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ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 53/ मन्त्र 19
    ऋषिः - गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा देवता - रथाङ्गानि छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अ॒भि व्य॑यस्व खदि॒रस्य॒ सार॒मोजो॑ धेहि स्पन्द॒ने शिं॒शपा॑याम्। अक्ष॑ वीळो वीळित वी॒ळय॑स्व॒ मा यामा॑द॒स्मादव॑ जीहिपो नः॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि । व्य॒य॒स्व॒ । ख॒दि॒रस्य॑ । सार॑म् । ओजः॑ । धे॒हि॒ । स्प॒न्द॒ने । शिं॒शपा॑याम् । अक्ष॑ । वी॒ळो॒ इति॑ । वी॒ळि॒त॒ । वी॒ळय॑स्व । मा । यामा॑त् । अ॒स्मात् । अव॑ । जी॒हि॒पः॒ । नः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम्। अक्ष वीळो वीळित वीळयस्व मा यामादस्मादव जीहिपो नः॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभि। व्ययस्व। खदिरस्य। सारम्। ओजः। धेहि। स्पन्दने। शिंशपायाम्। अक्ष। वीळो इति। वीळित। वीळयस्व। मा। यामात्। अस्मात्। अव। जीहिपः। नः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 53; मन्त्र » 19
    अष्टक » 3; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे अक्ष ! त्वमस्मासु खदिरस्य सारमिवोजो धेहि शिंशपायां स्पन्दन इवाऽभिव्ययस्व। हे वीळो वीळित नोऽस्मान् वीळयस्वाऽस्माद्यामादस्मान्माव जीहिपः ॥१९॥

    पदार्थः

    (अभि) सर्वतः (व्ययस्व) व्ययं कुरु (खदिरस्य) एतत्काष्ठस्य (सारम्) दृढभागमिव (ओजः) बलम् (धेहि) (स्पन्दने) किञ्चिच्चलने (शिंशपायाम्) एतत्काष्ठे वृक्षविशेषे (अक्ष) व्याप्तविद्य (वीळो) बलवन् प्रशंसितस्वभाव (वीळित) बहुभिः प्रशंसित (वीळयस्व) प्रेरयस्व (मा) निषेधे (यामात्) प्रहरात् (अस्मात्) (अव) (जीहिपः) त्याजयेः (नः) अस्मान् ॥१९॥

    भावार्थः

    हे आचार्य्य ! अस्मासु दृढं बलं धेहि सत्कर्मस्वस्मान् प्रेरय कदाचिन्मा त्यजेः ॥१९॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

    पदार्थ

    हे (अक्ष) विद्याओं से व्याप्त ! आप हम लोगों में (खदिरस्य) इस काष्ठ के (सारम्) दृढ़ भाग के सदृश (ओजः) बल को (धेहि) धारण कीजिये (शिंशपायाम्) इस काष्ठ को वृक्षविशेष (स्पन्दने) कुछ चलने में (अभि) सबप्रकार (व्ययस्व) खर्च करो। और हे (वीळो) बलयुक्त और (वीळित) बहुतों में प्रशंसित पुरुष ! (नः) हम लोगों को (वीळयस्व) प्रेरणा करो (अस्मात्) इस (यामात्) प्रहर से (मा) नहीं (अव, जीहिपः) त्यागिये ॥१९॥

    भावार्थ

    हे आचार्य्य ! हम लोगों में दृढ़ बल को धारण करो, श्रेष्ठ कर्मों में हम लोगों की प्रेरणा करो और कभी मत त्याग करो ॥१९॥

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    विषय

    रथ की दृढ़ता

    पदार्थ

    [१] खदिर [खैर] वृक्ष की लकड़ी बड़ी पक्की होती है। शरीररूप रथ को सम्बोधन करते हुए कहते हैं कि तू (खदिरस्य) = इस खदिर वृक्ष के (सारम्) = बल व स्थिरांश को (अभि वि अयस्व) = सब ओर विशेषरूप से प्राप्त हो, अर्थात् तेरा अंग-प्रत्यंग दृढ़ हो । स्पन्दने इस शरीररूप रथ की गति में (शिंशपायाम्) = शीशम के समान दृढ़ शरीर-रथ में (ओजो धेहि) = ओज को धारण कर। यह शरीर-रथ गति करता हुआ ओजस्वी प्रतीत हो । [२] हे (वीडो) = दृढ़ वीडित संकल्प आदि से दृढ़ीकृत (अक्ष) = मनरूपी अक्ष [axle pole] तू (वीडयस्व) = अत्यन्त दृढ़ हो । (अस्मात्) = इस (यामात्) = जीवनयात्रा के साधनभूत रथ से (नः) = हमें (मा अवजीहिपः) = गिरा मत दे। हम इस रथ में स्वस्थरूप से स्थित हों और जीवनयात्रा को पूर्ण कर सकें। मनः संकल्प दृढ़ होगा तो अवश्य हम दीर्घायुष्यवाले बनेंगे ही। तभी हम जीवनयात्रा को पूर्ण भी कर सकेंगे।

