ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 95/ मन्त्र 9
ऋषिः - कुत्सः आङ्गिरसः
देवता - सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा
छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति
स्वरः - पञ्चमः
उ॒रु ते॒ ज्रय॒: पर्ये॑ति बु॒ध्नं वि॒रोच॑मानं महि॒षस्य॒ धाम॑। विश्वे॑भिरग्ने॒ स्वय॑शोभिरि॒द्धोऽद॑ब्धेभिः पा॒युभि॑: पाह्य॒स्मान् ॥
स्वर सहित पद पाठउ॒रु । ते॒ । ज्रयः॑ । परि॑ । ए॒ति॒ । बु॒ध्नम् । वि॒ऽरोच॑मानम् । म॒हि॒षस्य॑ । धाम॑ । विश्वे॑भिः । अ॒ग्ने॒ । स्वय॑शःऽभिः । इ॒द्धः । अद॑ब्धेभिः । पा॒युऽभिः॑ । पा॒हि॒ । अ॒स्मान् ॥
स्वर रहित मन्त्र
उरु ते ज्रय: पर्येति बुध्नं विरोचमानं महिषस्य धाम। विश्वेभिरग्ने स्वयशोभिरिद्धोऽदब्धेभिः पायुभि: पाह्यस्मान् ॥
स्वर रहित पद पाठउरु। ते। ज्रयः। परि। एति। बुध्नम्। विऽरोचमानम्। महिषस्य। धाम। विश्वेभिः। अग्ने। स्वयशःऽभिः। इद्धः। अदब्धेभिः। पायुऽभिः। पाहि। अस्मान् ॥ १.९५.९
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 95; मन्त्र » 9
अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 2; मन्त्र » 4
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अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 2; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तेन किं भवतीत्युपदिश्यते ।
अन्वयः
हे अग्ने विद्वंस्ते तव संबन्धेन सूर्य्यइवेद्धः सन् कालो विश्वेभिः स्वयशोभिरदब्धेभिः पायुभिर्युक्तं विरोचमानं बुध्नमुरु ज्रयोऽस्मान् महिषस्य धाम च पर्य्येति तथास्मान् पाहि सेवस्व च ॥ ९ ॥
पदार्थः
(उरु) बहु (ते) तव (ज्रयः) ज्रयन्त्यभिभवन्त्यायुर्येन तत् (परि) (एति) पर्य्यायेण प्राप्नोति (बुध्नम्) उक्तपूर्वम् (विरोचमानम्) विविधदीप्तियुक्तम् (महिषस्य) महतो लोकसमूहस्य। महिष इति महन्नाम०। निघं० ३। ३। (धाम) अधिकरणम् (विश्वेभिः) सर्वैः (अग्ने) विद्वन् (स्वयशोभिः) स्वगुणस्वभावकीर्त्तिभिः (इद्धः) प्रदीप्तः (अदब्धेभिः) केनापि हिंसितुमशक्यैः (पायुभिः) अनेकविधै रक्षणैः (पाहि) (अस्मान्) ॥ ९ ॥
भावार्थः
मनुष्यैर्नहि विभुना कालेन विना सूर्यादिकार्यजगतः पुनः पुनर्वर्त्तमानं जायते न च तस्मात्पृथगस्माकं किंचिदपि कर्म संभवतीति विज्ञातव्यम् ॥ ९ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उस समय के सेवन करने से क्या होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे (अग्ने) विद्वन् ! (ते) आपके सम्बन्ध से जैसे सूर्य्य वैसे (इद्धः) प्रकाशमान हुआ समय (विश्वेभिः) समस्त (स्वयशोभिः) अपने प्रशंसित गुण, कर्म और स्वभावों से (अदब्धेभिः) वा किसी से न मिट सकें ऐसे (पायुभिः) अनेक प्रकार के रक्षा आदि व्यवहारों से युक्त (विरोचमानम्) विविध प्रकार से प्रकाशमान (बुध्नम्) प्रथम कहे हुए अन्तरिक्ष को (उरु) वा बहुत (ज्रयः) जिससे आयुर्दा व्यतीत करते हैं उत वृत्त को वा (अस्मान्) हम लोगों को और (महिषस्य) बड़े लोक के (धाम) स्थानान्तर को (पर्येति) पर्य्याय से प्राप्त होता है वैसे हमारी (पाहि) रक्षा कर और उसकी सेवा कर ॥ ९ ॥
भावार्थ
मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि समय के विना सूर्य्य आदि कार्य्य जगत् का बार-बार वर्त्ताव नहीं होता और न उससे अलग हम लोगों का कुछ भी काम अच्छी प्रकार होता है ॥ ९ ॥
विषय
विरोचमान धाम [तेज]
पदार्थ
१. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु से मेल होने पर प्रभु के तेज से यह प्रभुभक्त भी तेजस्वी बनता है और कहता है कि (महिषस्य) = [मह पूजायाम्] पूजा के योग्य (ते) = आपका (उरु) = विस्तीर्ण (विरोचमानम्) = चमकता हुआ (ज्रयः) = काम आदि शत्रुओं को अभिभूत करनेवाला (धाम) = तेज (बुध्नम्) = शरीर के मूलभूत इस हृदयान्तरिक्ष के प्रदेश में (पर्येति) = समन्तात् प्राप्त होता है । प्रभु का तेज इस हृदयान्तरिक्ष को उज्ज्वल करनेवाला होता है । यहाँ यह तेज काम आदि शत्रुओं का विनाश करता है । काम - क्रोध को विनष्ट करके यह हमारे हृदयों को विशाल बनाता है ।
२. यह भक्त प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (विश्वेभिः स्वयशोभिः) = अपने सब यशस्वी कर्मों से (इद्धः) = दीप्त हुए - हुए आप (अदब्धेभिः पायुभिः) = अहिंसित रक्षणों के द्वारा (अस्मान् पाहि) = हमारा रक्षण कीजिए । प्रभु के जगत् के निर्माण , धारण व प्रलयरूप कर्म चिन्तन किये जाने पर प्रभु के यश को हमारे हृदयों में अंकित करनेवाले होते हैं । इस यशस्वी प्रभु के रक्षण भी अहिंसित हैं । प्रभु के रक्षणकर्म में कोई विघ्न नहीं कर सकता । प्रभु की रक्षा हमें प्राप्त होती है तो हम कामादि शत्रुओं के आक्रमण से बचे रहते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ - प्रभु का तेज हमें शत्रुओं के आक्रमण से बचाता है । प्रभु के रक्षण अहिंसित हैं ।
विषय
देवसमिति का निर्माण ।
भावार्थ
( महिषस्य ) बड़े भारी सूर्य का ( ज्रयः ) अन्धकार को नाश करने वाला, ( विरोचमानं ) विशेष रूप से देदीप्यमान, (धाम) तेज जिस प्रकार ( ब्रुध्नं परि एति ) आकाश या अन्तरिक्ष को व्याप लेता है उसी प्रकार हे (अग्ने) सूर्य और अग्नि के समान तेजस्विन् ! नायक राजन् ! (महिषस्य) बड़े दानशील, ( ते ) तेरा ( ज्रयः ) शत्रुओं को पराजय करने वाला, (विरोचमानं ) विविध प्रकार की प्रजा को प्रिय लगने वाला, अति देदीप्यमान ( उरु ) बड़ा भारी ( धाम ) तेज भी ( बुध्नम् ) सबको बांधने वाले मुख्य, आश्रय रूप भूलोक या राष्ट्र को या मुख्य पद को ( परिएति ) प्राप्त करता है तू ( विश्वेभिः स्वयशोभिः ) अपने समस्त यशों से ( इद्धः ) सूर्य और अग्नि के समान ही खूब तेजस्वी होकर ( अदब्धेभिः ) कभी नाश को प्राप्त न होने वाले, स्थायी ( पायुभिः ) रक्षा, प्रबन्धों से ( अस्मान् पाहि ) हमारी रक्षा कर ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्स आंङ्गिरस ऋषिः॥ औषसगुणविशिष्टः सत्यगुणविशिष्टः, शुद्धोऽग्निर्वा देवता ॥ छन्द:-१, ३ विराट् त्रिष्टुप् । २, ७, ८, ११ त्रिष्टुप् । ४, ५, ६, १० निचृत् त्रिष्टुप् । ६ भुरिक् पंक्तिः ॥ एकादशर्चं सूकम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
माणसांनी हे जाणले पाहिजे की, काळाशिवाय सूर्य इत्यादी कार्यजगताचा वारंवार प्रादुर्भाव होत नाही व त्याशिवाय आमचे कोणतेही काम चांगल्या प्रकारे पार पडू शकत नाही. ॥ ९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Agni, mighty as the sun, the vast expanse of your sphere travels and reaches across and over the bright regions of the skies. Bright and blazing with all your own powers and irresistible modes of protection, protect and promote us.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject is continued.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O learned person, Time glorious like the sun by thy association with all radiant, undiminished and protective powers prevades the resplendent firmament, great splendour that subdues wicked persons, the basis of great worlds. Preserve and protect us and render real service to us.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(महिषस्य) महतो लोकसमूहस्य महिष इति महन्नाम (निघ० ३.३ ) = Of great world. (ज्त्रय :) ज्त्रयन्ति अभिभवन्ति आयुर्येन तत् || = Splendour that subdues wicked persons.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Men should know that without the all-pervading Kala (Time) the existence of the sun and other objects of the created world is not possible and without it, we cannot do any work.
Translator's Notes
It is absurd for Oldenbarg to translate the words महिष used in the Mantra as buffalo which does not give any sense at all. Prof. Wilson's and Griffith's translation of the might” is better and more faithful, based upon the Vedic Lexicon महिषइतिमहल्शाम (निघ० ३.३) ।
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