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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 27 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 27/ मन्त्र 2
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    य इ॑न्द्र॒ शुष्मो॑ मघवन्ते॒ अस्ति॒ शिक्षा॒ सखि॑भ्यः पुरुहूत॒ नृभ्यः॑। त्वं हि दृ॒ळ्हा म॑घव॒न्विचे॑ता॒ अपा॑ वृधि॒ परि॑वृतं॒ न राधः॑ ॥२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । इ॒न्द्र॒ । शुष्मः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । ते॒ । अस्ति॑ । शिक्ष॑ । सखि॑ऽभ्यः । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । नृऽभ्यः॑ । त्वम् । हि । दृ॒ळ्हा । म॒घ॒ऽव॒न् । विऽचे॑ताः । अप॑ । वृ॒धि॒ । परि॑ऽवृतम् । न । राधः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य इन्द्र शुष्मो मघवन्ते अस्ति शिक्षा सखिभ्यः पुरुहूत नृभ्यः। त्वं हि दृळ्हा मघवन्विचेता अपा वृधि परिवृतं न राधः ॥२॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः। इन्द्र। शुष्मः। मघऽवन्। ते। अस्ति। शिक्ष। सखिऽभ्यः। पुरुऽहूत। नृऽभ्यः। त्वम्। हि। दृळ्हा। मघऽवन्। विऽचेताः। अप। वृधि। परिऽवृतम्। न। राधः ॥२॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 27; मन्त्र » 2
    अष्टक » 5; अध्याय » 3; वर्ग » 11; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स राजा कीदृशः स्यादित्याह ॥

    अन्वयः

    हे मघवन्निन्द्र ! यस्ते शुष्मोऽस्ति, हे पुरुहूत ! या ते सखिभ्यो नृभ्यः शिक्षाऽस्ति, हे मघवन् ! यानि ते दृळ्हा सैन्यानि सन्ति तैर्विचेतास्त्वं हि परिवृतं राधो न दृळ्हा शत्रुसैन्यान्यपा वृधि ॥२॥

    पदार्थः

    (यः) (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद (शुष्मः) पुष्कलबलयुक्तः (मघवन्) परमपूजितधनवत् (ते) तव (अस्ति) (शिक्षा) शासनम् (सखिभ्यः) मित्रेभ्यः (पुरुहूत) बहुभिः प्रशंसित (नृभ्यः) स्वराज्ये नायकेभ्यः (त्वम्) (हि) (दृळ्हा) दृढानि शत्रुसैन्यानि (मघवन्) बलधनयुक्त (विचेताः) विविधा विशिष्टा वा चेतः प्रज्ञा यस्य सः (अपा) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (वृधि) दूरीकुरु (परिवृतम्) सर्वतः स्वीकृतम् (न) इव (राधः) धनम् ॥२॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। स एव राजा सदा वर्धते यो प्राप्ताऽपराधमित्राण्यपि दण्डदानेन विना न त्यजति यो हि सदैवं प्रयतते येन स्वस्य मित्रोदासीनशत्रवोऽधिका न भवेयुर्यः सदैव विद्याशिक्षावृद्धये प्रयतते स एव सर्वान् दुष्टाँल्लोककण्टकान् दस्य्यादीन्निवार्य्य राज्यं कर्त्तुमर्हति ॥२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (मघवन्) परम पूजित धनवान् (इन्द्र) परमैश्वर्य देनेवाले ! (यः) जो (ते) आपका (शुष्मः) पुष्कल बलयुक्त व्यवहार (अस्ति) है, हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त ! जो आपकी (सखिभ्यः) मित्रों के लिये वा (नृभ्यः) अपने राज्य में नायक मनुष्यों के लिये (शिक्षा) सिखावट है, हे (मघवन्) बहुधनयुक्त ! जो आपके (दृळ्हा) दृढ़ शत्रु सैन्यजन हैं उनसे (विचेताः) विविध प्रकार वा विशिष्ट बुद्धि जिनकी वह (त्वम्) आप (हि) (परिवृतम्) सब ओर से स्वीकार किये (राधः) धन को (न) जैसे वैसे दृढ़ शत्रुसेनाजनों को (अपा, वृधि) दूर कीजिये ॥२॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । वही राजा सदा बढ़ता है, जो अपराधी मित्रों को भी दण्ड देने के बिना नहीं छोड़ता, जो ऐसा सदैव उत्तम यत्न करता है, जिससे कि अपने मित्र उदासीन वा शत्रु अधिक न हों और जो सदैव विद्या और शिक्षा की वृद्धि के लिये प्रयत्न करता है, वही सब दुष्ट और लोककण्टक डाकुओं को निवार के राज्य करने के योग्य होता है ॥२॥

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    विषय

    वह हमारे लिये धन और ज्ञान के द्वार खोले ।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यप्रद ! हे ( मघवन् ) उत्तम धन के स्वामिन् ! राजन् ! विद्वन् ! ( यः ) जो (ते) तेरा ( शुष्मः अस्ति ) बल है, वह तू ( सखिभ्यः ) मित्र ( नृभ्यः ) उत्तम मनुष्यों को ( शिक्ष ) प्रदान कर । हे ( पुरुहूत ) बहुतों से प्रशंसित ! हे ( मघवन् ) उत्तम धन के स्वामिन् ! ( त्वं हि ) तू निश्चय से ( वि-चेता:) विशेष ज्ञानवान् होकर ( परि-वृतं राधः नः ) छुपे धन के समान ही ( दृढ़ा ) दृढ़ दुर्गों और परम ज्ञान को भी ( अप वृधि ) खोलकर हमें प्रदान कर ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः – १, ५ विराट् त्रिष्टुप् । निचृत्त्रिष्टुप् । ३, ४ त्रिष्टुप् । पञ्चर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    परमात्मा धन और ज्ञान दे

    पदार्थ

    पदार्थ - हे (इन्द्र) = ऐश्वर्यप्रद ! हे (मघवन्) = धन के स्वामिन् ! राजन् ! (यः) = जो (ते) = तेरा (शुष्मः अस्ति) = बल है, वह तू (सखिभ्यः) = मित्र (नृभ्यः) = मनुष्यों को (शिक्ष) = दे। हे (पुरुहूत) = बहुतों से प्रशंसित ! हे (मघवन्) = उत्तम धन के स्वामिन् ! (त्वं हि) = तू निश्चय से (विचेता:) = ज्ञानवान् होकर = (परि-वृतं राधः न) = छुपे धन के समान ही (दृढा) = दृढ़ दुर्गों और परम ज्ञान को अपा (वृधि) = खोलकर हमें दे।

    भावार्थ

    भावार्थ- मनुष्यों को चाहिए कि समस्त ज्ञान एवं धन का स्वामी ईश्वर को मानकर उसी से सम्पूर्ण पुरुषार्थ के साथ ज्ञान एवं धनैश्वर्य की प्रार्थना करें।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जो अपराधी मित्रांनाही दंड दिल्याशिवाय सोडत नाही. जो असे प्रयत्न करतो की, ज्यामुळे आपले मित्र उदासीन व शत्रू अधिक नसावेत. तसेच जो सदैव विद्या व शिक्षणासाठी प्रयत्न करतो, दुष्ट लोकांचे निवारण करून राज्य करण्यायोग्य असतो तोच राजा सदैव उन्नत होतो. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Indra, lord of power, honour and excellence, that strength and power of yours for which you are invoked by all humanity, pray give us, your friends and leaders of a free world. O lord of honour and majesty, unshakable lord of universal vision and knowledge, remove the cover of darkness and open out our potential like a hidden treasure revealed.

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