ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 88/ मन्त्र 4
अहा॑नि॒ गृध्राः॒ पर्या व॒ आगु॑रि॒मां धियं॑ वार्का॒र्यां च॑ दे॒वीम्। ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॒ गोत॑मासो अ॒र्कैरू॒र्ध्वं नु॑नुद्र उत्स॒धिं पिब॑ध्यै ॥
स्वर सहित पद पाठअहा॑नि । गृध्राः॑ । परि॑ । आ । वः॒ । आ । अ॒गुः॒ । इ॒माम् । धिय॑म् । वा॒र्का॒र्याम् । च॒ । दे॒वीम् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण्वन्तः॑ । गोत॑मासः । अ॒र्कैः । ऊ॒र्ध्वम् । नु॒नु॒द्रे॒ । उ॒त्स॒ऽधिम् । पिब॑ध्यै ॥
स्वर रहित मन्त्र
अहानि गृध्राः पर्या व आगुरिमां धियं वार्कार्यां च देवीम्। ब्रह्म कृण्वन्तो गोतमासो अर्कैरूर्ध्वं नुनुद्र उत्सधिं पिबध्यै ॥
स्वर रहित पद पाठअहानि। गृध्राः। परि। आ। वः। आ। अगुः। इमाम्। धियम्। वार्कार्याम्। च। देवीम्। ब्रह्म। कृण्वन्तः। गोतमासः। अर्कैः। ऊर्ध्वम्। नुनुद्रे। उत्सऽधिम्। पिबध्यै ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 88; मन्त्र » 4
अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 14; मन्त्र » 4
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अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 14; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! ये गृध्रा गोतमासो ब्रह्म कृण्वन्तः सन्तोऽर्कैरहान्यूर्ध्वं पिबध्या उत्सधिमिवानुनुद्रे ये वो युष्मभ्यं वार्कार्यामिमां देवीं धियं धनं च पर्यागुस्ते सदा सेवनीयाः ॥ ४ ॥
पदार्थः
(अहानि) दिनानि (गृध्राः) अभिकाङ्क्षन्तः (परि) सर्वतः (आ) आभिमुख्ये (वः) युष्मभ्यम् (आ) समन्तात् (अगुः) प्राप्तवन्तः (इमाम्) (धियम्) धारणवतीं प्रज्ञाम् (वार्कार्य्याम्) जलमिव निर्मलां सम्पत्तव्याम् (च) अनुक्तसमुच्चये (देवीम्) देदीप्यमानाम् (ब्रह्म) धनमन्नं वेदाध्यापनम् (कृण्वन्तः) कुर्वन्तः (गोतमासः) अतिशयेन ज्ञानवन्तः (अर्कैः) वेदमन्त्रैः (ऊर्ध्वम्) उत्कृष्टभागम्। (नुनुद्रे) प्रेरते (उत्सधिम्) उत्साः कूपा धीयन्ते यस्मिन् भूमिभागे तम् (पिबध्यै) पातुम् ॥ ४ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे जिज्ञासवो मनुष्या ! यथा पिपासानिवारणादिप्रयोजनायातिश्रमेण जलाशयं निर्माय स्वकार्याणि साध्नुवन्ति, तथैव भवन्तोऽतिपुरुषार्थेन विदुषां सङ्गेन विद्याभ्यासं यथावत् कृत्वा सर्वविद्याप्रकाशां प्रज्ञां प्राप्य तदनुकूलां क्रियां साध्नुवन्तु ॥ ४ ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर भी उक्त विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! जो (गृध्राः) सब प्रकार से अच्छी काङ्क्षा करनेवाले (गोतमासः) अत्यन्त ज्ञानवान् सज्जन (ब्रह्म) धन, अन्न और वेद का पठन (कृण्वन्तः) करते हुए (अर्कैः) वेदमन्त्रों से (अहानि) दिनोंदिन (ऊर्ध्वम्) उत्कर्षता से (पिबध्यै) पीने के लिये (उत्सधिम्) जिस भूमि में कुएं नियत किये जावें, उसके समान (आ+नुनुद्रे) सर्वथा उत्कर्ष होने के लिये (वः) तुम्हारे सामने होकर प्रेरणा करते हैं वे (वार्कार्य्याम्) जल के तुल्य निर्मल होने के योग्य (देवीम्) प्रकाश को प्राप्त होती हुई (इमाम्) इस (धियम्) धारणवती बुद्धि (च) और धन को (परि+आ+अगुः) सब कहीं से अच्छे प्रकार प्राप्त हो के अन्य को प्राप्त कराते हैं, वे सदा सेवा के योग्य हैं ॥ ४ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे ज्ञान गौरव चाहनेवालो ! जैसे मनुष्य पिआस के खोने आदि प्रयोजनों के लिये परिश्रम के साथ कुंआ, बावरी, तालाब आदि खुदा कर अपने-अपने कामों को सिद्ध करते हैं, वैसे आप लोग अत्यन्त पुरुषार्थ और विद्धानों के संग से विद्या के अभ्यास को जैसे चाहिये वैसा करके समस्त विद्या से प्रकाशित उत्तम बुद्धि को पाकर उसके अनुकूल क्रिया को सिद्ध करो ॥ ४ ॥
विषय
बुद्धि, दिव्यवृत्ति व ज्ञान
पदार्थ
२. हे (गृध्राः) = ज्ञानप्राप्ति की प्रबल आकांक्षावाले (गोतमासः) = प्रशस्तेन्द्रिय पुरुषो ! (वः) = आपको (अहानि) = वे दिन (परि आगुः) = समन्तात् प्राप्त होते हैं, जबकि आप प्रभु से प्रेरणा की जानेवाली (इमां धियम्) = इस बुद्धि को, (वार् कार्याम्) = सब बुराइयों का निवारण करनेवाली (देवीम्) = दिव्यवृत्ति को (च) = और (ब्रह्म) = उत्कृष्ट ज्ञान को (कृण्वन्तः) = [हेतौ शतृप्रत्ययः] करने के हेतु से (ऊर्ध्वम्) = सर्वोत्कृष्ट (उत्सधिम्) = [उत्सा धीयन्तेऽस्मिन्] सब ज्ञान = स्रोतों को धारण करनेवाले प्रभु को (अर्कैः) = स्तुतिसाधन मन्त्रों से (नुनुद्रे) = अपने हृदयों में प्रेरित करते हैं, अपने हृदयों में प्रभु को आसीन करने के लिए यत्नशील होते हैं, इसलिए कि वे (पिबध्यैः) = इस ज्ञान के पवित्र जलों का पान कर सकें अथवा 'रसो वै सः' - इन शब्दों के अनुसार उस रसरूप प्रभु का लाभ करके आनन्दित हो सकें । 'रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' । २. जीवन के उत्कर्ष के लिए हमें तीन बातों को प्राप्त करना है = [क] बुद्धि [धियम्], [ख] दिव्यवृत्ति [देवीम्] व [ग] ज्ञान [ब्रह्म] । इन तीनों की प्राप्ति के लिए हम अपने हृदयों में प्रभु को आसीन करने के लिए यत्नशील हों । प्रभु को हृदय में आसीन करने पर हम ज्ञान तो प्राप्त करते ही हैं । वे प्रभु "उत्सधि" हैं - सब ज्ञान के स्रोतों को धारण करते हैं । प्रभु से ही सब ज्ञान - प्रवाह बहते हैं । इस प्रभु को हृदय में आसीन करने पर हम अद्भुत आनन्द का पान करनेवाले होते हैं । प्रभु 'रस' हैं । इस रस को प्राप्त करके ही तो मनुष्य आनन्दित होता है । ३. इस सबको कर सकने के लिए हम 'गृध्र' - ज्ञानप्राप्ति की प्रबल लालसावाले हों और ('गोतमासः') = प्रशस्तेन्द्रिय बनें ।
भावार्थ
भावार्थ = हम प्रभु को हृदय में आसीन करेंगे तो 'बुद्धि, दिव्यवृत्ति व ज्ञान' को प्राप्त करते हुए आनन्दरस का पान करनेवाले होंगे ।
विषय
वार्कार्या धी का रहस्य । जल विद्या का उपदेश ।
भावार्थ
