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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 41 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 41/ मन्त्र 14
    ऋषिः - अत्रिः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    आ दैव्या॑नि॒ पार्थि॑वानि॒ जन्मा॒पश्चाच्छा॒ सुम॑खाय वोचम्। वर्ध॑न्तां॒ द्यावो॒ गिर॑श्च॒न्द्राग्रा॑ उ॒दा व॑र्धन्ताम॒भिषा॑ता॒ अर्णाः॑ ॥१४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । दैव्या॑नि । पार्थि॑वानि । जन्म॑ । अ॒पः । च॒ । अच्छ॑ । सुऽम॑खाय । वो॒च॒म् । वर्ध॑न्ताम् । द्यावः॑ । गिरः॑ । च॒न्द्रऽअ॑ग्राः । उ॒दा । व॒र्ध॒न्ता॒म् । अ॒भिऽसा॑ताः । अर्णाः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ दैव्यानि पार्थिवानि जन्मापश्चाच्छा सुमखाय वोचम्। वर्धन्तां द्यावो गिरश्चन्द्राग्रा उदा वर्धन्तामभिषाता अर्णाः ॥१४॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। दैव्यानि। पार्थिवानि। जन्म। अपः। च। अच्छ। सुऽमखाय। वोचम्। वर्धन्ताम्। द्यावः। गिरः। चन्द्रऽअग्राः। उदा। वर्धन्ताम्। अभिऽसाताः। अर्णाः ॥१४॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 41; मन्त्र » 14
    अष्टक » 4; अध्याय » 2; वर्ग » 15; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! अहं यानि दैव्यानि पार्थिवानि जन्मापश्चाच्छाऽऽवोचं येनोदा अर्णा इवाऽस्माकं चन्द्राग्रा अभिषाता द्यावो गिरश्च वर्धन्ताम् यतः सुमखाय प्राणिनो वर्धन्ताम् ॥१४॥

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (दैव्यानि) देवेषु दिव्येषु गुणेषु भवानि (पार्थिवानि) पृथिव्यां विदितानि (जन्म) जन्मानि (अपः) अपांसि कर्म्माणि (च) (अच्छा) सुष्ठु। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (सुमखाय) शोभना मखा यज्ञा यस्य तस्मै (वोचम्) उपदिशेयम् (वर्धन्ताम्) (द्यावः) सत्याः कामाः (गिरः) सुशिक्षिता वाचः (चन्द्राग्राः) चन्द्रं सुवर्णमानन्दो वाऽग्रे यासां ताः (उदा) उदकेन (वर्धन्ताम्) (अभिषाताः) अभितो विभक्ताः (अर्णाः) समुद्राः ॥१४॥

    भावार्थः

    अत्र [वाचकलुप्तो]पमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यूयं धर्म्याणि कर्म्माणि शुभान् गुणांश्च गृहीत्वा स्वकीयाः कामना वाणीं चाऽलं कुरुत यथोदकेन नद्यः समुद्राश्च वर्धन्ते तथैव धर्म्मयुक्तेन पुरुषार्थेन मनुष्या वर्धन्ते ॥१४॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! मैं जिन (दैव्यानि) श्रेष्ठ गुणों में हुए (पार्थिवानि) पृथिवीं में विदित (जन्म) जन्मों और (अपः) कर्म्मों को (च) भी (अच्छा) उत्तम प्रकार (आ, वोचम्) सब ओर से उपदेश करूँ जिस (उदा) जल से (अर्णाः) समुद्रों के सदृश हम लोगों की (चन्द्राग्राः) सुवर्ण वा आनन्द अग्रे अर्थात् परिणाम दशा में जिनके उन (अभिषाताः) चारों ओर से बँटी हुई (द्यावः) सत्य कामनाओं को और (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों की (वर्धन्ताम्) वृद्धि कीजिये जिससे (सुमखाय) शोभन यज्ञोंवाले के लिये प्राणियों की (वर्धन्ताम्) वृद्धि हो ॥१४॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! आप लोग धर्म्मयुक्त कर्म्मों और श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके अपनी कामनाओं और वाणी को शोभित करो, जैसे जल से नदियाँ और समुद्र बढ़ते हैं, वैसे ही धर्म्मयुक्त पुरुषार्थ से मनुष्य बढ़ते हैं ॥१४॥

