्यक्ष (आदीनाम्) आदि की (सङ्गेन) सङ्गति से और (स्वपुरुषार्थेन) अपने पुरुषार्थ से (वा) अथवा, (शशमानस्य) जानने योग्य [ज्ञान से], (सत्यशवसः) नित्य दृढ बलवाले के (वेनतः) समस्त शास्त्रों को सुने हुए सुन्दर (स्वेदस्य) पुरुषार्थ से उत्पन्न हुए की (कामस्य) इच्छा को (विद) जानकर (विजानीत) निर्णय लीजिये ॥८॥
संस्कृत भाग
श॒श॒मा॒नस्य॑ । वा॒ । न॒रः॒ । स्वेद॑स्य । स॒त्य॒ऽश॒व॒सः॒ । वि॒द । काम॑स्य । वेन॑तः ॥ विषयः- मनुष्यैस्तेषां सङ्गेन किं विज्ञातव्यमित्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- नहि कश्चिद्विदुषां सङ्गेन विना सत्यान् कामान् सदसद्विज्ञातुं च शक्नोति, तस्मादेतत् सर्वैरनुष्ठेयम् ॥८॥
मराठी (1)
भावार्थ
कोणताही पुरुष विद्वानांच्या संगतीशिवाय सत्य कार्य व चांगले वाईट जाणू शकत नाही. त्यामुळे विद्वानांची संगती केली पाहिजे. ॥ ८ ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Maruts, dynamic powers of action and generosity, know and fulfil the plan and desire of the man truly courageous and powerful, knowledgeable, cultured and graceful who honestly lives by the sweat of his brow.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
What should men know by the association of the Maruts is taught in the 8th Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O leading men, with the association of the Maruts (the Presidents of the assemblies etc.) and with your exertion, acquire the knowledge of true desire which must be thoroughly known, which is full of true vigour, which is charming and explained in all Shastra and which is produced with exertion like the sweat.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(शशमानस्य) विज्ञातव्यस्य = Worthy of being known. (वेनत:) सर्वशास्त्रश्रुतस्य कमनीयस्य = charming and desirable, known through all Shastras. [अत्रवैनृधातोर्बाहुलकावरणादिकोऽतन् प्रत्यय: वेनृ-गतिज्ञान चिन्ता निशामन वादित्र ग्रहणेषु निशामनं-श्रवणम् शव इति बलनाम्(निघ० २.६)| Even Prof. Maxmuller who seems to be so much obssessed with the idea of Maruts as “Storm Gods" has translated नर: an epithet of Maruts used in the Mantra as "ye men of true strength.(Vedic Hymns Vol. 1 By Prof. Maxmuller P.154).We need not comment on it, as at last the cat has come out the bag. The truth about the import of Maruts as noble men has been admitted by Prof. Maxmuller also willy-nilly.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
None is able to acquire the knowledge of true desires and distinguish between good and bad without association with the learned persons. Therefore this should be done by all.
Subject of the mantra
What humans should know from their company? This is mentioned in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O!(naraḥ)= people who take the lead in all tasks, (yūyam) =all of you, (sabhādyadhyakṣa) =President of the Assembly, (ādīnām) =etc., (saṅgena) =in the company and, (svapuruṣārthena) =by own efforts, (vā) =or, (śaśamānasya)=worth knowing, [jñāna se]=by knowledge, (satyaśavasaḥ) =of the eternally rigorous power, (venataḥ) =having heard all the beautiful scriptures, (svedasya)= that arose from effort, (kāmasya) =desire, (vida) =knowing, (vijānīta)= take the decision.
English Translation (K.K.V.)
O people who take the lead in all tasks! All of you, in the company of the President of the Assembly etc. and by your own efforts or by worth knowing knowledge that is capable of knowing the will of the one with of the eternally rigorous power, having heard all the beautiful scriptures, born out of efforts, take the decision.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
Without the association of some scholars, true desires cannot be known as true and false, hence everyone should follow its rituals, that is, they should keep company of scholars.
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