ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 41/ मन्त्र 7
उप॑ व॒ एषे॒ वन्द्ये॑भिः शू॒षैः प्र य॒ह्वी दि॒वश्चि॒तय॑द्भिर॒र्कैः। उ॒षासा॒नक्ता॑ वि॒दुषी॑व॒ विश्व॒मा हा॑ वहतो॒ मर्त्या॑य य॒ज्ञम् ॥७॥
स्वर सहित पद पाठउप॑ । वः॒ । एषे॑ । वन्द्ये॑भिः । शू॒षैः । प्र । य॒ह्वी इति॑ । दि॒वः । चि॒तय॑त्ऽभिः । अ॒र्कैः । उ॒षसा॒नक्ता॑ । वि॒दुषी॑इ॒वेति॑ वि॒दुषी॑ऽइव । विश्व॑म् । आ । ह॒ । व॒ह॒तः॒ । मर्त्या॑य । य॒ज्ञम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
उप व एषे वन्द्येभिः शूषैः प्र यह्वी दिवश्चितयद्भिरर्कैः। उषासानक्ता विदुषीव विश्वमा हा वहतो मर्त्याय यज्ञम् ॥७॥
स्वर रहित पद पाठउप। वः। एषे। वन्द्येभिः। शूषैः। प्र। यह्वी इति। दिवः। चितयत्ऽभिः। अर्कैः। उषासानक्ता। विदुषीऽइवेति विदुषीव। विश्वम्। आ। ह। वहतः। मर्त्याय। यज्ञम् ॥७॥
ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 41; मन्त्र » 7
अष्टक » 4; अध्याय » 2; वर्ग » 14; मन्त्र » 2
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अष्टक » 4; अध्याय » 2; वर्ग » 14; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! दिवश्चितयद्भिरर्कैर्वन्द्येभिः शूषैश्च सह यह्वी विदुषीव ये उषासानक्ता व उपैषे मर्त्याय विश्वं यज्ञं हा प्रा वहतस्तत्सेवनविद्यां यूयं विजानीत ॥७॥
पदार्थः
(उप) (वः) युष्मान् (एषे) एतुं प्राप्तुम् (वन्द्येभिः) वन्दितुं स्तोतुं योग्यैः (शूषैः) बलैः (प्र) (यह्वी) महती (दिवः) विद्याप्रकाशान् (चितयद्भिः) ज्ञापयद्भिः (अर्कैः) पूजनीयैर्विद्वद्भिस्सह (उषासानक्ता) रात्रिदिने (विदुषीव) पूर्णविद्या स्त्रीव (विश्वम्) सर्वम् (आ) समन्तात् (हा) किल। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (वहतः) धरतः (मर्त्याय) मनुष्यसुखाय (यज्ञम्) विद्याप्रचारादिकम् ॥७॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यथा महाविदुषी स्त्री सर्वत्र विदुषीषु विद्वत्सु च सत्कृता भूत्वा सर्वानुत्तमान् गुणान् धृत्वा विदुषः पत्यादीनुन्नयति तथैव रात्रिदिने सर्वान् व्यवहारान् धृत्वा सर्वं जगद्वर्धयतः ॥७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (दिवः) विद्या के प्रकाशों के (चितयद्भिः) जनाते हुए (अर्कैः) सत्कार करने योग्य विद्वानों के साथ और (वन्द्येभिः) स्तुति करने योग्य (शूषैः) बलों के साथ (यह्वी) बड़ी (विदुषीव) पूर्णविद्यायुक्त स्त्री के तुल्य जो (उषसानक्ता) रात्रि और दिन (वः) आप लोगों के (उप, एषे) समीप प्राप्त होने को (मर्त्याय) मनुष्य के सुख के लिये (विश्वम्) सम्पूर्ण (यज्ञम्) विद्या के प्रचार आदि को (हा) निश्चय (प्र, आ, वहतः) सब प्रकार धारण करते हैं, उनकी सेवन की विद्या को आप लोग जानें ॥७॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे बड़ी विद्यायुक्त स्त्री सब जगह विद्यायुक्त स्त्रियों और विद्वानों में सत्कारयुक्त हो और सम्पूर्ण उत्तम गुणों को धारण करके विद्यायुक्त पति आदि की वृद्धि करती है, वैसे ही रात्रि और दिन सब व्यवहारों को धारण करके सब जगत् की वृद्धि करते हैं ॥७॥
विषय
उषासानक्ता, दिन रात्रिवत् स्त्री पुरुषों के कर्त्तव्य ।
भावार्थ
भा०—( उषासानक्ता ) दिन और रात्रि के तुल्य प्रकट, कामना युक्त और अप्रकट कामना वा लजाभाव से युक्त होकर रहने वाले स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर ( विदुषी इव) विद्वान् स्त्री पुरुषों के तुल्य ही ( मर्त्याय ) मनुष्य मात्र के उत्पन्न करने और परोपकार करने के लिये (विश्वम् यज्ञम् ) समस्त प्रकार के यज्ञ अर्थात् पञ्चयज्ञ महायज्ञ और परस्पर के सत्संग और आदर सत्कार आदि कर्म ( आवहतः ) धारण किया करें | वे दोनों (दिवः ) ज्ञान, प्रकाश और कामना के ( चितयद्भिः ) बतलाने वाले ( अर्कैः) उत्तम वचनों से ( यह्वी ) महान् होकर ( प्रवहतः ) आगे बढ़ें और ( बन्धेभिः ) स्तुति योग्य ( शूषैः ) सुखों और बलों से युक्त हों । हे स्त्री पुरुषो ! ( वः उप एषे ) मैं ऐसे आप दोनों को प्राप्त होऊं । अपने राष्ट्र में चाहूं ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अत्रिर्ऋषिः ॥ विश्वेदेवा देवता ॥ छन्दः — १, २, ६, १५, १८ त्रिष्टुप् ॥ ४, १३ विराट् त्रिष्टुप् । ३, ७, ८, १४, १९ पंक्ति: । ५, ९, १०, ११, १२ भुरिक् पंक्तिः । २० याजुषी पंक्ति: । १६ जगती । १७ निचृज्जगती ॥ विशत्यृर्चं सूक्तम् ॥
