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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 68 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 68/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - अश्विनौ छन्दः - निचृदार्चीत्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आ शु॑भ्रा यातमश्विना॒ स्वश्वा॒ गिरो॑ दस्रा जुजुषा॒णा यु॒वाको॑: । ह॒व्यानि॑ च॒ प्रति॑भृता वी॒तं न॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । शु॒भ्रा॒ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । सु॒ऽअश्वा॑ । गिरः॑ । द॒स्रा॒ । जु॒जु॒षा॒णा । यु॒वाकोः॑ । ह॒व्यानि॑ । च॒ । प्रति॑ऽभृता । वी॒तम् । नाः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ शुभ्रा यातमश्विना स्वश्वा गिरो दस्रा जुजुषाणा युवाको: । हव्यानि च प्रतिभृता वीतं न: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । शुभ्रा । यातम् । अश्विना । सुऽअश्वा । गिरः । दस्रा । जुजुषाणा । युवाकोः । हव्यानि । च । प्रतिऽभृता । वीतम् । नाः ॥ ७.६८.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 68; मन्त्र » 1
    अष्टक » 5; अध्याय » 5; वर्ग » 14; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (स्वश्वा, अश्विना) हे उत्तम अश्वोंवाले राजपुरुषो ! आप (द्स्रा) शत्रुओं के नाश करनेवाले (शुभ्रा) तेजस्वी (युवाकोः) बलवान् हैं, (गिरः) हमारी वाणियें आपके लिये (आ) भले प्रकार (जुजुषाण) सत्कारवाली हों, (यातं) आप आकर (नः) हमारे यज्ञ को सुशोभित करें (च) और (हव्यानि) यज्ञीय पदार्थों का जो (प्रतिभृता) हविशेष है, उसका (वीतं) उपभोग करें ॥१॥

    भावार्थ - परमात्मा उपदेश करते हैं कि याज्ञिक लोगो ! तुम अपने न्यायाधीश तथा सेनाधीश राजपुरुषों का सम्मान करो, उनको अपने यज्ञों में बुलाओ और मधुर वाणी से उनका सत्कार करते हुए हविशेष से उनको सत्कृत करो, ताकि राजा तथा प्रजा में परस्पर प्रेम उत्पन्न होकर देश का कल्याण हो ॥१॥


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    पदार्थः -
    (स्वश्वा, अश्विना) हे सुन्दराश्ववन्तो राजपुरुषाः ! यूयं (दस्रा) शत्रुहन्तारः (शुभ्रा) तेजस्विनः (युवाकोः) युष्मान् कामयमानानां नः (गिरः) वचांसि (जुजुषाणा) सेवमानाः, (आ, यातं) आगच्छत (नः) अस्मद्यज्ञान् सुशोभितान् कुरुत (च) अपरञ्च (हव्यानि) हवनीयवस्तूनि (प्रतिभृता) सज्जितानि तानि (वीतं) भक्षयत ॥१॥


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    Meaning -
    O riders of noble steeds, Ashvins, youthful heroes of the human nation, illustrious warriors and marvellous achievers, listen to the voices of your friends and admirers, come, join us and enjoy the sweets and delicacies of our yajnic hospitality.


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    भावार्थ - परमात्मा उपदेश करतो, की याज्ञिक लोकांनो! तुम्ही आपल्या न्यायाधीश व सेनाधीश राजपुरुषांचा सन्मान करा. त्यांना आपल्या यज्ञात बोलवा व मधुर वाणीने त्यांचा सत्कार करीत हवीच्या शेषाने त्यांचा सत्कार करा. कारण राजा व प्रजा यांच्यामध्ये परस्पर प्रेम उत्पन्न होऊन देशाचे कल्याण व्हावे. ॥१॥


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