ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 35/ मन्त्र 9
ऋषिः - गृत्समदः शौनकः
देवता - अपान्नपात्
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
अ॒पां नपा॒दा ह्यस्था॑दु॒पस्थं॑ जि॒ह्माना॑मू॒र्ध्वो वि॒द्युतं॒ वसा॑नः। तस्य॒ ज्येष्ठं॑ महि॒मानं॒ वह॑न्ती॒र्हिर॑ण्यवर्णाः॒ परि॑ यन्ति य॒ह्वीः॥
स्वर सहित पद पाठअ॒पाम् । नपा॑त् । आ । हि । अस्था॑त् । उ॒पऽस्थ॑म् । जि॒ह्माना॑म् । ऊ॒र्ध्वः । वि॒द्युत॑म् । वसा॑नः । तस्य॑ । ज्येष्ठ॑म् । म्हि॒मानम् । वह॑न्तीः । हिर॑ण्यऽवर्णाः । परि॑ । य॒न्ति॒ । य॒ह्वीः ॥
स्वर रहित मन्त्र
अपां नपादा ह्यस्थादुपस्थं जिह्मानामूर्ध्वो विद्युतं वसानः। तस्य ज्येष्ठं महिमानं वहन्तीर्हिरण्यवर्णाः परि यन्ति यह्वीः॥
स्वर रहित पद पाठअपाम्। नपात्। आ। हि। अस्थात्। उपऽस्थम्। जिह्मानाम्। ऊर्ध्वः। विद्युतम्। वसानः। तस्य। ज्येष्ठम्। महिमानम्। वहन्तीः। हिरण्यऽवर्णाः। परि। यन्ति। यह्वीः॥
ऋग्वेद - मण्डल » 2; सूक्त » 35; मन्त्र » 9
अष्टक » 2; अध्याय » 7; वर्ग » 23; मन्त्र » 4
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अष्टक » 2; अध्याय » 7; वर्ग » 23; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह।
अन्वयः
यो जिह्मानामूर्ध्वो विद्युतं वसानोऽपां नपान्मेघ उपस्थमास्थात् यथा तस्य हि ज्येष्ठं महिमानं वहन्तीर्यह्वीर्हिरण्यवर्णाः परियन्ति तथा प्रजा राजानं प्रतिवर्त्तन्ताम् ॥९॥
पदार्थः
(अपाम्) जलानां मध्ये (नपात्) अपतनशीलः (आ) (हि) (अस्थात्) तिष्ठति (उपस्थम्) समीपस्थम् (जिह्मानाम्) कुटिलानाम् (ऊर्ध्वः) ऊर्ध्वस्थितः (विद्युतम्) स्तनयित्नुम् (वसानः) आच्छादयन् (तस्य) (ज्येष्ठम्) अतिशयेन प्रशस्यम् (महिमानाम्) (वहन्तीः) प्रवाहं प्रापयन्त्यः (हिरण्यवर्णाः) हिरण्यवद्वर्णो यासां ता नद्यः (परि) (यन्ति) परिगच्छन्ति (यह्वीः) महत्यः। यह्व इति महन्नाम निघं० ३। ३ ॥९॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा वायोर्महिमानन्नद्यः परियन्ति तथा विद्वांसो राजानं प्रति वर्त्तन्ताम् ॥ ९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदार्थ
जो (जिह्मानाम्) कुटिलों के (ऊर्ध्वः) ऊपर स्थित (विद्युतम्) बिजली को (वसानः) आच्छादित करता हुआ (अपाम्,नपात्) जलों के बीच न गिरने का शीलवाला मेघ (उपस्थम्) समीपस्थ पदार्थों को प्राप्त होकर (आ,अस्थात्) स्थिर होता है (तस्य,हि) उसी की (ज्येष्ठम्) अतीव प्रशंसनीय (महिमानम्) महिमा को (वहन्तीः) प्रवाहरूप से प्राप्त करती हुईं (यह्वीः) बड़ी (हिरण्यवर्णाः) हिरण्य अर्थात् सुवर्ण के समान वर्णवाली नदियाँ (परि,यन्ति) सब ओर से जाती हैं वैसे प्रजागण राजा से वर्ताव करें ॥९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन की महिमा को नदियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे विद्वान् जन राजा के प्रति वर्त्तें ॥९॥
विषय
प्रभुस्मरण, अकुटिलता व ज्ञान
पदार्थ
१. (अपां न पात्) = शक्तिकणों को न नष्ट होने देनेवाला पुरुष हि निश्चय से (उपस्थम् आ अस्थात्) = उपासना में सदा स्थित होता है। इसका प्रतिदिन का पहला कार्य प्रभु का उपस्थान होता है। अब यह दिनभर के कार्यों में (जिह्यानाम् ऊर्ध्वः) = कुटिलताओं से ऊपर उठा रहता है। कुटिलता से कोई कार्य नहीं करता । छलछिद्र से रहित जीवनवाला होता है । 'सर्वं जिह्यं मृत्युपदं' = कुटिलता मृत्यु का मार्ग है – इस बात को यह नहीं भूलता (विद्युतं वसानः) = विशिष्ट ज्ञानज्योति को यह धारण करनेवाला होता है। धन कमाने के लिए कार्यों से अवकाश होते ही यह स्वाध्याय द्वारा ज्ञानज्योति बढ़ाने का प्रयत्न करता है। २. (तस्य) = उस प्रभु की (ज्येष्ठं महिमानम्) = सर्वश्रेष्ठ महिमा को (वहन्तीः) = धारण करती हुई-अर्थात् प्रभु की महिमा को हृदय से स्मरण करती हुई ये (यह्वीः) = [या, ह्वे] उस प्रभु की ओर जानेवाली उस प्रभु को पुकारनेवाली प्रजाएँ (हिरण्यवर्णाः) = उस ज्योतिर्मय प्रभु का वर्णन करनेवाली बनकर [हिरण्यं वर्णयन्ति] (परियन्ति) = अपने विविध कार्यों में प्रवृत्त होती हैं।
