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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 34 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 34/ मन्त्र 9
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - ऋभवः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    ये अ॒श्विना॒ ये पि॒तरा॒ य ऊ॒ती धे॒नुं त॑त॒क्षुर्ऋ॒भवो॒ ये अश्वा॑। ये अंस॑त्रा॒ य ऋध॒ग्रोद॑सी॒ ये विभ्वो॒ नरः॑ स्वप॒त्यानि॑ च॒क्रुः ॥९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । अ॒स्विना॑ । ये । पि॒तरा॑ । ये । ऊ॒ती । धे॒नुम् । त॒त॒क्षुः । ऋ॒भवः॑ । ये । अश्वा॑ । ये । अंस॑त्रा । य ऋध॑क् । रोद॑सी॒ इति॑ । ये । विऽभ्वः॑ । नरः॑ । सु॒ऽअ॒प॒त्यानि॑ । च॒क्रुः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ये अश्विना ये पितरा य ऊती धेनुं ततक्षुर्ऋभवो ये अश्वा। ये अंसत्रा य ऋधग्रोदसी ये विभ्वो नरः स्वपत्यानि चक्रुः ॥९॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये। अश्विना। ये पितरा। ये। ऊती। धेनुम्। ततक्षुः। ऋभवः। ये। अश्वा। ये। अंसत्रा। ये। ऋधक्। रोदसी इति। ये। विऽभ्वः। नरः। सुऽअपत्यानि। चक्रुः ॥९॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 34; मन्त्र » 9
    अष्टक » 3; अध्याय » 7; वर्ग » 4; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    य ऋभवोऽश्विना ये पितरा येऽश्वा येंऽसत्रा ये रोदसी ये च विभ्वो नरो य ऋभव ऊती धेनुं ततक्षुः स्वपत्यानि चर्धक् चक्रुस्ते महाभाग्यशालिनः स्युः ॥९॥

    पदार्थः

    (ये) (अश्विना) सकलविद्याव्याप्तौ (ये) (पितरा) सर्वथा पालकौ (ये) (ऊती) रक्षणाद्येन (धेनुम्) विद्यासहितां वाचम् (ततक्षुः) सूक्ष्मां विस्तृताञ्च कुर्वन्ति (ऋभवः) मेधाविनः (ये) (अश्वा) वेगेनाऽध्वनि व्याप्तिशीलौ युग्मौ पदार्थौ (ये) (अंसत्रा) अंसान् गत्यादीन् रक्षतस्तौ (ये) (ऋधक्) यथार्थतया (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (ये) (विभ्वः) सकलविद्यासु व्यापकाः (नरः) नेतारो मनुष्याः (स्वपत्यानि) सुष्ठु शिक्षयोत्तमानि चापत्यानि च तानि (चक्रुः) कुर्य्युः ॥९॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या विद्यां सत्पुरुषसङ्गं वृद्धसेवनं प्राप्तरक्षां च कृत्वा स्वसन्तानाञ्छ्रेष्ठान् कुर्य्युस्ते विस्तीर्णसुखप्राप्ता भवेयुः ॥९॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    (ये) जो (ऋभवः) बुद्धिमान् (अश्विना) सम्पूर्ण विद्याओं में व्याप्त (ये) जो (पितरा) सब प्रकार से पालन करनेवाले और (ये) जो (अश्वा) वेग से मार्ग के बीच व्याप्त होनेवाले दो पदार्थ (ये) (अंसत्रा) गमन आदि के रक्षक और (ये) जो (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी और (ये) जो (विभ्वः) सम्पूर्ण विद्याओं में व्यापक (नरः) नायक मनुष्य और (ये) जो बुद्धिमान् (ऊती) रक्षण आदि से (धेनुम्) विद्यासहित वाणी को (ततक्षुः) सूक्ष्म और विस्तारयुक्त करते हैं और (स्वपत्यानि) उत्तम शिक्षा से सन्तानों को श्रेष्ठ (ऋधक्) यथार्थ भाव से (चक्रुः) करें, वे बड़े भाग्यशाली होवें ॥९॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य विद्या और सत्पुरुषों का संग, वृद्धों का सेवन और अपने समीप प्राप्तों की रक्षा करके अपने सन्तानों को श्रेष्ठ करें, वे विस्तारयुक्त सुख को प्राप्त होवें ॥९॥

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    विषय

    विभू नर क्या करते हैं ?

