ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 71/ मन्त्र 9
इ॒मे ये नार्वाङ्न प॒रश्चर॑न्ति॒ न ब्रा॑ह्म॒णासो॒ न सु॒तेक॑रासः । त ए॒ते वाच॑मभि॒पद्य॑ पा॒पया॑ सि॒रीस्तन्त्रं॑ तन्वते॒ अप्र॑जज्ञयः ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒मे । ये । न । अ॒र्वाक् । न । प॒रः । चर॑न्ति । न । ब्रा॒ह्म॒णासः॑ । न । सु॒तेऽक॑रासः । ते । ए॒ते । वाच॑म् । अ॒भि॒ऽपद्य॑ । पा॒पया॑ । सि॒रीः । तन्त्र॑म् । त॒न्व॒ते॒ । अप्र॑ऽजज्ञयः ॥
स्वर रहित मन्त्र
इमे ये नार्वाङ्न परश्चरन्ति न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः । त एते वाचमभिपद्य पापया सिरीस्तन्त्रं तन्वते अप्रजज्ञयः ॥
स्वर रहित पद पाठइमे । ये । न । अर्वाक् । न । परः । चरन्ति । न । ब्राह्मणासः । न । सुतेऽकरासः । ते । एते । वाचम् । अभिऽपद्य । पापया । सिरीः । तन्त्रम् । तन्वते । अप्रऽजज्ञयः ॥ १०.७१.९
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 71; मन्त्र » 9
अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 24; मन्त्र » 4
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अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 24; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(इमे ये) ये जो (अर्वाङ्-न परः-न चरन्ति) इस लोक के शास्त्र को नहीं वैसे परलोकशास्त्र-अध्यात्मशास्त्र को नहीं जानते हैं (ब्राह्मणासः-न) वे ब्राह्मण नहीं हैं (सुतेकरासः-न) उपासनारसनिष्पादक भी नहीं हैं (ते-एते पापया वाचम् अभिपद्य) वे ये अज्ञानरूप पापभावना से वेदवाणी को प्राप्त करके भी अच्छा फल नहीं प्राप्त करते हैं, किन्तु (अप्रजज्ञयः) अयथार्थ ज्ञानी-यथार्थज्ञानरहित होते हुए (सिरीः-तन्त्रं-तन्वते) बन्धनरूप नाडीवाले कुटुम्ब-सन्तान वंश का विस्तार करते हैं या अपने शरीर को बढ़ाते हैं ॥९॥
भावार्थ
जो मनुष्य इस लोक के शास्त्र को नहीं जानते तथा न परलोकशास्त्र अर्थात् अध्यात्मशास्त्र को जानते हैं, वे न ब्राह्मण हैं, न उपासक हैं, किन्तु अज्ञानरूप पाप से युक्त हुए केवल सन्तान वंश का या अपने शरीर का ही विस्तार करते हैं ॥९॥
विषय
वेदज्ञान का लाभ न करने वालों का अनिष्ट जीवन
भावार्थ
(इमे) ये (ये) जो (न अर्वाक्) यहां, इस लोक में समीप आत्मा का ज्ञान सम्पादन नहीं करते और (न परः) न दूर उत्तम गुरु आदि का सत्संग कर परम प्रभु का ज्ञान प्राप्त करते हैं और जो (न ब्राह्मणासः) न ब्रह्म, वेद के जाननेहारे हैं (नः सुते-करासः) और न यज्ञ में कार्य करने में कुशल होते हैं (ते एते) वे ये (पापया वाचम् अभिपद्य) पापकारिणी, वा मलिन वाणी को प्राप्त होकर वा पापबुद्धि से वेदवाणी को विपरीत जानकर (अप्र-ज्ञयः) अज्ञानी रह कर (सिरीः) केवल नाड़ियों में ही रहकर, वा जलादि स्थूल पदार्थों में ही फंस कर (तन्त्रम् तन्वते) अनेक प्रपञ्च करते हैं, अथवा वे (सिरीः) हल आदि स्थूल साधन लेकर ही (तन्त्रं तन्वते) अपना लोक व्यवहार कृषि, कुटुम्ब भरण आदि करते हैं। अथवा (ते वाचम् अभिपद्य) वे वाणी को प्राप्त करके भी (अप्र-जज्ञयः) अज्ञानी रहकर (पापया) पाप-वृत्ति से प्रेरित होकर (सिरीः) सीर, हंसिया लेकर उपयोग कर (तन्त्रं तन्वते) प्रपञ्च करते हैं। राष्ट्र शासन, वा हत्यामय यज्ञ आदि करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
बृहस्पतिः॥ देवता—ज्ञानम्॥ छन्दः– १ त्रिष्टुप्। २ भुरिक् त्रिष्टुप्। ३, ७ निचृत् त्रिष्टुप्। ४ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ५, ६, ८, १०, ११ विराट् त्रिष्टुप्। ९ विराड् जगती॥ एकादशर्चं सूक्तम्॥
विषय
ज्ञानी - यज्ञशील
पदार्थ