[१] (ब्रह्म कृण्वन्तः) वेद का अध्ययन करते (गोतमासः)उत्तम वाणी को धारण करने वाले विद्वान् जन ( अर्कैः ) उत्तम वेद मन्त्रों द्वारा ( पिबध्यै ) ज्ञान-रस का पान करने और औरों को पान कराने के लिये ( ऊर्ध्वं ) सबसे ऊपर ऊंचे स्थान पर विद्यमान, सर्वोच्च, परम ( उत्सधिम् ) ज्ञानानन्द रसों को कूप के समान धारण करने वाले परमेश्वर को ( नुनुद्रे ) प्रेरते अर्थात् उसकी उत्तम रीति से स्तुति वर्णन करते हैं। जैसे ऊंचे स्थान पर बने जलाशय कूप या टैंक से पानी को पान स्नान आदि करने के लिये विद्वान् जन यन्त्रों द्वारा नीचे बहा लेते हैं उसी प्रकार विद्वान् जन अपने से ऊपर, अधिक उच्च कोटि में स्थित परमेश्वर और आचार्य को अपनी ज्ञान-रस पिपासा को शान्त करने के लिये प्रेरित करते हैं, उससे प्रार्थना करते और उसकी स्तुति करते हैं। विद्वान् जन जिस प्रकार ( वार्कार्याम् धियम् ) जल प्राप्त करने की क्रिया को ( परि आ अगुः ) सब प्रकार से साधते हैं उसी प्रकार स्तुतिकर्त्ता विद्वान् जन भी ( वार्कार्याम् ) दुःखों के वारण करने वाली और वरण करने योग्य ज्ञान और ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाली ( देवीम् ) ज्ञानप्रद, सुखप्रद, चित्तों के प्रकाशक देवी, वेदविद्या को ( परि आ आगुः ) सब प्रकार से अभ्यास करते हैं । हे विद्वान् पुरुषो ! ( उत्सधि पिबध्यै ) उत्तम ज्ञान के धारण करने वाले परम रस को पान करने के लिये और ( इमां धियं च ) इस ज्ञान और कर्ममयी दिव्य ऐश्वर्यमय विद्या को प्राप्त करने के लिये ( गृध्राः ) विद्या के और धन के अभिलाषी पुरुष ( अहानि ) सब दिनों ( वः ) तुम लोगों के पास ( परि आ आगुः) सब देशों से आ आ कर एकत्र हों और ज्ञान का अभ्यास करें । [ २ ] किरणों और वृष्टिविद्या के पक्ष में—( अहानि ) दिन गण या सूर्य के प्रकाश ( गृध्राः ) गीधों के समान जलों को अपने भीतर लेने की इच्छा वाले होकर ( इमां ) इस ( वार्कार्याम् ) जल उत्पन्न करने वाली ( देवीम् ) प्रकाशमयी या सूर्य की ( धियं ) धारण शक्ति को ( परि आ अगुः ) सब तरफ फैलाते हैं । ( गोतमासः ) उत्तम सूर्यगण या ( अर्कैः ) किरणों से ( ब्रह्म कृण्वन्तः ) प्रकाश करते हुए, ( पिबध्यै ) पान करने के लिये ( ऊर्ध्वम् उत्सधिम् ) ऊपर, अन्तरिक्ष में कूप के समान अधिक जल को धरने वाले मेघ को ( नुनुद्रे ) प्रेरित करते हैं । [३] (ब्रह्म कृण्वन्तः गोतमासः) जल को उत्पन्न करने वाले कृषि-कर विद्वान् जन ( पिबध्यै ) भूमियों को जल पान कराने अर्थात् सेचने के लिये ( अर्कैः ) नाना साधनों से ( उत्सधिम् ) कूप में स्थित जल को ( ऊर्ध्वं नुनु ) ऊपर खींच लेवें । ( गृध्राः ) जल के अभिलाषी लोग भी ( इमां वार्कार्यां देवीं धियम् ) इस जल प्राप्त करने की सुखप्रद उत्तम क्रिया को ( वः ) तुम लोगों से (परि आ आगुः) सीखें । [४] ( ब्रह्म कृण्वन्तः गोतमासः ) ऐश्वर्य या महान् राष्ट्र को वश करते हुए विद्वान् भूमिपति लोग ( अर्कैः ) उत्तम आदर मान सत्कारों से ( उत्सधिम् पिबध्यै ) स्वयं राष्ट्र का भोग करने के लिये हे वीरो ! ( वः ) तुममें से जो ( गृध्राः ) धनाकांक्षी हैं वे ( इमां देवी वार्कार्याम् धियं परि आ अगुः ) इस धन प्रद उत्तम रक्षाकारिणी बुद्धि का पालन करें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमो राहूगणपुत्र ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्द:—१ पंक्तिः । २ भुरिक्पंक्तिः । ५ निचृत्पंक्तिः । ३ निचृत् त्रिष्टुप् । ४ विराट्त्रिष्टुप् । ६ निचृद्बृहती ॥