    पदार्थ

    [१] (ये) = जो (विभ्वः नरः) = व्यापक उदार हृदयवाले उन्नतिपथ पर चलनेवाले व्यक्ति होते हैं, वे (ऊती) = अपने रक्षण के उद्देश्य से रोगों व वासनाओं के आक्रमण से अपने को बचाने के हेतु से (अश्विना) = प्राणापान को (ततक्षुः) = बनाते हैं। ये विभू नर प्राणायाम के द्वारा प्राणापान की शक्ति को विकसित करके नीरोग व निर्मल हृदय बनते हैं। [२] (ये) = जो विभू नर हैं, वे (पितरा) = मातापिता को रक्षण के उद्देश्य से उपासित करते हैं। 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव' - माता-पिता को देववत् पूजते हुए पवित्र जीवनवाले बने रहते हैं । [३] (ये) = जो (ऋभव:) = ज्ञान से दीप्त होनेवाले पुरुष हैं, वे (धेनुं ततक्षुः) = ज्ञानदुग्ध देनेवाली इस वेदवाणी रूप गौ को निर्मित करते हैं। इससे वे सदा ज्ञानदुग्ध का दोहन करते हैं। [४] (ये) = जो ऋभु हैं, वे (अश्वा) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों का निर्माण करते हैं। इन इन्द्रियाश्वों से ही तो शरीर-रथ में आगे और आगे बढ़ते हुए वे लक्ष्य पर पहुँचा करते हैं। [५] ऋभु व विभू वे हैं, (ये) = जो कि (अंसत्रा) = कवचों का निर्माण करते हैं। 'ब्रह्म वर्म ममान्तरम्'-इन ज्ञान-वाणियों को ही वे अपना आन्तर कवच बनाते हैं । [६] विभू वे हैं, (ये) = जो (रोदसी) = द्यावापृथिवी को मस्तिष्क व शरीर को (ऋधक्) = एक-एक करके [One by One] बनाते हैं। शरीर को सबल बनाते हैं, तो मस्तिष्क को वे ज्ञानदीप्त बनाते हैं। इस प्रकार ये विभू नर (स्वपत्यानि) = [स्व-पत्य] आत्मप्राप्ति के साधनभूत कर्मों को करते हैं [पत् गतौ] अथवा [सु अपत्] अच्छी प्रकार अपतन के साधनभूत कर्मों को करते हैं। ये कर्म ही उन्हें 'ऋभु, विभ्वा व वाज' बनाते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- जीवन निर्माण के लिए आवश्यक है कि [क] प्राणसाधना करें, [ख] मातापिता को देव मानें, [ग] वेदवाणीरूप गौ का दोहन करें, [घ] कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों को प्रशस्त बनाएँ, [ङ] ब्रह्मज्ञानरूप कवच का धारण करें, [च] मस्तिष्क व शरीर दोनों के निर्माण का ध्यान करें ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे विद्या व सत्पुरुषांचा संग, वृद्धांचे सेवन व आपल्याजवळ असलेल्याचे रक्षण करून आपल्या संतानांना श्रेष्ठ करतात ती खूप सुख भोगतात. ॥ ९ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Who are the Rbhus? Those who create and activate complementary circuits of energies, who serve the parents and sustain and rejuvenate health anew, who provide protection and promotion, who refine and extend knowledge and the language of knowledge, develop cattle wealth and renew the earth resources, who design and structure fast modes of travel and communication, who design and construct armour against external attacks, who cross the globe unto the sky and space and who command universal knowledge: pioneers and leaders of the best of men who can raise, train and organise a noble younger generation.

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