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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 63 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 63/ मन्त्र 7
    ऋषिः - गयः प्लातः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    येभ्यो॒ होत्रां॑ प्रथ॒मामा॑ये॒जे मनु॒: समि॑द्धाग्नि॒र्मन॑सा स॒प्त होतृ॑भिः । त आ॑दित्या॒ अभ॑यं॒ शर्म॑ यच्छत सु॒गा न॑: कर्त सु॒पथा॑ स्व॒स्तये॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    येभ्यः॑ । होत्रा॑म् । प्र॒थ॒माम् । आ॒ऽये॒जे । मनुः॑ । समि॑द्धऽअग्निः । मन॑सा । स॒प्त । होतृ॑ऽभिः । ते । आ॒दि॒त्याः॒ । अभ॑यम् । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒ । सु॒ऽगा । नः॒ । क॒र्त॒ । सु॒ऽपथा॑ । स्व॒स्तये॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनु: समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः । त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा न: कर्त सुपथा स्वस्तये ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    येभ्यः । होत्राम् । प्रथमाम् । आऽयेजे । मनुः । समिद्धऽअग्निः । मनसा । सप्त । होतृऽभिः । ते । आदित्याः । अभयम् । शर्म । यच्छत । सुऽगा । नः । कर्त । सुऽपथा । स्वस्तये ॥ १०.६३.७

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 63; मन्त्र » 7
    अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 4; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (समिद्धाग्निः-मनुः) अग्रणायक परमात्मा जिसने साक्षात् कर लिया, ऐसा मननशील उपासक (येभ्यः) जिन जीवन्मुक्त विद्वानों से (प्रथमां होत्रां मनसा-आयजे) प्रमुख वेदरूप वाणी को या उसमें प्रतिपादित स्तुति को अवधान से आत्मसात् करता है-अपनाता है (सप्तहोतृभिः) सात संख्यावाले ग्रहणकर्ता साधनों-मन बुद्धि चित्त अहङ्कार श्रोत्र नेत्र वाणियों से  (ते-आदित्याः) वे अखण्डज्ञान ब्रह्मचर्यवाले (नः-अभयं शर्म यच्छत) हमारे लिए भयरहित सुख प्रदान करें (सुपथा सुगा कर्त) शोभन पथवाले अच्छे गन्तव्य-ज्ञानसम्पादन करो (स्वस्तये) कल्याण के लिए ॥७॥

    भावार्थ

    ऐसे जीवन्मुक्त, जिन्होंने मन बुद्धि चित्त अहङ्कार श्रोत्र नेत्र और वाणी को परमात्मा में समर्पित किया हुआ है, उनसे वेद का ज्ञान तथा वेदोक्त स्तुति का शिक्षण लेकर अपने अन्दर परमात्मा का साक्षात् करे, यह कल्याण का साधन है ॥७॥

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    विषय

    विद्यावानों से कल्याण की याचना।

    भावार्थ

    (समिद्धाग्निः मनुः) अग्नि को प्रज्वलित कर लेने वाला, अग्नि-परिचारक ब्रह्मचारी वा आहिताग्नि गृहपति भी (मनसा) मन से और (सप्त होतृभिः) सातों ज्ञान ग्रहण करने वाले इन्द्रियों वा शिरोगत प्राणगणों के छिद्रों द्वारा (येभ्यः) जिनके पास से (प्रथमां) सर्वप्रथम अनादि सिद्ध, श्रेष्ठ, प्रसिद्ध (होत्राम्) वेदवाणी का (आयेजे) आदर पूर्वक ग्रहण करता है हे विद्वान् पुरुषो ! (ते आदित्याः) वे सूर्यवत् तेजस्वी आप लोग (नः शर्म यच्छत) हमें सुख-शरण प्रदान करो और (स्वस्तये) कल्याण सुख के लिये (नः पथा सुगा कर्त्त) हमारे लिये शुभ मार्गों का उपदेश करो वा हमारे मार्गों को सुगम करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गयः प्लात ऋषिः। देवता—१—१४,१७ विश्वेदेवाः। १५, १६ पथ्यास्वस्तिः॥ छन्द:–१, ६, ८, ११—१३ विराड् जगती। १५ जगती त्रिष्टुप् वा। १६ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। १७ पादनिचृत् त्रिष्टुप्॥ सप्तदशर्चं सूक्तम्॥

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    विषय

    होत्रा - मन तथा सप्त होता [वे आदित्य]

    पदार्थ

    [१] (समिद्धाग्निः) = दीप्त ज्ञानाग्निवाले (मनुः) = ज्ञानपुञ्ज प्रभु (येभ्यः) = जिनके लिये (प्रथमां होत्रान्) = सृष्टि के प्रारम्भ में उच्चारण की जानेवाली ज्ञान की वाणी [नि० १ । ११] को (आयेजे) = संगत करते हैं । (मनसः) = मनन शक्ति के साथ तथा (सप्त होतृभिः) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' = कर्णादि सात होताओं के साथ प्रभु जिन्हें ज्ञान प्राप्त कराते हैं (ते) = वे (आदित्यः) = ज्ञान का आदान करनेवाले ज्ञानी मननशील ऋषि (अभयम्) = निर्भयता व (शर्म) = सुख को यच्छत दें और (नः) = हमारे लिये (सुपथा) = उत्तम मार्गों को (सुगा) = सुगमता से जाने योग्य (कर्त) = करें। जिससे (स्वस्तये) = हमारी जीवन की स्थिति उत्तम हो । [२] प्रभु सृष्टि के प्रारम्भ में 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' इन ऋषियों को वेदज्ञान प्राप्त कराते हैं। अब भी निर्मल हृदय होकर हम उस प्रकाश को देख सकते हैं। प्रभु जहाँ ज्ञान प्राप्त कराते हैं, वहाँ मनन साधन 'मन' को भी प्राप्त कराते हैं, उस मनन के लिये सामग्री को प्राप्त कराने के लिये 'दो कान, दो नासिकाछिद्र, दो चक्षु व वाणी' रूप सप्त [ऋषियों] को भी प्राप्त कराते हैं। इस प्रकार मन, इन्द्रियों व वेदवाणी द्वारा अपने ज्ञान का वर्धन करनेवाले ये व्यक्ति 'आदित्य' हैं। इन आदित्यों के सम्पर्क में हमें निर्भयता व सुख प्राप्त होता है । ये आदित्य हमें ज्ञान देकर सुपथ से चलने की प्रेरणा प्राप्त कराते हैं। इस सुपथ से चलते हुए हमारा जीवन 'स्वस्ति-मय' होता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करके हम सुपथ से चलें और स्वस्ति को प्राप्त करें।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Those Adityas, children of eternal light blest with knowledge and wisdom of divinity, for whom Manu, omniscient creator, lighted the first fire of creative yajna with thought and tapas and conducted the yajna with seven priests (five elements with mahat and Ahankara, seven pranas, sevenfold sense and mind complex, seven rays of the sun, seven sages and seven chhandas of the Veda) may, we pray, bring a peaceful life and home with freedom from fear and make our paths of life simple, straight and clear from darkness and evil for the good and all round well being of life.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्यांनी मन, बुद्धी, चित्त, अहंकार, श्रोत्र, नेत्र, वाणी परमेश्वराला समर्पित केलेली आहे अशा जीवनमुक्तांकडून वेदाचे ज्ञान व वेदोक्त स्तुतीचे शिक्षण घेऊन आपल्यामध्ये परमात्म्याचा साक्षात्कार करावा. हे कल्याणाचे साधन आहे. ॥७॥

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