ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 41/ मन्त्र 2
प्रा॒त॒र्जितं॒ भग॑मु॒ग्रं हु॑वेम व॒यं पु॒त्रमदि॑ते॒र्यो वि॑ध॒र्ता। आ॒ध्रश्चि॒द्यं मन्य॑मानस्तु॒रश्चि॒द्राजा॑ चि॒द्यं भगं॑ भ॒क्षीत्याह॑ ॥२॥
स्वर सहित पद पाठप्रा॒तः॒ऽजित॑म् । भग॑म् । उ॒ग्रम् । हु॒वे॒म॒ । व॒यम् । पु॒त्रम् । अदि॑तेः । यः । वि॒ऽध॒र्ता । आ॒ध्रः । चि॒त् । यम् । मन्य॑मानः । तु॒रः । चि॒त् । राजा॑ । चि॒त् । यम् । भग॑म् । भ॒क्षि॒ । इति॑ । आह॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता। आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥२॥
स्वर रहित पद पाठप्रातःऽजितम्। भगम्। उग्रम्। हुवेम। वयम्। पुत्रम्। अदितेः। यः। विऽधर्ता। आध्रः। चित्। यम्। मन्यमानः। तुरः। चित्। राजा। चित्। यम्। भगम्। भक्षि। इति। आह ॥२॥
ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 41; मन्त्र » 2
अष्टक » 5; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 2
Acknowledgment
अष्टक » 5; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 2
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! योऽदितेर्विधर्ताऽऽध्रश्चिन्मन्यमानस्तुरो राजा चिदिव परमात्मा यं भगं प्राप्तुमाह यत्प्रेरिता वयं पुत्रमिव प्रातर्जितमुग्रं भगं हुवेमेति यं चिदहं भक्षि तं सर्व उपासीरन् ॥२॥
पदार्थः
(प्रातर्जितम्) प्रातरेव जेतुमुत्कर्षयितुं योग्यम् (भगम्) ऐश्वर्यम् (उग्रम्) तेजोमयम् (हुवेम) शब्दयेम (वयम्) (पुत्रम्) पुत्रमिव वर्तमानम् (अदितेः) अन्तरिक्षस्थाया भूमेः प्रकाशस्य वा (यः) (विधर्ता) विविधानां लोकानां धर्ता (आध्रः) यः सर्वैस्समन्ताद् ध्रियते (चित्) अपि (यम्) (मन्यमानः) विजानन् (तुरः) शीघ्रकारी (चित्) इव (राजा) प्रकाशमानः (चित्) अपि (यम्) (भगम्) ऐश्वर्यम् (भक्षि) भजेयं सेवेय (इति) अनेन प्रकारेण (आह) उपदिशतीश्वरः ॥२॥
भावार्थः
अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। मनुष्यैः प्रातरुत्थाय सर्वाधारं परमेश्वरं ध्यात्वा सर्वाणि कर्तव्यानि कार्याणि विचिन्त्य धर्मेण पुरुषार्थेन प्राप्तमैश्वर्यं भोक्तव्यं भोजयितव्यमितीश्वर उपदिशति ॥२॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अदितेः) अन्तरिक्षस्थ भूमि वा प्रकाश का (विधर्ता) वा विविध लोकों का धारण करनेवाला (आध्रः, चित्) जो सब ओर से धारण सा किया जाता (मन्यमानः) जानता हुआ (तुरः) शीघ्रकारी (राजा) प्रकाशमान (चित्) निश्चय से परमात्मा (यम्) जिस (भगम्) ऐश्वर्य्य की प्राप्ति होने को (आह) उपदेश देता है, जिसकी प्रेरणा पाये हुए (वयम्) हम लोग (पुत्रम्) पुत्र के समान (प्रातर्जितम्) प्रातःकाल ही उत्तमता से प्राप्त होने को योग्य (उग्रम्) तेजोमय तेज भरे हुए (भगम्) ऐश्वर्य्य को (हुवेम) कहें (इति) इस प्रकार (यम्, चित्) जिस को निश्चय से मैं (भक्षि) सेवूँ, उसकी सब उपासना करें ॥२॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि प्रातः समय उठकर सब के आधार परमेश्वर का ध्यान कर सब करने योग्य कामों को नाना प्रकार से चिंतवन कर धर्म और पुरुषार्थ से पाये हुए ऐश्वर्य को भोगें वा भुगावें, यह ईश्वर उपदेश देता है ॥२॥
