ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 114/ मन्त्र 3
ऋषिः - सध्रिर्वैरुपो धर्मो वा तापसः
देवता - विश्वेदेवा:
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
चतु॑ष्कपर्दा युव॒तिः सु॒पेशा॑ घृ॒तप्र॑तीका व॒युना॑नि वस्ते । तस्यां॑ सुप॒र्णा वृष॑णा॒ नि षे॑दतु॒र्यत्र॑ दे॒वा द॑धि॒रे भा॑ग॒धेय॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठचतुः॑ऽकपर्दा । यु॒व॒तिः । सु॒ऽपेशाः॑ । घृ॒तऽप्र॑तीका । व॒युना॑नि । व॒स्ते॒ । तस्या॑म् । सु॒ऽप॒र्णा । वृष॑णा । नि । से॒द॒तुः॒ । यत्र॑ । दे॒वाः । द॒धि॒रे । भा॒ग॒ऽधेय॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । तस्यां सुपर्णा वृषणा नि षेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ॥
स्वर रहित पद पाठचतुःऽकपर्दा । युवतिः । सुऽपेशाः । घृतऽप्रतीका । वयुनानि । वस्ते । तस्याम् । सुऽपर्णा । वृषणा । नि । सेदतुः । यत्र । देवाः । दधिरे । भागऽधेयम् ॥ १०.११४.३
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 114; मन्त्र » 3
अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 16; मन्त्र » 3
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अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 16; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(चतुष्कपर्दा) ऋग्-यजुः-साम-अथर्व श्रुतिरूप चूड़ासदृश ज्ञान-चूड़ा जिसकी हैं, ऐसी अथवा कम्-सुख को कहनेवाले-दर्शानेवाले चार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जिसके हैं, ऐसी वेदवाणी (युवतिः) सदा युवति अर्थात् नित्य, आदि और अन्त से रहित अजर अथवा परमात्मा के साथ मिलानेवाली (सुपेशाः) सुरूपा ज्ञानात्मक होने से सर्वप्रिया (घृतप्रतीका) तेज प्रकट करनेवाले-जिसके अध्ययन से तेज प्रकट होता है, वैसी (वयुनानि वस्ते) प्रज्ञानों को प्रकृष्टरूप से आच्छादित करती है-सुरक्षित रखती है (तस्याम्) उसमें (वृष्णा) सुखवर्षक (सुपर्णा) शोभनपालन धर्मवाले जीवात्मा परमात्मा वर्णित हैं अथवा उसके आश्रय अध्यापक और अध्येता गुरु शिष्य (निषेदतुः) स्थिर हैं (यत्र) जिसमें (देवाः) विद्वान् (भागधेयम्) ज्ञान के भाग को (दधिरे) धारण करते हैं ॥३॥
भावार्थ
ऋग् यजुः साम और अथर्व ज्ञानरूप ऊँची शिखासमान स्थिति अथवा धर्मार्थ काम मोक्ष ये चार सुख को बतानेवाले जिसमें हैं, ऐसी वेदवाणी अजर अमर तेज देनेवाली, परमात्मा से मिलानेवाली ज्ञान के भण्डाररूप में जीवात्मा परमात्मा का वर्णन है तथा अध्यापक और अध्येता जिसको पढ़ते रहते हैं, विद्वान् लोग ज्ञान का भाग लेते हैं, ऐसी वेदवाणी पढ़नी-पढ़ानी चाहिये ॥३॥
विषय
चतुष्कपर्दा युवति
पदार्थ
[१] (चतुष्कपर्दा) = यह वेदवाणी चार वेणियोंवाली है, चार इसकी शाखाएँ हो गयी हैं । प्रकृति का ज्ञान देनेवाली 'ऋचाएँ' हैं, जीव के कर्त्तव्यों का ज्ञान देनेवाली 'यजुः ' हैं तथा उपासना की प्रतिपादिका 'साम' वाणियाँ हैं । इनके साथ रोगों व युद्धों का प्रतिपादन करनेवाली अथर्वरूप वाणियाँ हैं। यह वेदवाणी (युवति:) = हमारे साथ अच्छाइयों का मिश्रण करनेवाली तथा बुराइयों को हमारे से दूर करनेवाली है। और इस प्रकार (सुपेशा:) = हमें सुन्दर रूप प्राप्त करानेवाली है। (घृतप्रतीका) = तेजस्वी व दीप्त अंगोंवाली यह वेदवाणी (वयुनानि) = सब प्रज्ञानों व कर्मों को (वस्ते) = आच्छादित करती है, धारण करती है। इसमें सब ज्ञानों व कर्मों का उपदेश है । [२] (तस्याम्) = उस वेदवाणी में (सुपर्णा) = उत्तम पालनादि कर्मों को करनेवाले पति-पत्नी (वृषणा) = शक्तिशाली होते हुए (निषेदतुः) = निषण्ण होते हैं। अपने जीवन को उस वेदवाणी के अनुसार बनाते हैं । यह वेदवाणी वह है (यत्र) = जिसमें कि (देवाः) = सब देव—सूर्य, विद्युत्, अग्नि आदि त्रिलोकस्थ देवताएँ (भागधेयं दधिरे) = भाग को धारण करती हैं। अर्थात् इस वेदवाणी में सब देवों का प्रतिपादन है। प्रभु का मुख्य रूप से प्रतिपादन करती हुई यह वेदवाणी सब सूर्यादि देवों का ज्ञान देती है। इनके ज्ञान के द्वारा ही यह हमारे जीवन को सुन्दर बनानेवाली है। इसलिए गृहस्थ होकर भी पति-पत्नी ने इसके अध्ययन में अप्रमत्त होना है 'स्वाध्यायान् मा प्रमदः'।
