ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 37/ मन्त्र 1
    ऋषि: - गृत्समदः शौनकः देवता - द्रविणोदाः छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः
    पदार्थ -

    हे (द्रविणोदः) धन देनेवाले आप (होत्रात्) लेने से (अन्धसः) अन्न की (जोषम्) प्रीति का (अनु, मन्दस्व) अनुमोदन करो और जैसे (सः) वह विद्वान् (पूर्णाम्) पूर्ण वृष्टि को (आसिचम्) अच्छे प्रकार सींचनेवाले की (वष्टि) कामना करता है वैसे, हे (अध्वर्यवः) अपने को यज्ञ की इच्छा करनेवाले तुम (तस्मै) उसके लिये (एतम्) उसकी इच्छावान् (ददिः) दाता आप (तुभिः) वसन्तादि तुओं के साथ (होत्रात्) देनेवाले से (सोमम्) ओषधियों के रस को (पिब) पिओ ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को परस्पर के लिये विद्या धन और धान्य आदि पदार्थ देकर निरन्तर आनन्द करना चाहिये ॥१॥

    अन्वय -

    हे द्रविणोदस्त्वं होत्रादन्धसो जोषमनु मन्दस्व। यथा स विद्वान् पूर्णामासिचं वष्टि तथा हे अध्वर्यवो यूयं तस्मा एतं भरत। हे द्रविणोदस्तद्वशो ददिस्त्वमृतुभिः सह होत्रात्सोमं पिब ॥१॥

    पदार्थ -

    (मन्दस्व) आनन्द (होत्रात्) आदानात् (अनु) (जोषम्) प्रीतिम् (अन्धसः) अन्नस्य (अध्वर्यवः) य आत्मानमध्वरमिच्छवस्ते (सः) (पूर्णाम्) (वष्टि) कामयते (आसिचम्) समन्तात्सेचकम् (तस्मै) (एतम्) (भरत) धरत। अत्र बहुलं छन्दसीति शपः श्लुर्न (तद्वशः) तदिच्छः (ददिः) दाता (होत्रात्) दातुः (सोमम्) (द्रविणोदः) यो द्रविणो ददाति तत्सम्बुद्धौ (पिब) (तुभिः) वसन्तादिभिः ॥१॥

    भावार्थ -

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः परस्परेभ्यो विद्याधनधान्यादीनि दत्वा सततमानन्दितव्यम् ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी परस्परांसाठी विद्या, धन व धान्य इत्यादी पदार्थ देऊन निरंतर आनंद प्राप्त केला पाहिजे. ॥ १ ॥

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