विषय
विषय (भाषा)- फिर भी उक्त विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे मनुष्याः ! ये गृध्राः गोतमासः ब्रह्म कृण्वन्तः सन्तः अर्कैः अहानि ऊर्ध्वं पिबध्या उत्सधिम् इव आ नुनुद्रे ये वः युष्मभ्यं वार्कार्याम् इमां देवीं धियं धनं च परि आ अगुः ते सदा सेवनीयाः ॥४॥
पदार्थ
पदार्थः- हे (मनुष्याः)= मनुष्यों ! (ये)=जो, (गृध्राः) अभिकाङ्क्षन्तः=कामना करते हुए, (गोतमासः) अतिशयेन ज्ञानवन्तः=अत्यन्त ज्ञानवान्, (ब्रह्म) धनमन्नं वेदाध्यापनम्= धन, अन्न और वेद का अध्यापन, (कृण्वन्तः) कुर्वन्तः=करते, (सन्तः)= हुए हैं, (अर्कैः) वेदमन्त्रैः= वेद के मन्त्रों के द्वारा, (अहानि) दिनानि=दिनों के, (ऊर्ध्वम्) उत्कृष्टभागम्=उत्कृष्ट भाग को, (पिबध्यै) पातुम्=पीने के लिये, (उत्सधिम्) उत्साः कूपा धीयन्ते यस्मिन् भूमिभागे तम्=जिस भूमि के भाग में झरने और कुएँ बनाने के, (इव)=समान, (आ) समन्तात्=हर ओर से, (नुनुद्रे) प्रेरते=प्रेरणा करते हैं, (ये)=जो, (वः) युष्मभ्यम्=तुम्हारे लिये, (वार्कार्य्याम्) जलमिव निर्मलां सम्पत्तव्याम्=जल के समान निर्मल पदार्थ, (इमाम्)=इसको, (देवीम्) देदीप्यमानाम्=बार-बार प्रकाशित होनेवाले को, (धियम्) धारणवतीं प्रज्ञाम्=धारण करनेवाली प्रज्ञा को, (धनम्)= धन को, (च) अनुक्तसमुच्चये=भी, (परि) सर्वतः=हर ओर से, (आ) समन्तात्= हर ओर से, (अगुः) प्राप्तवन्तः=प्राप्त करते हुए, (ते)=वे, (सदा)= सदा, (सेवनीयाः)=अनुकरण किये जाने योग्य हैं॥४॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- हे जिज्ञासु मनुष्यों ! जैसे प्यास को बुझाने आदि प्रयोजनों के लिये, परिश्रम करके मनुष्य जाते हैं और जलाशय का निर्माण करके अपने कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही आप लोग अत्यन्त पुरुषार्थ के द्वारा विद्वानों की संगति में विद्या का अभ्यास उचित रूप से करके, समस्त विद्या के प्रकाश से प्रज्ञा को प्राप्त करके उसके अनुकूल कार्यों को सिद्ध कीजिये ॥४॥
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (मनुष्याः) मनुष्यों ! (ये) जो (गृध्राः) कामना करते हुए हैं और (गोतमासः) अत्यन्त ज्ञानवान्, (ब्रह्म) धन, अन्न और वेद के अध्यापन (कृण्वन्तः) कार्य में लगे (सन्तः) हुए हैं। (अर्कैः) वेद के मन्त्रों के द्वारा (अहानि) दिनों के (ऊर्ध्वम्) उत्कृष्ट भाग को[इस प्रकार बितातो हैं, जैसे] (पिबध्यै) जल पीने के लिये (उत्सधिम्) भूमि के जिस भाग में झरने और कुएँ बनाने के (इव) समान (आ) हर ओर से (नुनुद्रे) प्रेरणा करते हैं। (ये) जो (वः) तुम्हारे लिये (वार्कार्य्याम्) जल के समान निर्मल पदार्थ है, (इमाम्) इसको (देवीम्) बार-बार प्रकाशित होनेवाली और (धियम्) धारण करनेवाली प्रज्ञा और (धनम्) धन को (च) भी (परि) हर ओर से (अगुः) प्राप्त करते हुए, (ते) वे (सदा) सदा (सेवनीयाः) अनुकरण किये जाने योग्य हैं॥४॥
