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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 5/ मन्त्र 8
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - वैश्वानरः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    प्र॒वाच्यं॒ वच॑सः॒ किं मे॑ अ॒स्य गुहा॑ हि॒तमुप॑ नि॒णिग्व॑दन्ति। यदु॒स्रिया॑णा॒मप॒ वारि॑व॒ व्रन्पाति॑ प्रि॒यं रु॒पो अग्रं॑ प॒दं वेः ॥८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒ऽवाच्य॑म् । वच॑सः । किम् । मे॒ । अ॒स्य । गुहा॑ । हि॒तम् । उप॑ । नि॒णिक् । व॒द॒न्ति॒ । यत् । उ॒स्रिया॑णाम् । अप॑ । वाःऽइ॑व । व्रन् । पाति॑ । प्रि॒यम् । रु॒पः । अग्र॑म् । प॒दम् । वेः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति। यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः ॥८॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रऽवाच्यम्। वचसः। किम्। मे। अस्य। गुहा। हितम्। उप। निणिक्। वदन्ति। यत्। उस्रियाणाम्। अप। वाःऽइव। व्रन्। पाति। प्रियम्। रुपः। अग्रम्। पदम्। वेरिति वेः॥८॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 5; मन्त्र » 8
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 2; मन्त्र » 3
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ प्रच्छकविषयमाह ॥

    अन्वयः

    ये मेऽस्य च वचसो गुहा हितं प्रवाच्यं निणिक् किमुपवदन्ति यदुस्रियाणां वारिव वेरग्रं पदमिव रुपः प्रियमप व्रन् कश्चैतत् पाति ॥८॥

    पदार्थः

    (प्रवाच्यम्) प्रकर्षेण वक्तुं योग्यम् (वचसः) वचनस्य (किम्) (मे) मम (अस्य) जनस्य (गुहा) बुद्धौ (हितम्) स्थितम् (उप) (निणिक्) नितरां शुन्धति (वदन्ति) (यत्) (उस्रियाणाम्) गवाम् (अप) (वारिव) जलमिव (व्रन्) अपवृणोति (पाति) (प्रियम्) कमनीयम् (रुपः) पृथिव्याः। रुप इति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१.१) (अग्रम्) (पदम्) (वेः) पक्षिणः ॥८॥

    भावार्थः

    हे विद्वांसो ! ममास्य च जनस्य बुद्धौ स्थितं चेतनं किमस्ति कीदृगस्ति यत्पशूनां पालकं जलमिव रक्षति सर्वेभ्यः प्रियं दृश्यते। यदाऽऽकाशे पक्षिणः पदमिव गुप्तमस्ति तद्विज्ञानायाऽस्मान् प्रति भवन्तः किं ब्रुवन्तु ॥८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब प्रच्छक विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    जो (मे) मेरे और (अस्य) इस जन के (वचसः) वचन के सम्बन्ध में (गुहा) बुद्धि में (हितम्) स्थित (प्रवाच्यम्) प्रकर्षता से कहने योग्य (निणिक्) अत्यन्त शुद्ध करनेवाले को (किम्) क्या (उप, वदन्ति) समीप में कहते हैं (यत्) जो (उस्रियाणाम्) गौओं के (वारिव) जल के सदृश वा (वेः) पक्षी के (अग्रम्) ऊँचे (पदम्) स्थान के सदृश (रुपः) पृथिवी के (प्रियम्) सुन्दर भाग को (अप, व्रन्) घेरता है, कौन इन दोनों का (पाति) पालन करता है ॥८॥

    भावार्थ

    हे विद्वानो ! मेरी और इस जन की बुद्धि में वर्त्तमान चेतन क्या और कैसा है? जो पशुओं के पालन करनेवाला जल के सदृश रक्षा करता और सब से प्रिय देख पड़ता है। और जो आकाश में पक्षी के पैर के सदृश गुप्त है, उसके विज्ञान के लिये हम लोगों के प्रति आप लोग क्या कहते हो ॥८॥