विषय
भगवान् से नाना प्रार्थनाएं।
भावार्थ
( प्रातः-जितम् ) प्रभात वेला में ही सबसे अधिक उत्कर्ष प्राप्त करने योग्य ( भगं ) सेवने योग्य ( उग्रं ) दुष्टों को भयकारी, ( पुत्रं ) बहुतों के रक्षक प्रभु की ( वयं ) हम ( हुवेम ) स्तुति करें, ( यः ) जो (अदितेः ) अखण्ड, प्रकृति सूर्य को और (विधर्त्ता) विविध लोकों को धारण करता है (यं मन्यमानः ) जिसका मनन करता हुआ ( आध्रः चित् ) अन्यों से धारण पोषण योग्य दरिद्र भी और ( यं ) जिस ( भगं ) ऐश्वर्यवान् सेव्य प्रभु को ( तुरः चित्) शीघ्रकारी (राजा चित् ) राजा भी ( भक्षि ) मैं भजन करता हूं (इति आइ) ऐसा ही कहता है । जिसकी उपासना करने से कोई निषेध नहीं करता है ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वसिष्ठ ऋषिः ॥ १ लिङ्गोक्ताः । २—६ भगः । ७ उषा देवता ॥ छन्दः—१ निचृज्जगती। २, ३, ५, ७ निचृत्त्रिष्टुप् । ६ त्रिष्टुप् । ४ पंक्तिः॥ सप्तर्चं सूकम्॥
विषय
ईशोपासना निर्धन-धनी सब करें
पदार्थ
पदार्थ - (प्रातः-जितम्) = प्रभात में सर्वाधिक उत्कर्ष पाने और (भगं) = सेवन योग्य (उग्रं) = दुष्ट भयकारी, (पुत्रं) = बहुतों के रक्षक प्रभु की वयं हम (हुवेम) = स्तुति करें, (यः) = जो (अदितेः) = अखण्ड प्रकृति, सूर्य और (विधर्त्ता) = लोकों को धारण करता है और (यं मन्यमानः) = जिसका मनन करता हुआ (यं) = जिस (भगं) = ऐश्वर्यवान् प्रभु की (आध्रः चित्) = अन्यों से धारण-योग्य और (तुरः चित्) = शीघ्रकारी (राजा चित्) = राजा भी (भक्षि) = 'मैं भजन करता हूँ' (इति आह) = ऐसा कहता है।
भावार्थ
भावार्थ- सूर्य आदि विविध लोकों को धारण करनेवाला सर्वरक्षक परमेश्वर मनन करने के योग्य है। उस ऐश्वर्यशाली प्रभु की उपासना राजा-प्रजा, निर्धन-धनी सब जन करें।
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. माणसांनी प्रातःकाळी उठून सर्वांचा आधार असलेला परमेश्वराचे ध्यान करून व करण्यायोग्य काम करून विविध प्रकारचे चिंतन करून धर्म व पुरुषार्थाने प्राप्त झालेले ऐश्वर्य भोगावे व भोगवावे. हा ईश्वराचा उपदेश आहे. ॥ २ ॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Early morning we invoke Bhaga, all victorious lord and spirit of glory, child of indestructible mother Infinity and sustainer of all regions of the universe, universally acknowledged and adored, to whom the weakest as well as the most powerful and brilliant ruler prays and rays: O lord, give me the glory and the grace I need.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal