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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 82 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 82/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्रावरुणौ छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    इन्द्रा॑वरुणा यु॒वम॑ध्व॒राय॑ नो वि॒शे जना॑य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छतम् । दी॒र्घप्र॑यज्यु॒मति॒ यो व॑नु॒ष्यति॑ व॒यं ज॑येम॒ पृत॑नासु दू॒ढ्य॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्रा॑वरुणा । यु॒वम् । अ॒ध्व॒राय॑ । नः॒ । वि॒शे । जना॑य । महि॑ । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒म् । दी॒र्घऽप्र॑यज्युम् । अति॑ । यः । व॒नु॒ष्यति॑ । व॒यम् । ज॒ये॒म॒ । पृत॑नासु । दुः॒ऽध्यः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रावरुणा युवमध्वराय नो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम् । दीर्घप्रयज्युमति यो वनुष्यति वयं जयेम पृतनासु दूढ्य: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्रावरुणा । युवम् । अध्वराय । नः । विशे । जनाय । महि । शर्म । यच्छतम् । दीर्घऽप्रयज्युम् । अति । यः । वनुष्यति । वयम् । जयेम । पृतनासु । दुःऽध्यः ॥ ७.८२.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 82; मन्त्र » 1
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 2; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मा प्रजाजनान् राजधर्ममुपदिशति।

    पदार्थः

    (दुः, ध्यः) दुर्बुद्धयः (पृतनासु) युद्धस्थलेषु (यः) ये (वनुष्यति) अनुचितं व्यवहृत्य जिगीषन्ति, तथा (दीर्घप्रयुज्यम्) अप्रयोज्यपदार्थान् (अति) प्रयुञ्जते, तान् (वयम्, जयेम) वयं रणक्षेत्रे पराभवेम (इन्द्रावरुणा) हे अध्यापकोपदेशकौ ! (युवम्) भवन्तौ (नः) अस्माकं (अध्वरा) सङ्ग्रामरूपयज्ञाय (विशे, जनाय) प्रजाभ्यश्च (महि, शर्म) अतिशान्तिकारकसाधनं (यच्छतम्) दत्ताम्, येन वयं तान् जयेम ॥१॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब परमात्मा प्रजाजनों को राजधर्म का उपदेश करते हैं।

    पदार्थ

    (दुः ध्यः) दुर्बुद्धि लोग (पृतनासु) युद्धों में (यः) जो (वनुष्यति) अनुचित व्यवहार द्वारा जीतने की इच्छा करते और (दीर्घप्रयज्युं) प्रयोग न करने योग्य पदार्थों का (अति) प्रयोग करते हैं, उनको (वयं, जयेम) हम जीतें। (इन्द्रावरुणा) हे अध्यापक तथा उपदेशको ! (युवं) आप (नः) हमारे (अध्वरा) संग्रामरूप यज्ञ और (विशे, जनाय) प्रजाजनों के लिए (महि, शर्म) बड़ा शान्तिकारक साधन (यच्छतम्) दें, जिससे हम उनको विजय कर सकें ॥१॥

    भावार्थ

    परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों ! तुम युद्ध में अप्रयुक्त पदार्थों का प्रयोग करनेवाले दुष्ट शत्रुओं को जीतने का प्रत्यन करो और युद्धविद्यावेत्ता अध्यापक तथा उपदेशकों से प्रार्थना करो कि वह तुम्हें युद्ध के लिए उपयोगी अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों की शिक्षा दें, जिससे तुम दुष्ट शत्रुओं का हनन करके जगत् में शान्ति फैलाओ ॥१॥

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    विषय

    इन्द्र-वरुण, शत्रुहन्ता श्रेष्ठ पुरुष का प्रजा के प्रति कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्रा वरुणा ) इन्द्र, शत्रु के हनन करनेहारे ! हे ( वरुण ) वरण करने योग्य सर्वश्रेष्ठ ! ( युवम् ) आप दोनों (अध्वराय) हिंसा से रहित ( नः ) हमारे ( विशे जनाय ) प्रजाजन को ( महि शर्म ) बड़ा भारी सुख शरण ( यच्छतम् ) प्रदान करो। ( दीर्घ-प्रयज्युम् ) दीर्घ काल से उत्तम संगति वाले, एवं चिरकाल से कर, वृत्ति, आदि देने वाले पुरुष की ( यः ) जो अति (वनुष्यति) मर्यादा का अतिक्रमण करके हिंसा करे या उससे अपने अधिकार से अधिक मांगे उसको और ( दूढ्य: ) दुष्ट बुद्धि और दुष्ट कर्म करने वालों को ( वयं ) हम ( पृतनासु ) संग्रामों या मनुष्यों के बीच में ( जयेम ) विजय करें, उन्हें नीचा कर हम उनसे ऊंचे हों ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः॥ इन्द्रावरुणौ देवते॥ छन्दः—१, २, ६, ७, ९ निचृज्जगती। ३ आर्ची भुरिग् जगती। ४,५,१० आर्षी विराड् जगती। ८ विराड् जगती॥ दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Indra, lord of ruling power, and Varuna, lord of justice, you both together for our people in general provide a very home and comfortable security of life so that they may do their creative and productive work in peace without fear and violence and, in our joint ventures for the nation, we may defeat, better win over, the person who out of hate and malevolence injures or violates the peace of a citizen engaged in continuous work for the nation.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्मा उपदेश करतो, की हे माणसांनो! तुम्ही युद्धात प्रयोग न करण्यायोग्य पदार्थांचा प्रयोग करणाऱ्या दुष्ट शत्रूंना जिंकण्याचा प्रयत्न करा व युद्धविद्यावेत्ता अध्यापक व उपदेशकांना प्रार्थना करा, की त्यांनी तुम्हाला युद्धासाठी उपयोगी व अनेक प्रकारच्या शस्त्रास्त्रांचे शिक्षण द्यावे. ज्यामुळे तुम्ही दुष्ट शत्रूंचे हनन करून जगात शांती पसरवा. ॥१॥

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