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ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 14 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 14/ मन्त्र 2
    ऋषिः - गृत्समदः शौनकः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अध्व॑र्यवो॒ यो अ॒पो व॑व्रि॒वांसं॑ वृ॒त्रं ज॒घाना॒शन्ये॑व वृ॒क्षम्। तस्मा॑ ए॒तं भ॑रत तद्व॒शायँ॑ ए॒ष इन्द्रो॑ अर्हति पी॒तिम॑स्य॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अध्व॑र्यवः । यः । अ॒पः । व॒व्रि॒वांस॑म् । वृ॒त्रम् । ज॒घान॑ । अ॒शन्या॑ऽइव । वृ॒क्षम् । तस्मै॑ । ए॒तम् । भ॒र॒त॒ । त॒त्ऽव॒शाय॑ । ए॒षः । इन्द्रः॑ । अ॒र्ह॒ति॒ । पी॒तिम् । अ॒स्य॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अध्वर्यवो यो अपो वव्रिवांसं वृत्रं जघानाशन्येव वृक्षम्। तस्मा एतं भरत तद्वशायँ एष इन्द्रो अर्हति पीतिमस्य॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अध्वर्यवः। यः। अपः। वव्रिवांसम्। वृत्रम्। जघान। अशन्याऽइव। वृक्षम्। तस्मै। एतम्। भरत। तत्ऽवशाय। एषः। इन्द्रः। अर्हति। पीतिम्। अस्य॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 2; सूक्त » 14; मन्त्र » 2
    अष्टक » 2; अध्याय » 6; वर्ग » 13; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ विद्युद्विषयमाह।

    अन्वयः

    हे अध्वर्यवो यस्सूर्यो वव्रिवांसं वृत्रमशन्येव वृक्षं जघानापो वर्षति य एष इन्द्रोऽस्य पीतिमर्हति तस्मा तद्वशायैतं भरत ॥२॥

    पदार्थः

    (अध्वर्यवः) आत्मनोऽध्वरमहिंसामिच्छन्तः (यः) (अपः) (जलानि) (वव्रिवांसम्) आवरकम् (वृत्रम्) मेघम् (जघान) हन्ति (अशन्येव) विद्युता (वृक्षम्) (तस्मै) (एतम्) द्वयम् (भरत) (तद्वशाय) तत्तत्कामयमानाय (एषः) (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् (अर्हति) योग्यो न भवति (पीतिम्) पानम् (अस्य) सोमलतादिरसस्य ॥२॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। ये सूर्यवद्विद्यां मेघवत्सुखं जनयन्ति सदा पथ्यसेविनस्सन्त ओषधीः सेवन्ते ते परोपकारमपि कर्त्तुमर्हन्ति ॥२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब बिजुली के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे (अध्वर्यवः) अपने को अहिंसा की इच्छा करनेवालो ! (यः) जो सूर्य (वव्रिवांसम्) आवरण करनेवाले (वृत्रम्) मेघ को (अशन्येव) बिजुली के समान (वृक्षम्) वृक्ष को (जघान) मारता है अर्थात् दाहशक्ति से भस्म कर देता है और (आपः) जलों को वर्षाता तथा जो (एषः) यह (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् जन (अस्य) सोमलतादि रस के (पीतिम्) पीने को (अर्हति) योग्य होता है इस कारण (तद्वशाय) उन उन पदार्थों की कामना करनेवाले के लिये (एतम्) उक्त पदार्थ द्वय को धारण करो अर्थात् उनके गुणों को अपने मन से निश्चित करो ॥२॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं । जो सूर्य के समान विद्या और मेघ के समान सुख की उत्पत्ति करते हैं और सदा पथ्योषधि सेवी हुए ओषधियों का सेवन करते हैं, वे परोपकार करने को भी योग्य होते हैं ॥२॥

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    विषय

    वृत्रं जघान

    पदार्थ

    १. हे (अध्वर्यवः) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों की कामना करते हुए मन व इन्द्रियो ! (यः) = जो प्रभु (अपः वव्रिवांसम्) = हमारे सब कर्मों व शक्तियों को [आपः = कर्म व रेतः] आवृत करके स्थित हुए (वृत्रम्) = 'काम' को उसी प्रकार (जघान) = नष्ट करते हैं (इव) = जैसे (अशन्या वृक्षम्) = विद्युत् से वृक्ष को । (तस्मा) = उस प्रभु की प्राप्ति के लिए (एतम्) = इस सोम को शरीर में भरत धारण करो । (तद्वशायम्) = यह प्रभु हमारे से यही चाहते हैं 'तद्वशायम्' इस मूल पाठ के अनुसार यहाँ 'अयं तद्वशा' ऐसा सन्धिच्छेद करके अर्थ किया गया है। सायण भाष्य में 'तद्वशाय' यह लिखकर ‘सोमकामाय' यह अर्थ किया है। उससे यह चतुर्थ्यन्त शब्द प्रतीत होता है। भाव में अन्तर नहीं है। २. प्रभु हमारी वासना को विनष्ट करके हमें इस योग्य बनाते हैं कि हम सोम का रक्षण कर सकें । इसलिए (एषः इन्द्रः) = यह जितेन्द्रिय पुरुष (अस्य पीतिम् अर्हति) = इस सोमपान व रक्षण के योग्य है। ‘इन्द्र' के लिए यही उचित है कि इस सोम का पान करे और अपने को प्रभुप्राप्ति के योग्य बनाए ।

    भावार्थ

    भावार्थ –'वृत्र' (कामवासना) हमारी शक्ति का विनाशक है उसका विनाश करके हम शक्तिरक्षण करें और प्रभुप्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ें।

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    विषय

    विद्युत्वत् शत्रु का उपदेश ।

    भावार्थ

    हे ( अध्वर्ववः ) पूर्वोक्त विद्वान् पुरुषो ! ( अशन्या इव वृक्षम् ) विद्युत् जिस प्रकार वृक्ष को भस्म कर देता है उसी प्रकार ( यः ) जो ऐश्वर्यवान् उस ( अपः ) ज्ञान और प्रजा के सब कामों को ( वव्रिवांसं ) घेरनेवाले विघ्नकारी ( वृत्रं ) बढ़ते हुए शत्रु को (जधान) नाश करता है ( तद् वशाय ) उन २ नाना प्रकार के ऐश्वर्यों को चाहने वाले ( तस्मै ) इसके लिये ( एतं ) इस ऐश्वर्य को ( भरत ) लाओ पूर्ण करो । ( एषः इन्द्रः ) यह शत्रुहन्ता वीर पुरुष ही ( अस्य पीतिम् अर्हति ) इस राष्ट्र के उपभोग करने के योग्य है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गृत्समद ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः–१, ३, ४, ९, १०, १२ त्रिष्टुप् । २, ६,८ निचृत् त्रिष्टुप् । ७ विराट् त्रिष्टुप् । ५ निचृत्पङ्क्तिः । ११ भुरिक् पङ्क्तिः ॥ द्वादशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे सूर्याप्रमाणे विद्या व मेघाप्रमाणे सुखाची उत्पत्ती करतात व सदैव पथ्यकारक औषधींचे सेवन करतात, ते परोपकारीही असतात. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    High priests of the yajna of life, just as a stroke of lightning breaks and shatters a tree into bits, so does Indra, solar hero of the world, break the dark cloud concealing and hoarding the waters of life and thereby releases the showers of rain and joy of life. For him, bear and bring this soma of joy and celebration. He loves it intensely, and this Indra deserves to drink of it to his heart’s content.

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