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    विषय

    उत्तम विद्वान् के कर्त्तव्य । सेना के कर्त्तव्य | विद्वानों के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    भा०- मैं विद्वान् पुरुष ( सुमखाय ) उत्तम यज्ञशील पुरुष को उन्नति के लिये ( दैव्यानि ) देव अर्थात् राजा, विद्वानों तथा सूर्य आदि तेजोमय पदार्थों के और ( पार्थिवानि ) पृथिवी के स्वामियों और पृथिवीस्थ महान् २ पदार्थों के ( जन्म ) उत्पन्न होने और ( अपः च ) उनके कर्म और उपभोगों का ( अच्छ ) भली प्रकार ( आवोचं ) सर्वत्र उपदेश करूं । ( उदा अभिषाताः ) जल से पूरित ( अर्णा : ) जलमय मेघों, जलाशयों समुद्रों के तुल्य ही ( द्यावः ) अति प्रकाशयुक्त, ज्ञान वाली ( चन्द्राग्राः ) चन्द्रवत् आह्लादकारी नायकादि से युक्त ( गिरः ) वाणियें ( वर्धन्ताम् ) खूब बढ़ें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अत्रिर्ऋषिः ॥ विश्वेदेवा देवता ॥ छन्दः — १, २, ६, १५, १८ त्रिष्टुप् ॥ ४, १३ विराट् त्रिष्टुप् । ३, ७, ८, १४, १९ पंक्ति: । ५, ९, १०, ११, १२ भुरिक् पंक्तिः । २० याजुषी पंक्ति: । १६ जगती । १७ निचृज्जगती ॥ विशत्यृर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    प्रभु का आदेश

    पदार्थ

    [१] गतमन्त्र में प्रभु ने कहा था कि 'इन्द्रियों व मन का दास न बनना' । अब प्रभु कहते हैं कि मैं (सुमखाय) = इस उत्तम यज्ञशील पुरुष के लिये (आवोचम्) = सर्वथा कहता हूँ कि (दैव्यानि) = देव सम्बन्धी तथा (पार्थिवानि) = इस पृथिवी सम्बन्धी जन्म शक्तियों के विकासों को तथा (अपः) = उत्तम कर्मों को (अच्छ) = [अभिप्राप्तुम् ] प्राप्त करने के लिये यत्नशील हो । पार्थिव शक्तियों के विकास वे हैं जो इहलोक के साथ सम्बद्ध हैं, ये 'अभ्युदय' का कारण बनते हैं। दैव्य विकास वे हैं जो परलोक में निः श्रेयस का कारण होते हैं। दैव्य व पार्थिव विकास क्रमश: ज्ञानजनित पवित्रता व बल अथवा ब्रह्म व क्षत्र का विकास ही है। इस ब्रह्म व क्षत्र का विकास करके सदा उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होना ही मानव जीवन का लक्ष्य है। [२] प्रभु कहते हैं कि तुम्हारे जीवनों में ये (द्यावः) = प्रकाशमय (गिरः) = ज्ञान की वाणियाँ (वर्धन्ताम्) = वृद्धि को प्राप्त करें, वे ज्ञान की वाणियाँ जो (चन्द्राग्रा:) = [चदि आह्लादे] आह्लाद को अपने अग्रभाग में लिये हुए हैं। अर्थात् जिनका आगे चलकर आनन्द प्राप्ति ही परिणाम होता है । सो तुम्हारे जीवनों में (उदा अभिषाता:) = ज्ञानजल से परिपूर्ण [अभि सन् = संभक्त-सेवित-युक्त] (अर्णा:) = ज्ञान-नदियाँ [सरस्वती] (वर्धन्ताम्) = वृद्धि को प्राप्त करें ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु का उपदेश है कि – [क] देव बनो, [ख] शक्ति का वर्धन करो, [ग] उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होवो तथा [घ] अपने जीवन में ज्ञान- नदी में स्नान करनेवाले बनो ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो! तुम्ही धर्मयुक्त कर्म व श्रेष्ठ गुण ग्रहण करून आपल्या कामना व वाणी अलंकृत करा. जशा जलाने नद्या व समुद्र परिपूर्ण होतात तसे धर्मयुक्त पुरुषार्थाने माणसांची वृद्धी होते. ॥ १४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    I speak of the celestial and terrestrial evolution of things and forces and their actions and attributes for the holy pursuer of creative yajnic action. May the heavenly light and words of knowledge grow with peace, beauty and bliss in action. May the waters of life and energy grow and flow like the spatial oceans enveloping our existence.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The subject of Vishvedevāh is still discussed here.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O men! let me speak well about the persons full of divine virtues, ordinary and well-known on earth for their actions (which cause those births), so that may our true and blissful or golden desires are properly balanced grow like the seas with waters. And may also the living beings grow for the performance or performers of the Yajnas.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O men! fulfil your noble desires and adorn your speech by doing good deeds and accepting good virtues. As rivers and seas grow with the water, likewise men grow or make progress righteously by industriousness.

    Translator's Notes

    (द्यावा:) दिवु -क्रीडा विजिगीषा... स्वप्नकान्ति गतिषु (दिवा० ) कांतिः कामना । चन्द्रम् इति हिरण्यनाम (NG 1, 2) चदि आह्लादे (भ्वा० ) अह्लाद एव आनन्द अर्णाः इति ।

    Foot Notes

    (द्याव:) सत्या: कामा: । = Truthful desires. (चन्द्राग्राः) चन्द्रं सुवर्णमानन्दो वा अग्ने यासां तां । = Which have gold or bliss before them. (अर्णाः ) समुद्राः | अर्णा इति नदीनाम (NG 1, 13) अत्र नदीपतिः समुद्रः । = Seas.

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