ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 24 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 24/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः देवता - इन्द्र: छन्दः - आस्तारपङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः
    पदार्थ -

    (इन्द्र) हे राजन् ! (इमं मधुमन्तं चमूसुतं सोमं पिब) इस मधुर रसवाले सुस्वादु सभा सेना के मध्य सम्पन्न राज्य-ऐश्वर्य को भोग-सेवन कर (अस्मे सहस्रिणं रयिं निधारय) हम प्रजाजनों के लिये सहस्रगुणित बहुत हितकर धन पालन पोषण को नियतकर-स्थिरकर (पुरूवसो) हे बहुत धनसम्पन्न राजन् ! (मदे) हर्षानेवाले धन के निमित्त (वः-वि) तेरी विशेष प्रशंसा करते हैं (विवक्षसे) तू महान् है ॥१॥

    भावार्थ -

    सभा और सेना में सम्पन्न राज्य ऐश्वर्य को राजा उत्तमरूप से भोगे। प्रजाओं के लिये सहस्रगुणित अर्थात् जितना राज्य शुल्क ग्रहण करे, उससे बहुत गुणें धन से प्रजा का पालन पोषण करे। प्रजा भी अपने हर्ष आनन्द के प्राप्त करने के निमित्त राजा की प्रशंसा किया करे, क्योंकि राजा एक महान् गुणवाला होता है ॥१॥

    पदार्थ -

    (इन्द्र) हे राजन् ! (इमं मधुमत्तमं चमूसुतं सोमं पिब) एतं मधुररसवन्तं सुस्वादुं द्यावापृथिव्योरिव “चम्वौ द्यावापृथिवीनाम” [निघ० ३।३०] सभासेनयोर्मध्ये सम्पन्नं राज्यैश्वर्यं भुञ्जीथाः सेवस्व (अस्मे सहस्रिणं रयिं नि धारय) अस्मभ्यं प्रजाजनेभ्यः सहस्रगुणितं बहुहितकरं धनं पोषणं पालनं नियोजय (पुरूवसो) हे बहुधनवन् राजन् ! (मदे) हर्षकरधननिमित्तम् (वः-वि) त्वां विशिष्टं प्रशंसामः (विवक्षसे) त्वं महान्-असि “विवक्षसे महन्नाम” [निघ० ३।३] ॥१॥

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