ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 146/ मन्त्र 4
ऋषिः - देवमुनिरैरम्मदः
देवता - अरण्यानी
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
गाम॒ङ्गैष आ ह्व॑यति॒ दार्व॒ङ्गैषो अपा॑वधीत् । वस॑न्नरण्या॒न्यां सा॒यमक्रु॑क्ष॒दिति॑ मन्यते ॥
स्वर सहित पद पाठगाम् । अ॒ङ्ग । ए॒षः । आ । ह्व॒य॒ति॒ । दारु॑ । अ॒ङ्ग । ए॒षः । अप॑ । अ॒व॒धी॒त् । वस॑न् । अ॒र॒ण्या॒न्याम् । सा॒यम् । अक्रु॑क्षत् । इति॑ । म॒न्य॒ते॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
गामङ्गैष आ ह्वयति दार्वङ्गैषो अपावधीत् । वसन्नरण्यान्यां सायमक्रुक्षदिति मन्यते ॥
स्वर रहित पद पाठगाम् । अङ्ग । एषः । आ । ह्वयति । दारु । अङ्ग । एषः । अप । अवधीत् । वसन् । अरण्यान्याम् । सायम् । अक्रुक्षत् । इति । मन्यते ॥ १०.१४६.४
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 146; मन्त्र » 4
अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 4; मन्त्र » 4
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अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 4; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(अङ्ग) पुनः-फिर (एषः-गाम्-आह्वयति) दिन में यह गोपाल-गौ चरानेवाला अपनी गौओं को चराकर ले जाने को पुकारता है (अङ्ग) और फिर (एषः) यह (दारु-अप अवधीत्) लकड़हारा लकड़ियों को काटता है (सायम्) रात्रि के समय (अरण्यान्यां वसन्) अरण्यानी में वसता हुआ-सोता हुआ मनुष्यगण (क्रुक्षत्-इति मन्यते) परमात्मा की स्तुति करता है, गाना गाता है और अपने को धन्य मानता है ॥४॥
भावार्थ
अरण्यानी में यह भी दृश्य देखा जाता है कि गौवाला गौओं को चराकर सायंकाल हाँकने के लिए गौओं को पुकारता है और लकड़ी काटनेवाला लकड़ी काटता है, रात्रि में कोई मनुष्य या मनुष्यगण गाता बजाता है और परमात्मा की स्तुति करता हुआ अपने को धन्य मानता है ॥४॥
विषय
गौ का आह्वान
पदार्थ
[१] (एषः) = यह वनस्थ पुरुष अंग शीघ्र ही ['अंग' क्षिप्रे च ] (गाम्) = इस ज्ञान की वाणीरूप गौ का (आह्वयति) = आह्वान करता है । यह सदा वेदवाणी का अध्ययन करता है और (एवः) = यह अंग- शीघ्र ही (दारु) = शक्तियों को विदीर्ण करनेवाली वासनाओं को अपावधीत् सुदूर विनष्ट करता है । वानप्रस्थ का मूल कर्त्तव्य यही है कि ज्ञान की वाणियों का अध्ययन करे, वासनाओं को विनष्ट करे। [२] (अरण्यान्यां वसन्) = वन में निवास करता हुआ अथवा उत्तम गति व ज्ञान की स्थिति में निवास करता हुआ यह (इति मन्यते) = यह मानता है कि पुरुष साधना के लिये (सायम्) = सायंकाल (अक्रुक्षत्) = अवश्य प्रभु का आह्वान करे। सायंकाल अन्धकार का प्रारम्भ होता है, उस समय आसुरभाव प्रबल होने लगते हैं। उनके विनाश के लिये सन्नद्ध होकर प्रभु का उपासन करने लगना यह आवश्यक है। इस प्रभु ध्यान में ही शून्यावस्था को लाने का प्रतिदिन अभ्यास निहित है। इसी स्थिति में निहित हो जाने से अशुभ स्वप्न न होकर स्वप्नावस्था में प्रभु - दर्शन का सम्भव होता है ।
भावार्थ
भावार्थ- वानप्रस्थ के तीन कर्त्तव्य हैं- [क] स्वाध्याय, [ख] वासना परिहार, [ग] प्रभु का आराधन ।
विषय
अरण्यानी ऋणों से मुक्त दशा।
भावार्थ
(अङ्ग) हे विद्वन् ! (अरण्यान्याम्) ऋणों से मुक्त दशा में (वसन्) रहता हुआ (एषः) यह अमुक पुरुष (गाम् आह्वयति) वाणी का अभ्यास करता वा सूर्य को लक्ष्य कर प्रभु को पुकारता है, और (एषः) अमुक व्यक्ति (दारु अप अवधीत्) काष्ठ के समान ज्ञान शस्त्र से अज्ञान को चीर कर नाश कर देता है। और वह अमुक व्यक्ति उस दशा में (अक्रुक्षत् इति मन्यते) मनुष्य प्रभु को ही पुकारा करे ऐसा अपना कर्त्तव्य मानता है।
टिप्पणी
क्रुश आह्वाने, रोदने च भ्वा०॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्देवमुनिरैरम्मदः॥ देवता—अरण्यानी॥ छन्दः– १ विराडनुष्टुप्। २ भुरिगनुष्टुप्। ३, ५ निचृदनुष्टुप्। ४, ६ अनुष्टुप् ॥ षडृचं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(अङ्ग) पुनः (एषः-गाम्-आह्वयति) दिनेऽयं गोश्चारको गोपालो वा गां गाः-स्वकीया गाः-आह्वयति (अङ्ग) पुनश्च (एषः) अयं (दारु-अप अवधीत्) काष्ठाहारो दारु-काष्ठं छिनत्ति (सायम्) रात्रौ (अरण्यान्यां वसन्) अरण्यान्यां शयानः (कुक्षत्-इति मन्यते) क्रोशति-आह्वयति-परमात्मानं स्तौति गायति चेत्थमात्मानं धन्यं मन्यते ॥४॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Dear spirit and forest presence, someone calls upon his cow to come home, this one cuts the tree, and in the evening someone staying in the forest shrieks, someone howls, someone bursts in song also.
मराठी (1)
भावार्थ
अरण्यानीत हेही दृश्य पाहण्यात येते, की गुराखी गायींना चारा खाऊ घालून सायंकाळी हाकताना त्यांना साद घालतो. सुतार लाकूड कापतो. रात्री एखादा माणूस किंवा माणसे गायन-वादन करतात व परमात्म्याची स्तुती करत आपल्याला धन्य मानतात. ॥४॥
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