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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 61/ मन्त्र 19
    ऋषिः - नाभानेदिष्ठो मानवः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    इ॒यं मे॒ नाभि॑रि॒ह मे॑ स॒धस्थ॑मि॒मे मे॑ दे॒वा अ॒यम॑स्मि॒ सर्व॑: । द्वि॒जा अह॑ प्रथम॒जा ऋ॒तस्ये॒दं धे॒नुर॑दुह॒ज्जाय॑माना ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒यम् । मे॒ । नाभिः॑ । इ॒ह । मे॒ । स॒धऽस्थ॑म् । इ॒मे । मे॒ । दे॒वाः । अ॒यम् । अ॒स्मि॒ । सर्वः॑ । द्वि॒ऽजाः । अह॑ । प्र॒थ॒म॒ऽजाः । ऋ॒तस्य॑ । इ॒दम् । धे॒नुः । अ॒दु॒ह॒त् । जाय॑माना ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इयं मे नाभिरिह मे सधस्थमिमे मे देवा अयमस्मि सर्व: । द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्येदं धेनुरदुहज्जायमाना ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इयम् । मे । नाभिः । इह । मे । सधऽस्थम् । इमे । मे । देवाः । अयम् । अस्मि । सर्वः । द्विऽजाः । अह । प्रथमऽजाः । ऋतस्य । इदम् । धेनुः । अदुहत् । जायमाना ॥ १०.६१.१९

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 61; मन्त्र » 19
    अष्टक » 8; अध्याय » 1; वर्ग » 29; मन्त्र » 4
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (मे-इयं नाभिः) मेरी ये परमात्मदेवता या वेदवाणी या प्रज्ञा बाँधनेवाली है (इह मे सधस्थम्) इसमें अन्य जीवन्मुक्तों के साथ मेरा सहस्थान है (इमे मे देवाः) ये मेरे साथ रहनेवाले देवतारूप इन्द्रियाँ हैं (अयं सर्वः-अस्मि) यह मैं आत्मा सब कार्यों में समर्थ हूँ (द्विजाः-अह-ऋतस्य प्रथमजाः) दो अर्थात् माता और पिता से उत्पन्न हुआ अथवा वेदज्ञ आचार्य से और माता-पिता से प्रथम प्रसिद्ध हुआ नित्य आत्मा हूँ (ऋतस्य-इयं जायमाना धेनुः-अदुहत्) अव्यक्त प्रकृति की ये होनेवाली सृष्टि धेनु की भाँति मेरे लिए भोग को दोहती है ॥१९॥

    भावार्थ

    परमात्मा परमा देवता या वेदवाणी अथवा प्रज्ञा मेरा मोक्ष से सम्बन्ध करानेवाली है। अन्य जीवन्मुक्तों के साथ मेरा यह सहस्थान है-समानाश्रय है। मैं आत्मा सब कार्य करने में समर्थ हूँ। सृष्टि में मैं माता-पिता द्वारा प्रसिद्ध होता हूँ। प्रकृति से प्रकटित हुई यह सृष्टि मुझ आत्मा के लिए भोग का दोहन करती है ॥१९॥

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    विषय

    मातृवत् प्रकृति का वर्णन। उससे पुत्रवत् जीव-सर्ग। उसकी सवनीय गौ के साथ उपमा।

    भावार्थ

    (इयम्) यह मातृवत् प्रकृति (मे नाभिः) मेरा आश्रय वा इस लोक में मुझे बांधने वाली है। (इह मे सधस्थं) इस में ही मेरा अन्य जीवों के साथ रहने का स्थान है। (इमे) ये (देवाः) देव, कामनावान् जीव भी (मे) मेरे सहयोगी हैं। (अयम् सर्वः अस्मि) यह मैं ही सब हूँ। मैं (द्विजाः) प्रभु परमेश्वर तथा प्रकृति दोनों से उसी प्रकार उत्पन्न हुआ हूँ जैसे पुत्र माता और पिता दोनों से उत्पन्न होता है। (जायमाना) व्यक्तरूप में आती हुई प्रकृति (धेनुः) सूती गौ के समान (प्रथमजाः) सर्व प्रथम, प्रभु परमेश्वर द्वारा व्यक्त होकर (ऋतस्य) परम सत् कारण के ही विकाररूप (इदं) इस जगत् को (अदुहत्) प्रदान और पूर्ण करती है।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    नाभानेदिष्ठो मानवः। विश्वेदेवा देवताः॥ छन्द:–१, ८–१०, १५, १६, १८,१९, २१ निचृत् त्रिष्टुप्। २, ७, ११, १२, २० विराट् त्रिष्टुप्। ३, २६ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। ४, १४, १७, २२, २३, २५ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ५, ६, १३ त्रिष्टुप्। २४, २७ आर्ची भुरिक् त्रिष्टुप्। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    यज्ञवेदि

