ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 5 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 5/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वामदेवो गौतमः देवता - वैश्वानरः छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे राजन् ! जो आप (बृहत्) बड़े (भाः) शोभित नापनेवाले और (रोधः) रोकने को (उपमित्) अलग करता है उसके (न) समान (अनूनेन) न्यूनता से रहित (बृहता) बड़े (वक्षथेन) क्रोध से राज्य को (उप, स्तभायत्) रोके उस (वैश्वानराय) सब में नायक (मीळ्हुषे) सेचन करनेवाले (अग्नये) अग्नि के सदृश वर्त्तमान विद्वान् राजा के लिये (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवन करनेवाले हम लोग सुख को (कथा) किस प्रकार से (दाशेम) देवें ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य और बिजुली के सदृश उत्तम गुणों के प्रकाश करने और जल के रोकनेवाले पदार्थ के सदृश दुष्टों के रोकनेवाले और अपने सदृश सुख, दुःख, हानि और लाभ को जानते हुए राज्य करते हैं, वे दण्ड और न्याय को चला सकते हैं ॥१॥

    अन्वय -

    हे राजन् ! यस्त्वं बृहद्भा उपमिद्रोधो नानूनेन बृहता वक्षथेन राज्यमुप स्तभायत्तस्मै वैश्वानराय मीळ्हुषेऽग्नये सजोषा वयं सुखं कथा दाशेम ॥१॥

    पदार्थ -

    (वैश्वानराय) विश्वेषु नायकाय (मीळ्हुषे) सेचकाय (सजोषाः) समानप्रीतिसेवनाः। अत्र वचनव्यत्ययेनैकवचनम्। (कथा) केन प्रकारेण (दाशेम) दद्याम (अग्नये) वह्निवद्वर्त्तमानाय विदुषे राज्ञे (बृहत्) महत् (भाः) यो भाति सः (अनूनेन) न्यूनतारहितेन (बृहता) महता (वक्षथेन) रोषेण (उप) (स्तभायत्) स्तभ्नीयात् (उपमित्) य उपमिनोति सः (न) इव (रोधः) रोधनम् ॥१॥

    भावार्थ -

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये सूर्यविद्युद्वत्सद्गुणप्रकाशका जलावरणमिव दुष्टानां निरोधकाः स्वात्मवत्सुखदुःखहानिलाभाञ्जानन्तो राज्यं कुर्वन्ति ते दण्डन्यायं प्रचालयितुं शक्नुवन्ति ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे लोक सूर्य व विद्युतप्रमाणे उत्तम गुणांचा प्रकाश करणारे, जल रोखणाऱ्या पदार्थांसारखे दुष्टांना रोखणारे व आपल्यासारखे सुख-दुःख, हानी व लाभ जाणून राज्य करतात ते दंड व न्याय करू शकतात. ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top