भावार्थ
भावार्थ- सब कर्मों व ज्ञानों का उपदेश करती हुई यह वेदवाणी हमारे जीवन को सुन्दर बनाती है ।
विषय
चार शिखा वाली वेदवाणी।
भावार्थ
(चतुः-कपर्दा) चार शिखाओं वाली, (युवतिः) तरुण स्त्री तुल्य सदा शब्दार्थों को मिलाने वाली (सु-पेशाः) उत्तम वर्ण रूप वाली, (घृत-प्रतीका) ज्ञान-ज्योति से चमकते मुख वाली, वाणी वा प्रकृति (वयुनानि) नाना ज्ञानों और कर्मों को (वस्ते) आच्छादित करती है, (तस्याम्) उसमें (वृषणा) सुखों का वर्षक और बलयुक्त साधक आत्मा दोनों (सु-पर्णा) उत्तम ज्ञानवान् जीव और परमात्मा दोनों (निसेदतुः) विराजते हैं। (यत्र) जिस द्वारा, या जिस के आश्रय में रह कर (देवाः) देवगण, जीवगण अपने २ (भाग-धेयम् नि दधिरे) सेव्य अंश को धारण करते हैं। वाणी की ४ शिखा, नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात हैं, प्रकृति के ४ कपर्द या सुखप्रद रूप धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। (२) यज्ञ की वेदी भी चौकोन होने से ‘चतुष्कपर्दा’ है और वह सबको धारती है, उसमें यजमान, यजमानपत्नी, सुपर्णवत् विराजते हैं। देव ऋत्विज् वे इन्द्रिय आदि अपना २ भाग दक्षिणा वा हव्य प्राप्त करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः सर्वैरूपा घर्मो वा तापसः॥ विश्वेदेवा देवताः॥ छन्दः-१, ५, ७ त्रिष्टुप्। २, ३, ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। ८, ९ निचृत् त्रिष्टुप्। १० पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ४ जगती॥ दशर्चं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(चतुष्कपर्दा) चत्वारः ऋग्यजुःसामाथर्वाख्याः-चूडासदृशा ज्ञानचूडाः श्रुतयो यस्याः यद्वा कं सुखं वदन्ति शब्दयन्ति ये ते कपर्दास्ते च चत्वारो-धर्मार्थकाममोक्षा विषया यस्याः सा वेदवाक् (युवतिः) सदा युवतिः-नित्या अनादिनिधना-अजर्या यद्वा परमात्मना-सह मिश्रयन्ती (सुपेशाः) सुरूपा ज्ञानात्मकत्वात् सर्वप्रिया (घृतप्रतीका) तेजःप्रतीकं प्रत्यक्तं यया यस्या अध्ययनेन भवति तथाभूता (वयुनानि वस्ते) प्रज्ञानानि प्रकृष्टज्ञानानि “वयुनं प्रज्ञानाम” [निघ० ३।९] आच्छादयति (तस्यां-वृष्णा सुपर्णा निषेदतुः) तस्यां ज्ञानवर्षकौ शोभनपालकधर्मिणौ जीवात्मपरमात्मानौ वर्णितौ स्तः, यद्वा तदाश्रयेऽध्यापकाध्येतारौ गुरुशिष्यौ नितिष्ठतः (यत्र) यस्यां (देवाः) विद्वांसः (भागधेयं दधिरे) ज्ञानस्य भागं धारयन्ति ॥३॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Fourfold is that reality of existence, knowledge and the language of knowledge: Prakrti, jiva, immanent ordainer and the transcendent; matter, energy, intelligence and avyakta Prakrti; Rks, Samans, Yajus and Chhandas; Para, pashyanti, madhyama and vaikhari, in other words, nama, akhyata, upasarga and nipata. The vedi of existence in which it abides is ever young, beyond age and death, eternal. It is beautiful and exciting, golden gracious, which covers all the rules and laws of existence. In that abide two generous, creative beautiful birds on the tree of life: the one that watches is the Supreme Spirit of the cosmos, and the other that eats the fruit and tastes the sweet and the bitter of it is the individual human soul. In that existence, that knowledge and that Word of knowledge, noble souls find, live and experience their share of existence and the divine essence.
मराठी (1)
भावार्थ
ऋग, युज:, साम व अथर्व ज्ञानरूपी शिखाप्रमाणे असून धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हे चार सुख देणारी अशी वेदवाणी अजर, अमर, तेजस्वी बनविणारी, परमेश्वराशी भेट घालून देणारी, ज्ञानाच्या भांडाररूपात जीवात्मा व परमात्म्याचे वर्णन करणारी, अध्यापक व अध्येता जे शिकत, शिकवीत असतात, विद्वान लोक ज्ञानाचे ग्रहण करतात, अशा त्या वेदवाणीचे अध्ययन अध्यापन केले पाहिजे. ॥३॥
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