    पदार्थ

    [१] (इयम्) = यह यज्ञवेदी ही (मे) = मेरी (नाभिः) = बन्धिका है, यह सारे परिवार के सभ्यों को अपने में बाँधनेवाली है । (इह) = इस यज्ञवेदि में (मे) = मेरा (सधस्थम्) = सारे परिवार के साथ मिलकर बैठना होता है। इस यज्ञवेदि पर बैठे हुए (इमे) = ये मेरे (देवा:) = देव हैं। छोटे-छोटे खेलनेवाले बालक [क्रीडन्ति], शिक्षणालय में स्पर्धा से एक दूसरे को जीतने की कामनावाले विद्यार्थी [विजिगीषा] काम में लगनेवाला युवक [व्यवहार] ज्ञानदीप्त प्रौढ व्यक्ति [द्युति] केवल स्तुति में रत वृद्ध [स्तुति] प्रसन्नता का संचार करनेवाली युवतियाँ [मोद] माद्यन्ती अवस्थावाली द्वितीयाश्रम में प्रवेश के लिये तैयार युवति [मद], गोद में सोया हुआ बच्चा [स्वप्न] नाना प्रकार की कामनाओंवाली किशोरी [कान्ति] और केवल चहल-पहल रखनेवाले सन्तान [गति] ये सब देव हैं। यज्ञवेदि पर इन सबने आसीन होना है । [२] इस प्रकार यज्ञ करता हुआ (अयम्) = यह मैं (सर्वः अस्मि) = पूर्ण होने का प्रयत्न करता हूँ। [सर्व = whole = स्वस्थ ] यह यज्ञ मेरे शरीर को ही नहीं, मन व बुद्धि को भी स्वस्थ बनाता है। (द्विजाः) = [द्वौ जायेते यस्य] मैं शरीर व मस्तिष्क दोनों के विकासवाला बनता हूँ । (अह) = निश्चय से (ऋतस्य) = उस सत्यस्वरूप प्रभु की प्रथमजा सृष्टि के प्रारम्भ में दी गई (धेनुः) = वेदरूप गौ जायमाना=मेरे हृदय में प्रादुर्भूत होती हुई (इदं अदुहत्) = इस ज्ञान का दोहन व पूरण करती है। इस ज्ञान ने ही तो वस्तुतः मुझे 'सर्व' बनाना है।

    भावार्थ

    भावार्थ - हम परिवार में सम्मिलित यज्ञ की प्रथा को अनिवार्य रूप से स्थापित करें। प्रभु की वेदवाणी का अध्ययन करें। यही सर्व पूर्ण स्वस्थ बनने का मार्ग है ।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (मे इयं नाभिः) ममैषा परमात्मदेवता वेदवाक् प्रज्ञा वा नहनी बन्धिकाऽस्ति (इह मे सधस्थम्) अस्यां ममान्यैर्जीवन्मुक्तैः सहस्थानं भवति (इमे मे देवाः) इमे मम सहस्थाने तिष्ठन्तो देवा इन्द्रियाणि (अयं सर्वः-अस्मि) अयं खल्वात्मा सर्वः सकलकार्यसमर्थोऽस्मि (द्विजाः-अह-प्रथमजाः) द्वाभ्यां मातापितृभ्यां यद्वा वेदज्ञात् मातापितृतश्च जातः प्रथमप्रसिद्धो नित्यः-आत्मा (ऋतस्य-इयं जायमाना धेनुः-अदुहत्) ऋतस्याव्यक्तस्य प्रकृतेरियं प्रजायमाना-व्यक्तसृष्टिर्धेनुवन्मह्यं भोगं दोग्धि ॥१९॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    This is my navel link with life, here is my haven and ultimate home, all these divine brilliancies, winds and pranic energies are mine, here I am all, complete. Whether first bom of divinity or twice born of nature and education, all this universe is born of Prakrti in motion and action under the law of divinity. The divine cow, Vak, nature coming into existential manifestation gives birth to it and to all we need.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमदेव परमात्मा किंवा वेदवाणी अथवा प्रज्ञा माझा (आत्म्याचा) मोक्षाशी संबंध करविणारी आहे. इतर जीवनमुक्तांबरोबर माझे हे सहस्थान - समानाश्रय आहे. मी आत्मा सर्व कार्य करण्यात समर्थ आहे. सृष्टीमध्ये मी माता-पित्याद्वारे प्रसिद्ध होतो. प्रकृतीपासून प्रकटित झालेली ही सृष्टी माझ्या आत्म्यासाठी भोगाचे दोहन करते. ॥१९॥

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