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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 56/ मन्त्र 6
    ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - पूषा छन्दः - स्वराडुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    आ ते॑ स्व॒स्तिमी॑मह आ॒रेअ॑घा॒मुपा॑वसुम्। अ॒द्या च॑ स॒र्वता॑तये॒ श्वश्च॑ स॒र्वता॑तये ॥६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । ते॒ । स्व॒स्तिम् । ई॒म॒हे॒ । आ॒रेऽअ॑घाम् । उप॑ऽवसुम् । अ॒द्य । च॒ । स॒र्वऽता॑तये । श्वः । च॒ । स॒र्वऽता॑तये ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ ते स्वस्तिमीमह आरेअघामुपावसुम्। अद्या च सर्वतातये श्वश्च सर्वतातये ॥६॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। ते। स्वस्तिम्। ईमहे। आरेऽअघाम्। उपऽवसुम्। अद्य। च। सर्वऽतातये। श्वः। च। सर्वऽतातये ॥६॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 56; मन्त्र » 6
    अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 22; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः सर्वैविद्वदर्थं किमेष्टव्यमित्याह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वन् ! सर्वतातये तेऽद्या च श्वश्च सर्वतातये आरेअघामुपावसुं स्वस्तिं वयमा ईमहे ॥६॥

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (ते) तुभ्यम् (स्वस्तिम्) सुखम् (ईमहे) याचामहे (आरेअघाम्) आरे दूरेऽघं पापं यस्याम् (उपावसुम्) उप समीपे वसूनि यस्यां ताम् (अद्या) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (च) (सर्वतातये) सम्पूर्णसुखसाधकाय यज्ञाय (श्वः) आगामिदिने (च) तस्मादप्यग्रे (सर्वतातये) सर्वसुखकराय ॥६॥

    भावार्थः

    हे विद्वन् ! यतो भवान् पापाचरणात् पृथक्सर्वस्य कल्याणकर्त्ताऽस्ति तस्माद्भवदर्थं सदैव सुखं वयमिच्छेमेति ॥६॥ अत्रोपदेशकश्रोतृपूषार्थवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति षट्पञ्चाशत्तमं सूक्तं द्वाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर सब को विद्वानों के लिये क्या इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वन् ! (सर्वतातये) सम्पूर्ण सुख सिद्ध करनेवाले यज्ञ के लिये (ते) तेरे लिये (अद्या) आज (च) और (श्वः) आगामी दिन (च) भी (सर्वतातये) सर्वसुख करनेवाले और पदार्थ के लिये (आरेअघाम्) जिसमें पाप दूर पहुँचे तथा (उपावसुम्) वा समीप धन आदि पदार्थ विद्यमान उस (स्वस्तिम्) सुख को हम (आ, ईमहे) अच्छे प्रकार माँगते हैं ॥६॥

    भावार्थ

    हे विद्वन् ! जिससे आप पापाचरण से अलग तथा सबके कल्याण करनेवाले हैं, इससे आपके लिये सदैव सुख की इच्छा हम लोग करें ॥६॥ इस सूक्त में उपदेशक, श्रोता और पूषा शब्द के अर्थ का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छप्पनवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

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    विषय

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    भावार्थ

    हे राजन् ! प्रभो ! ( अद्य च श्वः च ) आज भी और कल भी (सर्व-तातये) सबके कल्याणकारी ( सर्व-तातये ) सर्वहित यज्ञादि कार्य में ( ते ) तेरी ( आरे-अघाम् ) पापादि से रहित ( उप-वसुम् ) धनप्रद ( स्वस्तिम् ) कल्याणकारिणी, सुखप्रद नीति को ( ईमहे ) याचना करते हैं । इति द्वाविंशो वर्गः ।।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ पूषा देवता ॥ छन्दः – १, ४, ५ गायत्री । २, ३ निचृद्गायत्री । ६ स्वराडुष्णिक् ।।

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    विषय

    'आरे अघा-उपावसु' स्वस्ति

    पदार्थ

    [१] हे पूषन् ! हम (ते) = आप से (स्वस्तिम्) = कल्याणकारिणी रक्षा को (आ ईमहे) = सर्वथा चाहते हैं, जिसके कारण (आरे-अघाम्) = पाप हमारे से दूर रहते हैं और (उपावसुम्) = धन प्राप्त होता है [उपगतधनम्] । [२] हे प्रभो ! हम आप से की जानेवाली कल्याणकारिणी रक्षा को (अद्या च) = आज भी सर्वतातये सब सगुणों के विस्तार के लिये चाहते हैं, (श्वः च) = और कल भी सर्वतातये सब शुभों के विस्तार के लिये चाहते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु से दी जानेवाली कल्याणकारिणी रक्षा, [ख] पापों को दूर करती है, [ख] धनों को प्राप्त कराती है, [ग] आज व कल सदा सदुणों का विस्तार करनेवाली होती है। अगले सूक्त में 'भरद्वाज बार्हस्पत्य' इन्द्र व पूषा का स्तवन करता है-

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे विद्वानांनो ! तुम्ही पापाचरणापासून पृथक करणारे व सर्वांचे कल्याण करणारे आहात. त्यामुळे तुमच्या सुखाची आम्ही सदैव कामना करावी. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    We pray for your gifts of happiness and well being of the perfect order for all for today, for tomorrow and for all time for the elimination of sin and evil and for the attainment of wealth and excellence in a state of peace and harmony.

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