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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 151 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 151/ मन्त्र 5
    ऋषिः - श्रद्धा कामायनी देवता - श्रद्धा छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    श्र॒द्धां प्रा॒तर्ह॑वामहे श्र॒द्धां म॒ध्यंदि॑नं॒ परि॑ । श्र॒द्धां सूर्य॑स्य नि॒म्रुचि॒ श्रद्धे॒ श्रद्धा॑पये॒ह न॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    श्र॒द्धाम् । प्रा॒तः । ह॒वा॒म॒हे॒ । श्र॒द्धाम् । म॒ध्य॑न्दि॑नम् । परि॑ । श्र॒द्धाम् । सूर्य॑स्य । नि॒ऽम्रुचि॑ । श्रद्धे॑ । श्रत् । धा॒प॒य॒ । इ॒ह । नः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि । श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    श्रद्धाम् । प्रातः । हवामहे । श्रद्धाम् । मध्यन्दिनम् । परि । श्रद्धाम् । सूर्यस्य । निऽम्रुचि । श्रद्धे । श्रत् । धापय । इह । नः ॥ १०.१५१.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 151; मन्त्र » 5
    अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 9; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    पदार्थ

    (प्रातः) प्रातःकाल (श्रद्धाम्) यथावद् धारणा-आस्तिकता को परमात्मप्रीति को (हवामहे) आमन्त्रित करते हैं (सूर्यस्य निम्रुचि) सूर्य के अस्त हो जाने पर (श्रद्धाम्) आस्तिकता को-परमात्मप्रीति को-आमन्त्रित करते हैं (मध्यन्दिनं परि) दिन के मध्य में-प्रातः से सायं सारे दिन भर में (श्रद्धाम्) आस्तिकता-परमात्मप्रीति को आमन्त्रित करते हैं-सेवन करते हैं (श्रद्धे) हे आस्तिकभावना या परमात्मप्रीति ! (नः) हमें (इह) इस जीवन में (श्रद्धापय) श्रद्धामय कर ॥५॥

    भावार्थ

    मानव को परमात्मा के प्रति आस्तिकभावना या परमात्मप्रीति प्रातःकाल और सायंकाल-उपासना की दृष्टि या अध्यात्म की दृष्टि से रखने के साथ दिन भर के लोकव्यवहार में भी आस्तिकता और परमात्मप्रीति होनी चाहिए, उसके विपरीत लोकव्यवहार नहीं हो, अपितु दिनचर्या के अतिरिक्त सारा जीवन आस्तिकतापूर्ण बनाना चाहिये ॥५॥

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    Bhajan

    वैदिक मन्त्र
    श्रद्धा प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यन्दिनं परि।
    श्रद्धा सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न:।।
                                   ऋ•१०.१५१.५
              वैदिक भजन ११२२ वां
                    राग छायानट
       गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर
                      ताल अद्धा
    हे श्रद्धा आओ प्रातः काल 
    तुम्हें बुलाएं सायंकाल 
    है मध्यान्ह का सूर्य विकसित 
    है प्रदीप्त श्रद्धा के उपमित 
    ईश्वर का ही देवदूत बनें 
    जग की करें सम्भाल ।।
    हे श्रद्धा........ 
    हृदय के अंतः स्थल में आओ 
    अपने ही सदृश्य बनाओ 
    निशदिन पावन कर्म कराओ 
    बनो हे श्रद्धा कृपाल ।।
    हे श्रद्धा......
    ईश भजन या आत्म चिन्तन हो 
    या जीवन का अर्थपार्जन हो 
    श्रद्धा से जीवन को जगाओ 
    धरो श्रद्धा की मशाल 
    हे श्रद्धा....... 
    बिन श्रद्धा ना कर्म है सार्थक 
    सांसारिक हो या परमार्थिक 
    श्रद्धावान की रहे सफलता 
    श्रद्धा की हो चाल- ढाल
    हे श्रद्धा..........
                      शब्दार्थ:-
    उपमित=तुल्य, सदृश्य
    अर्थपार्जन=अर्थ संचय, धन कमाना