संस्कृत भाग
अहा॑नि । गृध्राः॑ । परि॑ । आ । वः॒ । आ । अ॒गुः॒ । इ॒माम् । धिय॑म् । वा॒र्का॒र्याम् । च॒ । दे॒वीम् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण्वन्तः॑ । गोत॑मासः । अ॒र्कैः । ऊ॒र्ध्वम् । नु॒नु॒द्रे॒ । उ॒त्स॒ऽधिम् । पिब॑ध्यै ॥ विषयः- पुनस्तमेव विषयमाह ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे जिज्ञासवो मनुष्या ! यथा पिपासानिवारणादिप्रयोजनायातिश्रमेण जलाशयं निर्माय स्वकार्याणि साध्नुवन्ति, तथैव भवन्तोऽतिपुरुषार्थेन विदुषां सङ्गेन विद्याभ्यासं यथावत् कृत्वा सर्वविद्याप्रकाशां प्रज्ञां प्राप्य तदनुकूलां क्रियां साध्नुवन्तु ॥४॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे जिज्ञासू माणसांनो! जशी माणसे तृषा निवारणासाठी परिश्रमपूर्वक जलाशय निर्माण करून आपले कार्य सिद्ध करतात तसे तुम्ही अत्यंत पुरुषार्थाने व विद्वानांच्या संगतीने यथायोग्य विद्याभ्यास करून संपूर्ण विद्येने बुद्धी प्राप्त करून त्यानुसार क्रिया सिद्ध करा. ॥ ४ ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Lovers of noble ambition, good days are come for you all round. Scholars of divine knowledge creating food for knowledge and spirit with the chant of holy mantras inspire this brilliant vision and intelligence of yours pure as celestial waters. Just as they uplift the water to provide drink and irrigation to dry area, so they impel our knowledge and intelligence to rise high.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject is continued.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men, you should always serve those most wise learned persons desiring the welfare of all, who creating or producing wealth, food and teaching the Vedas, inspire you with the Vedic Mantras like the land where a well has been dug for drinking. They have accomplished for you this divine intellect, pure like water and wealth.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(गृध्रा:) अभिकाङ्दोन्त:(सर्वेषां कल्याणम्) = Desiring the welfare of all. (वार्कार्याम्) जलमिव निर्मलां संपत्तव्याम् = Pure-intellect-like the water that is to be cultivated. (गोतमासः) अतिशयेन ज्ञानवन्तः = Most wise and learned. (ब्रह्म) धनम् प्रग्नं वेदाध्ययनम् = Wealth, food and teaching of the Vedas.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O seekers after truth, as men construct with great labour a tank etc. for quenching their thirst and accomplish many works thereby, in the same manner, you should accomplish all your noble acts by acquiring knowledge with great labour with the association of the learned and by obtaining pure intellect which illuminates all sciences.
