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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 41 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 41/ मन्त्र 11
    ऋषिः - अत्रिः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    क॒था म॒हे रु॒द्रिया॑य ब्रवाम॒ कद्रा॒ये चि॑कि॒तुषे॒ भगा॑य। आप॒ ओष॑धीरु॒त नो॑ऽवन्तु॒ द्यौर्वना॑ गि॒रयो॑ वृ॒क्षके॑शाः ॥११॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क॒था । म॒हे । रु॒द्रिया॑य । ब्र॒वा॒म॒ । कत् । रा॒ये । चि॒कि॒तुषे॑ । भगा॑य । आपः॑ । ओष॑धीः । उ॒त । नः॒ । अ॒व॒न्तु॒ । द्यौः । वना॑ । गि॒रयः॑ । वृ॒क्षऽके॑शाः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कथा महे रुद्रियाय ब्रवाम कद्राये चिकितुषे भगाय। आप ओषधीरुत नोऽवन्तु द्यौर्वना गिरयो वृक्षकेशाः ॥११॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कथा। महे। रुद्रियाय। ब्रवाम। कत्। राये। चिकितुषे। भगाय। आपः। ओषधीः। उत। नः। अवन्तु। द्यौः। वना। गिरयः। वृक्षऽकेशाः ॥११॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 41; मन्त्र » 11
    अष्टक » 4; अध्याय » 2; वर्ग » 15; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वांसो ! मनुष्या आप ओषधीर्वृक्षकेशा गिरय उत द्यौर्वनेव नोऽवन्तु तत्सहायेन वयं महे चिकितुषे रुद्रियाय कथा ब्रवाम राये भगाय कद् ब्रवाम ॥११॥

    पदार्थः

    (कथा) केन प्रकारेण (महे) महते (रुद्रियाय) रुद्रैर्लब्धाय (ब्रवाम) उपदिशेम (कत्) कदा (राये) धनाय (चिकितुषे) ज्ञातव्याय (भगाय) ऐश्वर्याय (आपः) जलानि (ओषधीः) सोमलताद्याः (उत) (नः) अस्मान् (अवन्तु) (द्यौः) सूर्य्यः (वना) किरणानीव (गिरयः) मेघाः (वृक्षकेशाः) वृक्षाः केशा इव येषां शैलानां ते ॥११॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । सर्वे मनुष्याः स्वेषामन्येषां च रक्षणाय विदुषः सङ्गत्य प्रश्नोत्तराभ्यां सत्या विद्याः प्राप्यान्येभ्य उपदिश्यैश्वर्य्यवृद्धिं कदा करिष्याम इति नित्यं प्रोत्साहेरन् ॥११॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वान् जनो ! मनुष्य (आपः) जल (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियाँ (वृक्षकेशाः) वृक्ष हैं केशों के समान जिनके वे पर्वत (गिरयः) मेघ (उत) और (द्यौः) सूर्य्य (वना) किरणों के सदृश (नः) हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें, उनके सहाय से हम लोग (महे) बड़े (चिकितुषे) जानने योग्य और (रुद्रियाय) रुलानेवाले से प्राप्त हुए के लिये (कथा) किस प्रकार से (ब्रवाम) उपदेश देवें और (राये) धन और (भगाय) ऐश्वर्य्य के लिये (कत्) कब उपदेश देवें ॥११॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । सब मनुष्य अपने और अन्यों के रक्षण के लिये विद्वानों को मिल के प्रश्न और उत्तर से सत्य विद्याओं को प्राप्त हो और अन्यों के लिये उपदेश देकर ऐश्वर्य्य की वृद्धि कब करें, इस प्रकार नित्य उत्साह करें ॥११॥

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    विषय

    वृद्ध गुरु जनों के कर्तव्य ।

    भावार्थ

    भा०-हम लोग (महे) बड़े, माननीय, ( रुद्रियाय ) शत्रुओं को रोकने में समर्थ राजा के पुत्र के तुल्य, प्रिय सैन्यों और विद्याओं का उपदेष्टा आचार्य के पुत्र वा उससे विद्या प्राप्त करने वाले विद्वान् और ( चिकितुषे भगाय ) ज्ञान से युक्त सेवने योग्य सत् पुरुष की ( राये ) उत्तम ऐश्वर्य की प्राप्ति और वृद्धि के लिये ( कथा ) किस प्रकार से और ( कत् ) किस २ अवसर में (ब्रवाम ) उससे प्रार्थना निवेदन आदि करें । यह हम सदा जानें | और ( आपः ) जल और आप्त पुरुष ( ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियां और प्रतापिनी सेनाएं ( द्यौः ) सूर्य और तेजस्वी पुरुष (वना ) वन, सूर्य की किरणों और ऐश्वर्य और ( वृक्षकेशाः गिरयः ) वृक्षों को केशवत् धारण करण करने वाले पर्वत और वृक्षों के केश वा जटा के तुल्य लम्बी जटा केश धारण करने वाले जटिल जन, (गिरयः) वृद्ध उपदेष्टा जन अथवा ( वृक्षकेशाः ) वृक्षवत् काटने योग्य केशों का अन्त कर देने वाले ज्ञान वृद्ध गुरुजन ( नः अवन्तु ) हमारी रक्षा करें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अत्रिर्ऋषिः ॥ विश्वेदेवा देवता ॥ छन्दः — १, २, ६, १५, १८ त्रिष्टुप् ॥ ४, १३ विराट् त्रिष्टुप् । ३, ७, ८, १४, १९ पंक्ति: । ५, ९, १०, ११, १२ भुरिक् पंक्तिः । २० याजुषी पंक्ति: । १६ जगती । १७ निचृज्जगती ॥ विशत्यृर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    प्रभु-स्तवन व ज्ञानयुक्त ऐश्वर्य