    वैदिक मन्त्रों के भजनों की द्वितीय श्रृंखला का ११५ वां वैदिक भजन ।
    और प्रारम्भ से क्रमबद्ध अबतक का ११२२ वां वैदिक भजन 
    वैदिक संगीत प्रेमी श्रोताओं को  हार्दिक शुभकामनाएं !
    🕉️🙏🌷🌺🥀🌹💐

    Vyakhya

    श्रद्धा का रहस्य- ५
    जैसे श्रद्धा के कारण मनुष्य प्राण न्योछावर करने पर उतारू हो जाता है, जैसे श्रद्धा के कारण मनुष्य शुभ और पवित्र कर्मों में प्रवृत्त होता है, हृदय के अंतःस्थल में रहने वाली वह श्रद्धा सारा दिन बनाए रखनी चाहिए। चाहे भगवान का भजन और आत्मचिन्तन हो, और चाहे अर्थसंचय का प्रश्न हो, श्रद्धा के बिना यह निकम्मे और थोथे होते हैं, और इसी कारण विफल होते हैं। 
    इस वास्ते मनुष्य को सांसारिक और परमार्थिक व्यवहारों में सफलता प्राप्त करने के लिए श्रद्धा को अपनाना चाहिए। इसी में मनुष्यों का भला है।

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    विषय

    श्रद्धामय जीवन

    पदार्थ

    [१] (श्रद्धाम्) = श्रद्धा को (प्रातः) = प्रातः काल हम हवामहे पुकारते हैं। हमारा जीवन का प्रातः काल प्रथम २४ वर्ष श्रद्धावाला हो। इस समय हम माता, पिता व आचार्यों के प्रति श्रद्धावाले होकर उनकी आज्ञानुसार वर्ते । [२] (श्रद्धाम्) = श्रद्धा को (मध्यन्दिनं परि) = जीवन के मध्याह्न में भी पुकारते हैं। जीवन के अगले ४४ वर्ष भी श्रद्धामय हो । श्रद्धावाले होने पर ही हम इस गृहस्थकाल में पाँचों महायज्ञों को करनेवाले होते हैं । [२] (श्रद्धाम्) = श्रद्धा को (सूर्यस्य निम्रुचि) = सूर्य के अस्तकाल में भी हम पुकारते हैं । जीवन के अन्तिम ४८ वर्षों में भी हम श्रद्धावान् बने रहें । (श्रद्धम्) = हे श्रद्धे ! (नः) = हमें इह इस जीवन में तू (श्रद्धापय) = श्रद्धायुक्त कर । श्रद्धावाले होकर ही हम इस समय 'क्रियावान् ब्रह्मनिष्ठ' पुरुष के जीवन को बिता पायेंगे।

    भावार्थ

    भावार्थ- हमारा सारा जीवन श्रद्धामय हो । सारा सूक्त श्रद्धा के महत्त्व का प्रतिपादन करता है। यह श्रद्धावाला पुरुष ही सब कामनाओं को पूर्ण करके अपने पर पूर्ण शासन करनेवाला 'शासः' बनता है। इस पूर्ण शासन से ही भरद्वाज: 'अपने में शक्ति को भरनेवाला होता है। इसी का अगला सूक्त है- द्वादशोऽनुवाकः ॥

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    विषय

    ‘श्रद्धा’ नामक सत्यधारक प्रभु की शक्ति की उपासना।

    भावार्थ

    हम (प्रातः श्रद्धां) प्रातःकाल में उस सत्य से जगत् को धारण करने वाले प्रभु शक्ति की (हवामहे) प्रार्थना करते हैं। (मध्यं-दिनं परि श्रद्धां हवामहे) दिन के मध्य काल में उस सत्य-धारक प्रभु को ध्यान करते हैं। (सूर्यस्य नि-म्रुचि) सूर्य के अस्तकाल में भी हम उसी श्रद्धामय प्रभु की उपासना करते हैं। हे (श्रद्धे) श्रद्धे सत्य धारणावति देवि ! तू (नः इह श्रद्धापय) हमें इस जगत् में सत्य ही को धारण करा। इति नवमो वर्गः॥ इत्येकादशोऽनुवाकः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः श्रद्धा कामायनी॥ देवता—श्रद्धा॥ छन्दः- १, ४, ५ अनुष्टुप्। २ विराडनुष्टुप्। ३ निचृदनुष्टुप्। पञ्चर्चं सूक्तम्॥