भावार्थ
भावार्थ– संयमी पुरुष [क] प्रभु का स्मरण करता है [ख] छलछिद्र से शून्य होकर कार्यों को करता है [ग] स्वाध्याय द्वारा ज्ञानज्योति को बढ़ाता है [ग] प्रभु की महिमा का हृदय से स्मरण करता हुआ विविध कर्त्तव्यकर्मों में प्रवृत्त होता है ।
विषय
स्त्री पुरुषों के कर्त्तव्य।
भावार्थ
( अपां नपात् ) जलों में स्थित विद्युत् या सूर्य जिस प्रकार ( जिम्हानाम् उपस्थं ) कुटिल, टेढ़े मेढ़े मेघों के समीप या (ऊर्ध्वः) उनके ऊपर वाह्यावरण में रहता हुआ और ( विद्युतं ) विशेष दीप्ति को ( वसानः ) धारण करता है और ( हिरण्य-वर्णा यह्वीः ) बड़ी २ जल धाराएं या बड़ी भारी नदियां ( तस्य ज्येष्ठं महिमानं वहन्तीः ) उसी के महान् सर्वोत्तम शासन बल को धारण करती हुईं ( परियन्ति ) सब ओर प्रवाहित होती हैं उसी प्रकार ( अपां नपात् ) अपने शरीर में स्थित प्राण और वीर्यों को विनाश न होने देने वाला, वीर्यपालक ब्रह्मचारी गृहपति ( उपस्थं ) अपने मूल को ( अस्थात् ) स्थिर करे, उपस्थेन्द्रिय का संयम करे, ब्रह्मचर्यपूर्वक वीर्य की रक्षा करे । और वह ( जिह्मानाम् ) टेढ़ी, कुटिल प्रवृत्तियों वालों के भी ( ऊर्ध्वः ) ऊपर होकर उनका त्याग करके ( विद्युतं वसानः ) विशेष तेज को धारण करता हुआ रहे । ( यह्वीः ) बड़े उत्तम स्वभाव और गुणों वाली (हिरण्यवर्णाः) सुवर्ण के समान उज्ज्वल वर्ण और रूप वाली स्त्रियें या सन्तानें (तस्य) उस प्रकार के ब्रह्मचारी के ( ज्येष्ठं ) सर्वोत्तम ( महिमानं ) बड़े भारी वीर्य या सामर्थ्य को ( वह-न्तीः ) स्वयं भी धारण करती हुईं ( परियन्ति ) उसे प्राप्त हों । ( २ ) अध्यात्म में—आत्मा प्राणों का रक्षक होने से ‘अपां नपात्’ है । कुटिल पथों पर जाने वाले इन्द्रिय गण ‘जिह्म’ हैं। उन पर वही तेज को धारता है । हिरण्य आत्मा को वरण करने वाली इन्द्रियें ही राजस् बल से बहती नदियों के समान हैं, वे भी उसी के सर्वोत्तम सामर्थ्य को धारण करती हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गृत्समद ऋषिः॥ अपान्नपाद्देवता॥ छन्दः– १, ४, ६, ७, ९, १०, १२, १३, १५ निचृत् त्रिष्टुप्। ११ विराट् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। २, ३, ८ भुरिक् पङ्क्तिः। स्वराट् पङ्क्तिः॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशा वायूच्या प्रभावामुळे नद्या प्रवाहित होतात तसे विद्वानांनी राजाबरोबर वागावे. ॥ ९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Apam-napat, essential energy born of the waters of space, wearing the mantle of lightning power, electricity, abides close above the wavy and curvy motions of the clouds. And streams of energy, wearing the lustre of gold, carrying its highest power, flow all round.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
The cloud does not allow the water to waste and covers the lightning stands above in the firmament. It encompasses the tortuously moving articles. The broad and gold encoloured rivers spread in all directions bearing to all quarters its exceeding glory. In the same manner, the subjects should deal with the king (rulers).
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
As the rivers go round and manifest glory of the air, likewise, the enlightened persons should deal with the King.
Foot Notes
(यह्वी:) मह्त्यः । यह इति महन्नाम (N.G. 3-3 ) = Big or great. (हिरण्यवर्णाः) हिरण्यवत् वर्ण: यासां ताः =Golden-coloured rivers.
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