[१] (इमे) = ये (ये) = जो (न) = न तो (अर्वाड्) = यहाँ नीचे लौकिक क्षेत्र में ब्राह्मणों के साथ ज्ञानचर्चा करते हुए (चरन्ति) = विचरते हैं और (न) = नां ही (परः) = उत्कृष्ट अध्यात्मक्षेत्र में देवचिन्तन करते हुए देवों के साथ विचरते हैं, वे (न ब्राह्मणासः) = न ज्ञानी बनते हैं और (न) = नां ही (सुतेकरासः) = यज्ञादि को करनेवाले होते हैं । ब्राह्मणों के साथ विचरते, तो उनके साथ ज्ञानचर्या करते हुए ज्ञानी बन जाते । यदि देवों का चिन्तन करते, तो इन सब पदार्थों को देवों से दिया हुआ जानकर, सदा देवों के लिये देकर यज्ञशेष का ही सेवन करते । परन्तु अब ये न तो ज्ञानी बने, न यज्ञशील। [२] (ते एते) = वे ये (अप्रजज्ञयः) = अविद्वान् लोग (वाचम्) = लौकिकी वाणी को ही, 'कहाँ और कब क्या-क्या दुर्घटनाएं हुई' इस प्रकार की व्यर्थ की वाणी को (अभिपद्य) = प्राप्त होकर पापया उस पाप की ओर झुकाव को करनेवाली वाणी से युक्त हुए हुए (सिरी:) = [सीरिणो भूत्वा सा० ] हलोंवाले होकर (तन्त्रम्) = कृषि लक्षण तन्त्र का ही (तन्वते) = विस्तार करते हैं । अर्थात् ये हल ही चलाते रह जाते हैं, अर्थात् खान-पान की दुनियाँ से ऊपर नहीं उठ पाते ।
भावार्थ
भावार्थ- हम ब्राह्मणों के सम्पर्क से ज्ञानी बनें, देवों के सम्पर्क से यज्ञशील। केवल लौकिक बातों के ज्ञान में उलझकर खाने-पीने की दुनियाँ में ही न समाप्त हो जाएँ ।
संस्कृत (1)
पदार्थः
(इमे ये) एते ये (अर्वाङ् न परः-न चरन्ति) अवरलोकशास्त्रं न तथा परलोकशास्त्रमध्यात्मशास्त्रं न चरन्ति-आचरन्ति-जानन्ति (ब्राह्मणासः-न) ते ब्राह्मणा न (सुतेकरासः-न) उपासनारसनिष्पादका न भवन्ति (ते-एते पापया वाचम्-अभिपद्य) ते खल्वेतेऽज्ञानरूपपापभावनया वाचं प्राप्यापि न सम्यक्फलं प्राप्नुवन्ति किन्तु (अप्रजज्ञयः) असम्यग्ज्ञानिनः-यथार्थज्ञानरहिताः “प्रपूर्वकात्-ज्ञा धातोः किः प्रत्ययः” “आदॄगमहनजनः किकिनौ लिट् च” [अष्टा० ३।२।१७१] सन्तः (सिरीः-तन्त्रं तन्वते) बन्धनरूपनाडीमन्तः सन्तः “सिरासु बन्धनरूपासु नाडीषु” [ऋ० १।१२९।११ दयानन्दः] “छन्दसीवनिपौ मत्वर्थे वा” “कुटुम्बं सन्तानवंशम्” “तन्त्रं कुटुम्बधारणम्” [यजु० १९।८७ दयानन्दः] विस्तारयन्ति यद्वा शरीरमेव वर्धयन्ति ॥९॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Those there are who pursue neither the knowledge of this material world nor the knowledge of the spiritual world, nor are they Brahmanas interested in the holiness of the world of reality, nor even do they follow ritual and worldly life consciously with open mind. So being ignorant people they use only the non holy language of impiety and merely extend the thread of physical existence at the human level in their life.
मराठी (1)
भावार्थ
जी माणसे या लोकाच्या शास्त्राला जाणत नाहीत व परलोकशास्त्र अर्थात अध्यात्मशास्त्रही जाणत नाहीत. ते ब्राह्मण नाहीत किंवा उपासक नाहीत; परंतु अज्ञानरूप पापयुक्त होऊन केवळ संतानांचा, वंशाचा किंवा आपल्या शरीराचाच विस्तार करतात. ॥९॥
हिंगलिश (1)
Subject
Livelihood of Non intellectuals
Word Meaning
(इमे ये न अर्वाक् न पर: न चरन्ति)और वे अकर्मन्य लोग जो न वर्तमान न भविष्य के बारे मे चिंतन करते हैं ( न ब्राह्मणास: न सुकेतरास: ) जिन्हें न वेद ज्ञान है न बुद्धि जन्य विज्ञान कार्य कौशल निपुणता है (अप्रजयज्ञ: ) यथार्थ ज्ञान के अभाव में ( ते एते पापया वाचं अभिपद्य) वे पापकारिणी अज्ञान युक्त लौकिक व्यवहार (सिरी: तन्त्रं तन्वते) मे प्रवृत्त हो कर अपने परिवार की वृद्धि और अपने भौतिक शरीर की वृद्धि मे व्यस्त रहते हैं.
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