    पदार्थ

    [१] 'रोरुयमाणो द्रवति' इस व्युत्पत्ति से 'रुद्र' स्तोता है, प्रभु का स्मरण करता हुआ वासनाओं पर आक्रमण करता है। प्रभु इन रुद्रों का हित करनेवाले रुद्रिय हैं। (कथा) = कैसे उस (महे) = महान् (रुद्रियाय) = स्तोताओं का हित करनेवाले प्रभु के लिये (व्रवाम) = हम स्तुति-वचनों का उच्चारण करें ! और (कद्) = कब (चिकितुषे) = ज्ञानवाले भगाय सेवनीय [भज सेवायाम्] (राये) = धन के लिये हों । एक भक्त यही कामना करता है कि मैं शीघ्रातिशीघ्र उस महान् प्रभु का स्तोता बनूँ और उस भजनीय ऐश्वर्य को प्राप्त करूँ जो मेरे ज्ञान के ह्रास का कारण न बनकर, ज्ञानवृद्धि का ही हेतु हो। [२] इस ज्ञानवृद्धिवाली सम्पत्ति के परिणामस्वरूप (आपः) = जल (उत) = और (ओषधी:) = ओषधियाँ (नः) = हमें अवन्तु रक्षित करें। धन के द्वारा हम इन्हें प्राप्त कर सकें और ज्ञान के द्वारा हम इनका उचित ही प्रयोग करें। (द्यौः) = यह आकाश, (वना) = सब वन, तथा (वृक्षकेशाः) = वृक्षों को ही केशों के स्थान में धारण करनेवाले (गिरयः) = ये पर्वत-वृक्षों से आच्छादित अद्रि भी हमारा कल्याण करें। वस्तुतः ज्ञान के होने पर सारा संसार हितकर ही होता है। अज्ञान ही कष्ट का कारण बनता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्रभु-स्तवन से उस ऐश्वर्य को प्राप्त करें जो हमारी ज्ञानवृद्धि का कारण हो । इस ज्ञान से यह सारा संसार हमारे लिये हितकर हो ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सर्व माणसांनी आपल्या व इतरांच्या रक्षणासाठी विद्वानांना भेटून प्रश्नोत्तराद्वारे सत्य विद्या प्राप्त करून इतरांना उपदेश करावा व ऐश्वर्याची वृद्धी केव्हा करता येईल हे विचारून नित्य प्रोत्साहित करावे. ॥ ११ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    How shall we speak to the seeker of nature’s catalytic powers breaking and making the changing forms of matter and energy, how speak to the earnest seeker of knowledge, of wealth, production and prosperity? May the flowing waters and clouds, herbs, heavens, rays of sunlight and high mountains with locks of forests help and protect us.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The subject of Vishvedevāh goes on.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned person ! may the waters, like herbs like the soma etc., hills whose hair are trees, the sun like the rays protect us. With their help in what manner shall we speak about the great Lord who is worthy of knowledge and attains persons to observe Brahmacharya up to the age of forty-four (inspires) and makes the wicked weep. And when shall we speak about the good wealth—that is to be acquired.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    All men should approach the enlightened persons for their protection of others. And having acquired the knowledge of true sciences by the method of questions and answers, and having taught them to others, let them always plan with zeal how could we increase our prosperity.

    Translator's Notes

    अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद् वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्चत्वारिशदक्षर: त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनं तदस्य रूद्रा अन्वायत्ता प्राणा: वावरुद्रा एतेहीदं सर्वं रोदयन्ति (Chhandogyopanshad 3,16) ।

    Foot Notes

    (रुद्रियाय) रुद्रैलैव्धाय । (जगदीश्वराय)। = For God who has been attained by those persons who have observed Brahmacharya up to the age of forty four years of being dispensers of justice make the wickeds weep. (चिकितुषे ) ज्ञातव्याय । कित-ज्ञाने (काशकृत्स्नधातुपाठे 2, 74)। = Who is worthy of being known ? (वना) किरणानीव । वनम् इति रश्मिनाम (NG 1, 5)। = Like rays of the sun.

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