    भावार्थ

    भावार्थ- यह शरीर-रथ उस रथ के समान दृढ़ हो, जो कि खैर व शीशम की लकड़ी से बना होता है। इसमें मनरूपी अक्ष भी बड़ा दृढ़ हो । अक्ष के टूटते ही रथ समाप्त-सा हो जाता है। यही स्थिति शरीर में मन की है। उसका दृढ़ होना अत्यन्त आवश्यक है।

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    विषय

    वीरोचित उपदेश।

    भावार्थ

    हे (वीळो) वीर्यवन् ! हे (वीळित) विविध प्रजाओं से प्रशंसित एवं दृढ़ीभूत पुरुष तू (खदिरस्य सारम्) खदिर वृक्ष के सार अर्थात् बलयुक्त, दृढ़, (खदिरस्य) शत्रुहिंसक सेना के (सारम्) प्रबल भाग को लक्ष्य करके (अभि वि अयस्व) विशेष रीति से व्यय कर। और (स्पन्दने) कुछ २ चलने के अवसर में (शिंशपायाम्) शीशम के समान दृढ़ रथसैन्य पर स्थिर होकर (ओजः धेहि) बल पराक्रम कर। हे (अक्ष) प्राप्त विद्य ! या हे अध्यक्ष पुरुष ! हे (वीळो) वीर्यवान् दृढ़ पुरुष ! तू (नः) हमें (अस्मात्) इस (यामात्) प्रहर से आगे या इस प्रकार के उत्तम प्रबन्ध से (मा अव जीहिपः) मत वञ्चित रख। (२) अथवा (खदिरस्य सारम् इव ओजः धेहि) खदिर वृक्ष के सार कत्थे वा गोंद के समान ओजात्मक, तमतमाते तेज को धारण करा और (शिंशपायाम् स्पन्दन इव) शिंशपा या सीशम के वृक्ष से निकलने वाले गोंद के समान (अभि सं व्ययस्व) बहुत स्वल्प व्यय कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥ १ इन्द्रापर्वतौ। २–१४, २१-२४ इन्द्रः। १५, १६ वाक्। १७—२० रथाङ्गानि देवताः॥ छन्दः- १, ५,९, २१ निचृत्त्रिष्टुप्। २, ६, ७, १४, १७, १९, २३, २४ त्रिष्टुप्। ३, ४, ८, १५ स्वराट् त्रिष्टुप्। ११ भुरिक् त्रिष्टुप्। १२,२२ अनुष्टुप्। २० भुरिगनुष्टुप्। १०,१६ निचृज्जगती। १३ निचृद्गायत्री। १८ निचृद् बृहती॥ चतुर्विंशत्यृचं सूक्तम्।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे आचार्य! आम्हाला दृढ बलयुक्त करा. श्रेष्ठ कर्म करण्यासाठी प्रेरणा द्या. आमचा कधी त्याग करू नका. ॥ १९ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Aksha, centre hold of knowledge, vision and power, bring us the centre strength of the Khadira wood for our chariot of life. In our body and mind, as in the motion of a chariot, infuse light and lustre. O master of strength and light, universally admired, inspire us with strength and courage of the conviction, forsake us not in the streaming flow of life and time.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The duties of enlightened persons are told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O highly learned Acharya (Preceptor ) ! firmly establish in us the vigor of the Khadir (a tree named Khair like the in India and produces catechu). Give solidity to us chariot made from the Shinshapa (a kind of tree). O strong and noble person of admirable temper ! praised by all, prompt us to do noble deeds. Do not allow us to waste our time.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O preceptor ! establish in us firm strength. Urge upon us to do noble deeds and do not forsake us.

    Foot Notes

    (वीडो) बलवन, प्रशंसितस्वभाव । वीलु इति बलनाम (NG 2, 9) = Strong and man of admired temper. (वीड़ित ) बहुभि: प्रशंसित = Admired by many. (वीड़यस्व) प्रेरयस्व = Prompt, urge. (अक्ष) व्याप्तविद्य अक्षाइति पदनाम । षद गतौ । ( NG 5, 3 ) = गतेस्त्रिष्वर्थेष्वत्र प्राप्तिग्रहणं कृतं भाष्यकृता, तेन प्राप्तविद्येति व्याख्यानम् । Well-versed in many sciences highly learned.

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