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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 15/ मन्त्र 2
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - अग्निः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    परि॑ त्रिवि॒ष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॒थीरि॑व। आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त् ॥२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । त्रि॒ऽवि॒ष्टि । अ॒ध्व॒रम् । याति॑ । अ॒ग्निः । र॒थीःऽइ॑व । आ । दे॒वेषु । प्रयः॑ । दध॑त् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव। आ देवेषु प्रयो दधत् ॥२॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि। त्रिऽविष्टि। अध्वरम्। याति। अग्निः। रथीःऽइव। आ। देवेषु। प्रयः। दधत् ॥२॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 15; मन्त्र » 2
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 15; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनरग्निविद्याविषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वांसो ! योऽग्नी रथीरिव देवेषु प्रयो दधत् त्रिविष्ट्यध्वरं पर्यायाति स युष्माभिः कार्येषु योजनीयः ॥२॥

    पदार्थः

    (परि) (त्रिविष्टि) विविधे सुखप्रवेशे (अध्वरम्) सत्कर्त्तव्यं व्यवहारम् (याति) (अग्निः) पावकः (रथीरिव) प्रशस्तरथादियुक्तः सेनेश इव (आ) (देवेषु) (प्रयः) कमनीयं धनम् (दधत्) धरन्त्सन् ॥२॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यथोत्तमसेनः सेनाध्यक्षस्त्रिविधं सुखमाप्नोति तथैवाऽग्निविद्याविच्छरीरात्मेन्द्रियाऽऽनन्दं लभते ॥२॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    फिर अग्निविद्याविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वानो ! जो (अग्निः) अग्नि (रथीरिव) श्रेष्ठ रथ आदि से युक्त सेना के स्वामी के सदृश (देवेषु) प्रकाशमान विद्वानों में (प्रयः) कामना करने योग्य धन को (दधत्) धारण करता हुआ (त्रिविष्टि) तीन प्रकार के सुख के प्रवेश में (अध्वरम्) सत्कार करने योग्य व्यवहार को (परि, आ, याति) सब ओर से प्राप्त होता है, वह आप लोगों से कार्य्यों में युक्त करने योग्य है ॥२॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे उत्तम सेना से युक्त सेनाध्यक्ष पुरुष तीन प्रकार के सुख को प्राप्त होता है, वैसे ही अग्निविद्या का जाननेवाला शरीर, आत्मा और इन्द्रियों के आनन्द को प्राप्त होता है ॥२॥

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    विषय

    देवेषु प्रयः दधत्

    पदार्थ

    [१] (अग्निः) = वे अग्रणी प्रभु (त्रिविष्टि) = तीनों लोकों में व्याप्ति के द्वारा (अध्वरम्) = इस सृष्टि यज्ञ में (परियाति) = सब ओर गति कर रहे हैं। सारी गति के आदि स्रोत प्रभु ही हैं । (रथी: इव) = वे रथी के समान हैं। रथवाला व्यक्ति जिस प्रकार शीघ्रता से गतिवाला होता है, उसी प्रकार वे प्रभु शीघ्रता से गतिवाले हैं। [२] वे प्रभु (देवेषु) = इन सब सूर्यादि देवों में (प्रयः) = [प्रयस्=strength to work] कार्य करने की शक्ति को (दधत्) = स्थापित करते हैं। सूर्यादि सब पिण्ड प्रभु की शक्ति से ही उस उस कार्य को कर रहे हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सृष्टि यज्ञ के संचालक प्रभु ही हैं ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जसे उत्तम सेनायुक्त सेनाध्यक्षाला तीन प्रकारचे सुख प्राप्त होते, तसेच अग्नी विद्या जाणणारा शरीर, आत्मा व इंद्रियांच्या आनंदाला प्राप्त करतो. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni, leader and pioneer, like a hero of the war chariot goes thrice round and round the yajna of our corporate life, bearing the wealth of peace and well being among the noble powers and peoples of the world.

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