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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 82 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 82/ मन्त्र 2
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - इन्द्रावरुणौ छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    स॒म्राळ॒न्यः स्व॒राळ॒न्य उ॑च्यते वां म॒हान्ता॒विन्द्रा॒वरु॑णा म॒हाव॑सू । विश्वे॑ दे॒वास॑: पर॒मे व्यो॑मनि॒ सं वा॒मोजो॑ वृषणा॒ सं बलं॑ दधुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒म्ऽराट् । अ॒न्यः । स्व॒ऽराट् । अ॒न्यः । उ॒च्य॒ते॒ । वा॒म् । म॒हान्तौ॑ । इन्द्रा॒वरु॑णा । म॒हाव॑सू॒ इति॑ म॒हाऽव॑सू । विश्वे॑ । दे॒वासः॑ । प॒र॒मे । विऽओ॑मनि । सम् । वा॒म् । ओजः॑ । वृ॒ष॒णा॒ । सम् । बल॑म् । द॒धुः॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सम्राळन्यः स्वराळन्य उच्यते वां महान्ताविन्द्रावरुणा महावसू । विश्वे देवास: परमे व्योमनि सं वामोजो वृषणा सं बलं दधुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम्ऽराट् । अन्यः । स्वऽराट् । अन्यः । उच्यते । वाम् । महान्तौ । इन्द्रावरुणा । महावसू इति महाऽवसू । विश्वे । देवासः । परमे । विऽओमनि । सम् । वाम् । ओजः । वृषणा । सम् । बलम् । दधुः ॥ ७.८२.२

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 82; मन्त्र » 2
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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    पदार्थ -
    हे राजपुरुषो ! तुम (अन्यः) एक को (सम्राट्) सम्राट् (अन्यः, स्वराट्)  एक को स्वराट् बनाओ (महान्तौ) हे महानुभाव ! (इन्द्रा वरुणा) अध्यापक तथा उपदेशको ! (वां) तुम्हें (उच्यते) यह उपदेश किया जाता है कि (वां) तुम (विश्वे, देवासः) सम्पूर्ण विद्वान् (ओजः) अपनी सामर्थ्य से (परमे, व्योमनि) इस विस्तृत आकाशमण्डल में (सं) उत्तमोत्तम (महावसू) बड़े धनों के स्वामी होओ और (वृषणा) आप सब लोग मिलकर (सं) सर्वोपरि (बलं, दधुः) बल को धारण करो ॥२॥

    भावार्थ - इस मन्त्र में परमात्मा ने राजधर्म के संगठन का उपदेश किया है कि हे राजकीय पुरुषो ! तुम अपने में से एक को सम्राट्=प्रजाधीश और एक को स्वराट् बनाओ, क्योंकि जब तक उपर्युक्त दोनों शक्तियें अपने- अपने कार्यों को विधिवत् नहीं करतीं, तब तक प्रजा में शान्ति का भाव उत्पन्न नहीं होता, न प्रजागण अपने अपने धर्मों का यथावत् पालन कर सकते हैं। “सम्यग् राजत इति सम्राट्”=जो अपने कार्यों में स्वतन्त्रतापूर्वक निर्णय करे, उसका नाम “स्वराट्” अर्थात् प्रजातन्त्र का नाम “स्वराट्” है, जो स्वतन्त्रतापूर्वक अपने लिए सुख-दुःख का विचार कर सके। इस प्रकार सम्राट् और स्वराट् जब परस्पर एक-दूसरे के सहायक हों, तभी दोनों बलों की सदैव वृद्धि होती है। हे अध्यापक तथा उपदेशको ! तुम अपने उपदेशों द्वारा दोनों बलों की वृद्धि सदैव करते रहो, जिससे राजा और प्रजा में द्वेष उत्पन्न होकर अशान्ति न हो। तुम मिलकर सर्वोपरि बल धारण करो और तुम्हारा ऐश्वर्य्य सम्पूर्ण नभोमण्डल में व्याप्त हो ॥२॥


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    पदार्थः -
    हे राजपुरुषाः ! यूयम् (अन्यः) एकं (सम्राट्) सम्राजम् (अन्यः, स्वराट्) अन्यं स्वराजं विधत्त (महान्तौ) भो महानुभावौ ! (मित्रावरुणा) अध्यापकोपदेशकौ (वाम्) युवभ्यं (उच्यते) वक्ष्यमाणमुपदिश्यते (वाम्) युवां (विश्वे देवासः) सकलविद्वद्भिः सार्धं (ओजः) स्वशक्त्या (परमे व्योमनि) अस्मिन् महत्याकाशे (सम्) सुष्ठु (महावसू) अतिधनिकौ भवेतां (वृषणा) सर्वे भवन्तः समेत्य (सम्) सर्वातिरिक्तं (बलम्, दधुः) बलं दधतुः ॥२॥


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    Meaning -
    O Indra, lord ruler, and Varuna, lord of justice, grand powers of the common wealth, one of you is called ‘Samrat, sovereign ruler of the nation as one collected person’, the other is called ‘Swarat, autonomous ruler of the judiciary as a sub-system of the sovereign state’. O brave and generous lords, may all the brilliant sages and scholars of the nation and all the divinities of nature in this vast sovereign common wealth of humanity vest you with dignity and power.$(This mantra may also be interpreted as pointing to the two extreme ends, though both mutually balanced, of the sovereign social order, whether the order is a nation or the entire human world on earth. One is ‘Samrat’ the total sovereign system with one supreme head, the other is ‘swarat’, the autonomous individual, the citizen with his or her freedoms and loyalty to the national law, and the balance of rights and duties of the ‘swarat’ individual.)


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    भावार्थ - या मंत्रात परमात्म्याने राजधर्माच्या संगठनाचा उपदेश केलेला आहे. हे राजकीय पुरुषांनो! तुम्ही आपल्यापैकी एकाला सम्राट = प्रजाधीश व एकाला स्वराट् बनवा. कारण जोपर्यंत वरील दोन्ही शक्ती आपापल्या कार्याला विधिवत करीत नाहीत तोपर्यंत प्रजेमध्ये शांती उत्पन्न होत नाही. प्रजा आपापल्या धर्माचे यथायोग्य पालन करू शकत नाही. ‘सम्यक् राजत इति सम्राट.’ जो चांगल्या प्रकारे अभिषेक करून राजा बनविला गेला असेल तो ‘सम्राट’ व ‘स्वयं राजत इति सम्राट’ = जो आपले कार्य करताना स्वतंत्रापूर्वक निर्णय घेतो त्याचे नाव स्वराट् अर्थात लोकशाहीचे नाव ‘स्वराट्’ आहे. जो स्वतंत्रपूर्वक आपल्यासाठी सुख-दु:खाचा विचार करू शकेल. या प्रकारे सम्राट व स्वराट् जेव्हा परस्पर एकमेकांचे सहायक असतील तेव्हाच दोन्ही बलांची वृद्धी होते.


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