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    विषय

    'परम पद प्रापक' वेदज्ञान

    पदार्थ

    [१] (मे) = मेरे लिये दिये गये (अस्य वचस:) = इस वेदज्ञानरूप वाणी का (किं प्रवाच्यम्) = कहना ही क्या है ? यह तो एक अद्भुत ज्ञान है जो कि (गुहाहितम्) = बुद्धिरूप गुहा में स्थापित किया गया है। इसे (निणिक्) = 'नितरां नोक्ति शोणयति' अत्यन्त शोधक क्षीर [ज्ञानदुग्ध] उपवदन्ति कहते हैं। [२] (यत्) = जिसको (उस्त्रियाणाम्) = क्षीर की उत्स्राविणी गौओं के (वाः इव) रोगनिवारक [वारयति इति] दूध की तरह (अपव्रन्) = प्रकट करते हैं। इस ज्ञानदुग्ध को वेदवाणीरूप गौ से प्राप्त करते हैं। यह ज्ञानदुग्ध सब मानस आधियों का निवारक होता है, उसी प्रकार निवारक होता है जैसे कि गौवों का दूध शरीर की व्याधियों का। यह ज्ञान (रुपः) = ज्ञान को अग्नि आदि ऋषियों के हृदयों में आरोपित करनेवाले (वे) = गतिशील प्रभु के (अग्रं प्रियं पदम्) = सर्वश्रेष्ठ सर्वानन्दमय पद को (पाति) = हमारे लिये रक्षित करता है। यह ज्ञान हमें उस विष्णु के परम पद को प्राप्त कराता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- यह वेदज्ञान अद्भुत है। यह शोधक है और हमें प्रभु के प्रिय परमपद को प्राप्त कराता है।

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    विषय

    माता पितावत् आचार्य का स्वरूप ।

    भावार्थ

    (अस्य) इस विद्वान् आचार्य के (वचसः) वचन के सम्बन्ध में (मे) मेरे लिये (किम् प्रवाच्यं) क्या अद्भुत वा कितना अधिक प्रवचन करने योग्य है जिसे (गुहा हितम्) बुद्धि में स्थित और (निणिक्) अति शुद्ध और शिष्यादि की बुद्धि को विमल करने वाला (उपवदन्ति) बतलाते वा विद्वान् जन उपदेश करते हैं। (उस्त्रियाणां वाः इव) किरणों या मेघ की जलधाराओं या नदियों के जल के समान (उस्त्रियाणाम्) स्वयं उठने वाली वाणियों के (यत्) जिस उत्तम साररूप ज्ञान को विद्वान् लोग (अप व्रन्) खोलते वा प्रकट करते हैं । वही(रूपः वेः) बीजोत्पादक पृथिवी और कान्तिमान् सूर्य इन दोनों के तुल्य (रूपः) सन्तति उत्पादक स्त्री और (वेः) कमनीय कामनावान् पुरुष माता वा पिता दोनों के (प्रियं) प्रिय (अग्रं) मुख्य (पदं) पद आदरणीय स्थान को (पति) पालन करता है । अर्थात् वह आचार्य उनके माता पिता के तुल्य होता है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः ॥ वैश्वानरो देवता ॥ छन्दः– १ विराट् त्रिष्टुप। २, ५, ६, ७, ८, ११ निचृत् त्रिष्टुप् । ३, ४, ९, १२, १३, १५ त्रिष्टुप। १०, १४ भुरिक् पंक्तिः॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे विद्वानांनो! माझ्या व या लोकांच्या बुद्धीत वर्तमान असलेला चेतन काय व कसा आहे? जो पशूंचा पालनकर्ता, जलाप्रमाणे रक्षक व सर्वांपेक्षा प्रिय आहे. आकाशात पक्ष्याच्या पायाप्रमाणे गुप्त आहे. त्याच्या विज्ञानासाठी तुम्ही आम्हाला काय सांगता? ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    What is worthy of being proclaimed, hidden in the secret cave of this word of mine, and what the scholars and visionaries, purifying and sanctifying, mysteriously whisper closely to you is That Orb of light and heat which, like a liquid zone of vapours, covers, vitalises, sustains and reveals the dear, first, highest life and beauty of the dawn, of cows and the flying earth.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    About the questioner is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    What is it that is hidden in my words (speech) and intellect? That is particularly to be told because it is purifier of all. Who tells us about this reality? Who protects their knowledge of the Supreme Being which is like the water quenches the thirst of the cows, and like the high place of a bird hidden in the sky that covers all the desirable place of the earth?

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O learned men ! who is the conscious. Being residing in our intellect about whom we should particularly instruct and is purifier that protects us like the water. It protects the way, water protects the quadrupeds and is so dear. Teach us about that Supreme Being, Who is hidden like a bird in the sky ?

    Foot Notes

    (निणिक् ) नितरां शुन्धति । = Purifies. (रूप:) पृथिव्या:। रूप इति पृथिवीनाम (NG 1, 1) = Of the earth. (उस्त्रियाणाम् ) गवाम् । उस्रिया इति गोनाम (NG 2, 11 ) = Of the cows.

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