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    मन्त्रार्थ

    (प्रातः श्रद्धां हवामहे) प्रातकाल श्रद्धा-यथावद्धारणाजीवन की यथावत् आधारभूत आस्तिकता परमात्मप्रीति को आमन्त्रित करते हैं (मध्यन्दिनं परि श्रद्धाम्) मध्य दिन में -दिन के मध्यकाल को लक्ष्य करके भी श्रद्धा-यथावद्धारणा आस्तिकता प्रभुप्रीति को आमन्त्रित करते हैं (सूर्यस्य निम्र चि श्रद्धाम्) सूर्य के अस्तसमय-सायंकाल में भी श्रद्धा-यथावद्धारणा-आस्तिकता-परमात्मप्रीति को ग्रामन्त्रित करते हैं (श्रद्धे नः-इह श्रद्धापय) हे श्रद्धे-यथावद्वारणा-आस्तिकभावना! तू हमें इस जीवन में श्रद्धावान-समस्त यथावद्धारा वाला कर। ॥५॥

    टिप्पणी

    "अवश्यमिमे हन्तव्या इति आदरातिशय कृतवन्तः" (सायणः) 'म्रुचु गत्यर्थ:' (म्वादि०) ततो निपूर्वात् क्विप् निम्रुच्-सप्तम्यां निम्रचि निगमने निश्चरणे निपतने ।

    विशेष

    ऋषिः- श्रद्धा कामायनी (काम अर्थात् अभिलाष-इच्छाभाव की पुत्री-इच्छाभाव के पूरे होने पर पालित सुरक्षित आत्मभावना वाली व्यक्ति) देवता—श्रद्धा (इच्छाभाव की माता-जननी निश्चयात्मिका प्रवृत्ति या सत्यधारणा "श्रद्धां कामस्य मातरं हविषा वर्धयामसि" (तै० २।८।८।८) यथावद्धारणा-आत्मभावना होने पर काम-इच्छा भावना एक दिव्य सक्ता या दिव्य शक्ति)

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (प्रातः श्रद्धां हवामहे) प्रातःकाले यथावद्धारणां खल्वास्तिकतां परमात्मप्रीतिम्-आमन्त्रयामहे (मध्यन्दिनं परि श्रद्धाम्) दिनस्य मध्येऽपि परमात्मप्रीतिमामन्त्रयामहे (सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धाम्) सूर्यस्यास्तगमने “म्रुचु गत्यर्थः” [भ्वादि०] ‘नि पूर्वात् क्विप् निम्रुच् सप्तम्यां निम्रुचि’ परमात्मप्रीतिमामन्त्रयामहे (श्रद्धे नः-इह श्रद्धापय) हे श्रद्धे-आस्तिकभावने परमात्मप्रीते ! अस्मानस्मिन् जीवने श्रद्धामयान् कुरु ॥५॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    We invoke, love and worship divine faith in truth, at dawn. We love and worship faith in truth at the mid-day session of yajna. We love and worship Shraddha at the time of sun-set. O Shraddha, faith in truth and divinity, pray establish us all in faith in truth, charity and service of both divinity and humanity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    मानवाने परमेश्वराबद्दल आस्तिक भावना किंवा परमात्म प्रीती बाळगावी. प्रात:काल व सायंकाल उपासना दृष्टी किंवा अध्यात्मदृष्टी ठेवावी. त्याबरोबरच दिवसभर लोकव्यवहारातही आस्तिकता व परमात्मप्रीती ठेवली पाहिजे. या विपरीत लोकव्यवहार होता कामा नये. दिनचर्याच नव्हे, तर संपूर्ण जीवनच आस्तिकतायुक्त बनवावे. ॥५॥

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