विषय
बल-ज्ञान-यज्ञ
पदार्थ
[१] हे (यह्वी) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उषासानक्ता दिन व रात ! मैं (वः) = आपके (उप एषे) = समीप प्राप्त होता हूँ। दिन व रात दो हैं, पर प्रतिदिन आने से यहाँ 'वः' इस बहुवचन का प्रयोग है। मैं इन दिन-रात के समीप (वन्द्येभिः) = वन्दनीय (शूषैः) = बलों के हेतु से प्राप्त होता हूँ । तथा (दिवः) = प्रकाश की (चितयद्भिः) = चेतना देते हुए (अर्कैः) = स्तुति साधन मन्त्रों के हेतु से इन दिनरात को प्राप्त होता हूँ । अर्थात् मेरा प्रयत्न दिन-रात यही होता है कि मैं प्रशंसनीय बल का सम्पादन कर सकूँ तथा उन स्तुति साधन मन्त्रों का उपासन करूँ जो मेरे जीवन को प्रकाशमय करनेवाले हों। संक्षेप में भाव यही है कि मैं दिन-रात बल व ज्ञान के सम्पादन में प्रसित रहूँ । [२] ये दिन व रात (विदुषी इव) = खूब समझदार युवतियों के समान (ह) = निश्चय से (विश्वं यज्ञम्) = सब यज्ञों को (मर्त्याय) = मनुष्य के लिये (आवहोतः) = प्राप्त कराती हैं । अर्थात् हम इन दिन-रातों में सदा यज्ञशील बनने का प्रयत्न करते हैं। यज्ञशीलता की वृत्ति के लिये ही निरन्तर स्वाध्याय को अपनाते हुए बुद्धि को परिष्कृत करते हैं। समझदार पुरुष अवश्य यज्ञशील होता है।
भावार्थ
भावार्थ- हम दिन-रात बल व ज्ञान का सम्पादन करते हुए यज्ञशील बनने का प्रयत्न करें।
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो! जसा अत्यंत विदुषी स्त्रीचा विद्वानांमध्ये व विदुषी स्त्रियांमध्ये सत्कार होतो. ती संपूर्ण गुणांनी युक्त होऊन विद्वान पतीची उन्नती करते. तसेच रात्र व दिवस सर्व व्यवहार करून सर्व जगाची वृद्धी करतात. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
In consequence, for your success and achievement, by virtue of your holy and powerful efforts and your intelligent and enlightened chants and oblations, may the night and day, both great and potent, like intelligent and educated women, carry your yajna across the world and bring you from heaven the wealth of the world for humanity.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The subject of Vishvedevāh is dealt.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men ! you should acquire the knowledge of serving (utilizing) the day and night like a great and highly learned lady, with the help of the venerable enlightened persons and with varied strength (physical, mental and spiritual). Uphold all Yajna (in the form of propagation of truth and spreads of knowledge) for the benefit of mankind.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O men ! a great and highly learned lady, respected by all learned men and women and upholding all good virtues, makes her husband and other advanced. In the same manner, day and night upholding all dealings advance the world.
Translator's Notes
अकं: । अर्च पूजायाम् । यदनेनार्चन्ति ते । यज-देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु (भ्वा० ) । स्वाध्यायो वै ब्रह्मयज्ञ: ( Stph 11, 5, 6, 2) यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म (Stph 1, 7, 1, 5) यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म (Taittiriya 3, 2, 1, 4) All good. and beneficial acts are therefore included in the Yajna in the Vedic parlance.
Foot Notes
(अर्को:) पूजनीयैविद्वद्भिस्सह । = With the regenerable learned persons. (यज्ञम् ) विद्याप्रचारादिकम् । = The spread of knowledge and propagation of truth etc.
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