Translator's Notes
गृधु is drived from गृधु-अभिकांक्षायाम् सुसूधागृधिम्य: ऋन इति औणादिक सूत्र द्वारा क्रन्प्रत्ययः ॥ It is simply ridiculous for Prof. Maxmuller to translate it as "hawks." (See Vedic Hymns vol.1 P.196 and 175) Regarding “वार्कार्याम्” (Varkairyam) Prof. Maxmuller admits in his notes:- The meaning of Varkaryam is of course unknown. Then he resorts to some conjectures, absurd like "It might have been glorious or the song of a poet called Varkara or as Ludwig suggests Vrikari."Such conjectural meanings are most un-authentic, but many Western Scholars resort to them very often as Prof. Maxmuller has stated in his notes on verse No. 3 of this hymn regarding Medha saying un-blushingly “nothing remains, I believe, but to have recourse to conjecture.”(Vedic Hymns Vol. I, P. 174). Rishi Dayananda Sarsvati has rightly taken strong exception to this absurd conjecture on the part of Prof. Maxmuller.गोतमास: is derived from गम्लृ-गतो among the three meanings of गति the first ज्ञान has been taken here.
Subject of the mantra
Still the aforesaid topic has been preached in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O! (manuṣyāḥ) =humans, (ye) =those, (gṛdhrāḥ) kāmanā karate hue haiṃ aura (gotamāsaḥ) =extremely knowledgeable, (brahma)=wealth, food and teaching of Vedas, (kṛṇvantaḥ) =engaged in work, (santaḥ) =are, (arkaiḥ)= through the mantras of the Vedas, (ahāni) =of days, (ūrdhvam) =to the best part, [isa prakāra bitāto haiṃ, jaise] =spend like this, as, (pibadhyai) =for drinkin water, (utsadhim)= the part of the land where springs and wells are made, (iva) =like, (ā) =from every side, (nunudre)= inspire, (ye) =those, (vaḥ) =for you, (vārkāryyām)=is a substance as pure as water, (imām) =to this, (devīm) =which manifests again and again and, (dhiyam) =wisdom that is possessed and, (dhanam) =to wealth, (ca) =also, (pari) =from every side, (aguḥ) =attaining, (te) =they, (sadā) =always, (sevanīyāḥ)=are worthy of being emulated.
English Translation (K.K.V.)
O humans! Who are aspiring and extremely knowledgeable, engaged in wealth, food and teaching of Vedas. They spend the best part of their days chanting the mantras of the Veda in such a way that they inspire people from all sides to build springs and wells in every part of the land to drink water. Which for you is a substance as pure as water, which manifests it again and again and who possesses wisdom and wealth attaining from all sides, they are always worthy of being emulated.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
There is silent vocal simile as a figurative in this mantra. O curious humans! Just as people work hard to quench their thirst and accomplish their tasks by building a reservoir, in the same way you people, by practicing your knowledge properly in the company of scholars with utmost effort, attain the disclosure of all knowledge. Acquiring wisdom from it, accomplish tasks favourable to it.
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